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Heatwave: हर बढ़ती डिग्री के साथ बढ़ रहा है जेब पर बोझ, जानिए कैसे आपकी कमाई को चट कर रही है यह भीषण गर्मी

Heatwave अब सिर्फ सेहत ही नहीं, बल्कि आम आदमी की जेब भी झुलसा रही है। हर बढ़ती डिग्री के साथ बिजली बिल, मेडिकल खर्च और सब्जियों के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं, जिससे लोगों की कमाई और सेविंग्स पर सीधा प्रहार हो रहा है।

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Heatwave Loss

भारत के बड़े हिस्से में इन दिनों सूरज आग उगल रहा है और भीषण गर्मी यानी 'हीटवेव' (Heatwave) का प्रकोप लगातार बढ़ता जा रहा है। आमतौर पर हम गर्मी के मौसम को सिर्फ शारीरिक परेशानी, पसीने और मौसम के बदलाव से जोड़कर देखते हैं, लेकिन वास्तव में यह चिलचिलाती धूप सीधे तौर पर हमारे बैंक अकाउंट और मंथली बजट पर भी गहरा प्रहार कर रही है। अर्थशास्त्रियों और पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि तापमान में होने वाली हर एक डिग्री की बढ़ोतरी देश की अर्थव्यवस्था के साथ-साथ एक आम आदमी की जेब पर भी भारी बोझ डालती है। इसे हम आसान शब्दों में 'क्लाइमेट इन्फ्लेशन' (Climate Inflation) या मौसम आधारित महंगाई कह सकते हैं। आज के समय में भीषण गर्मी सिर्फ इंसान की सेहत को ही नहीं झुलसा रही है, बल्कि यह मिडिल क्लास और नौकरीपेशा लोगों की गाढ़ी कमाई और सेविंग्स (बचत) को भी धीरे-धीरे चट कर रही है।

कैसे बढ़ रहा है आपके महीने का बजट

बढ़ते तापमान के कारण आम जनता के खर्चों में सबसे बड़ी और सीधी बढ़ोतरी बिजली के बिल और होम अप्लायंसेज के रूप में होती है। जैसे ही पारा 40 डिग्री के पार जाता है, घरों और दफ्तरों में एयर कंडीशनर (AC) और कूलर लगातार चौबीसों घंटे चलने लगते हैं। इसके चलते हर महीने आने वाला बिजली का बिल अचानक दोगुना या तीन गुना तक बढ़ जाता है। इतना ही नहीं, अत्यधिक लोड और लगातार चलने के कारण इन उपकरणों के खराब होने की आशंका बढ़ जाती है, जिससे इनके मेंटेनेंस और रिपेयरिंग का अतिरिक्त खर्च जेब पर भारी पड़ता है। इसके साथ ही, भीषण गर्मी के इस दौर में लोग बाहर निकलने पर खुद को हाइड्रेटेड रखने के लिए ठंडे पेय पदार्थ, पानी की बोतलें, आइसक्रीम और ग्लूकोज जैसी चीजों पर ज्यादा खर्च करने लगते हैं, जो दिखने में छोटे खर्च लगते हैं लेकिन महीने के अंत में एक बड़ा अमाउंट बन जाते हैं।

मेडिकल खर्च भी बढ़ रहे

गर्मी का दूसरा सबसे बड़ा और सबसे खतरनाक आर्थिक हमला हमारी सेहत और मेडिकल खर्चों पर होता है। हीटवेव के कारण डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक (लू लगना), उल्टी-दस्त, फूड पॉइजनिंग और त्वचा से जुड़ी बीमारियों के मामले तेजी से बढ़ जाते हैं। ऐसे में डॉक्टर की फीस, महंगी दवाइयाँ और कभी-कभी अस्पताल में भर्ती होने का खर्च मध्यमवर्गीय परिवारों के पूरे वित्तीय संतुलन को बिगाड़ कर रख देता है। इसके अलावा, अत्यधिक गर्मी के कारण लोगों की कार्यक्षमता (Productivity) में भारी गिरावट आती है। चिलचिलाती धूप में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर, डिलीवरी बॉय, कंस्ट्रक्शन वर्कर्स और फील्ड सेल्स से जुड़े लोग जल्दी थक जाते हैं और बीमार होने के कारण उन्हें कई दिनों तक काम से छुट्टी लेनी पड़ती है, जिससे उनकी सीधी कमाई घट जाती है।

Heatwave Loss

Heatwave Loss

इस भीषण गर्मी का असर केवल हमारे घरेलू खर्चों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह रसोई के बजट को भी बुरी तरह प्रभावित करता है। अत्यधिक तापमान के कारण खेतों में खड़ी फसलें सूखने लगती हैं, और पानी की कमी की वजह से हरी सब्जियों की पैदावार में भारी गिरावट आती है। इसके साथ ही, कोल्ड स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन के दौरान गर्मी की वजह से फल और सब्जियां रास्ते में ही सड़ जाती हैं, जिससे मंडियों में इनकी आवक कम हो जाती है। मांग और आपूर्ति के इसी अंतर के कारण बाजार में सब्जियों, फलों और डेयरी प्रोडक्ट्स (दूध, दही) के दाम आसमान छूने लगते हैं, जिसका सीधा असर हर घर के मंथली राशन बजट पर पड़ता है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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