भारतीय शेयर बाजार में आज निवेशकों की नजर सिर्फ घरेलू नहीं, बल्कि वैश्विक घटनाक्रमों पर भी टिकी हुई है। हाल के सत्रों में सेंसेक्स और निफ्टी ने नए रिकॉर्ड स्तर छुए हैं, लेकिन इन ऊंचे स्तरों के बाद बाजार में अब सतर्कता का माहौल दिख रहा है। निवेशक मुनाफावसूली और आगे की रणनीति को लेकर बेहद सोच-समझकर कदम रख रहे हैं।
एक तरफ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में जारी भू-राजनीतिक तनाव बाजार की धारणा को प्रभावित कर रहे हैं, तो दूसरी ओर कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल भी निवेशकों की चिंता बढ़ा रही है। इसके साथ ही कंपनियों के तिमाही नतीजों का सीजन बाजार में नई दिशा देने वाला साबित हो सकता है। इन्हीं सभी घरेलू और वैश्विक संकेतों के बीच आज भारतीय शेयर बाजार की चाल तय होने की उम्मीद है।
ये 10 फैक्टर तय करेंगे बाजार की चाल
सबसे बड़ा फैक्टर इस समय वेनेजुएला से जुड़ा संकट है। वहां हालात बिगड़ने और अमेरिका की कार्रवाई के बाद वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ी है। वेनेजुएला तेल उत्पादन के लिहाज से अहम देश है, ऐसे में वहां तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल सप्लाई पर असर पड़ सकता है। इस अनिश्चितता का असर भारतीय बाजार पर भी दिख सकता है।
दूसरा अहम कारण है कच्चे तेल की कीमतें। अगर वेनेजुएला संकट लंबा खिंचता है तो कच्चे तेल के दाम चढ़ सकते हैं। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक है, इसलिए तेल महंगा होने से महंगाई और कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका रहती है। इससे बाजार पर दबाव बन सकता है।
तीसरा बड़ा फैक्टर है डॉलर के मुकाबले रुपये की चाल। हाल के दिनों में डॉलर मजबूत हुआ है, जिससे रुपया दबाव में दिख रहा है। कमजोर रुपया आयात महंगा करता है, जबकि आईटी और एक्सपोर्ट कंपनियों के लिए यह राहत की बात होती है। आज बाजार की चाल काफी हद तक रुपये-डॉलर की हलचल पर भी निर्भर करेगी।
चौथा कारण है तीसरी तिमाही के नतीजे (Q3 Results)। कई कंपनियां अपने तिमाही नतीजे जारी करने वाली हैं। निवेशक यह देखना चाहते हैं कि कंपनियों की कमाई में कितनी मजबूती है और आगे का आउटलुक कैसा रहता है। अच्छे नतीजे बाजार को सहारा दे सकते हैं, जबकि कमजोर नतीजों से गिरावट आ सकती है।
पांचवां फैक्टर है विदेशी निवेशकों की गतिविधि। पिछले कुछ समय से विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार में बिकवाली करते दिखे हैं। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या वे दोबारा खरीदारी की ओर लौटते हैं या नहीं। विदेशी निवेशकों की चाल बाजार की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभाती है।
छठा अहम संकेत है अमेरिका से आने वाले आर्थिक आंकड़े, खासकर रोजगार से जुड़े डेटा। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की स्थिति का असर पूरी दुनिया के बाजारों पर पड़ता है। अगर आंकड़े मजबूत रहते हैं तो डॉलर और बॉन्ड यील्ड मजबूत हो सकती है, जिससे उभरते बाजारों पर दबाव बढ़ सकता है।
सातवां फैक्टर है सोना और चांदी की कीमतें। वैश्विक तनाव के माहौल में निवेशक सुरक्षित निवेश की ओर रुख करते हैं। अगर सोने-चांदी में तेजी आती है तो यह संकेत हो सकता है कि निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकाल रहे हैं।
आठवां कारण है घरेलू आर्थिक संकेत। महंगाई, ब्याज दरों को लेकर उम्मीदें और सरकारी नीतियों पर निवेशकों की नजर बनी हुई है। अगर महंगाई नियंत्रण में रहती है तो बाजार को राहत मिल सकती है।
नौवां फैक्टर है आईपीओ और प्राथमिक बाजार की गतिविधि। नए आईपीओ में निवेशकों की दिलचस्पी से बाजार की धारणा का अंदाजा लगाया जाता है। अगर आईपीओ को अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है तो यह बाजार के लिए सकारात्मक संकेत माना जाता है।
दसवां और आखिरी फैक्टर है वैश्विक बाजारों का रुख। अमेरिका, एशिया और यूरोप के बाजारों में कमजोरी या मजबूती का असर भारतीय शेयर बाजार पर भी दिखता है।
