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मदर-फादर छोड़िए, ‘परदादा’ डील हो जाए तो दुनिया पर राज करेगा भारत!

बीते 6 सालों में 9 ट्रेड डील और अब दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क अमेरिका के साथ ऐतिहासिक समझौता भारत की ग्लोबल डिप्लोमेसी इस वक्त अपने चरम पर है। जिस ट्रेड डील को लेकर महीनों से सस्पेंस बना हुआ था, उसे डोनाल्ड ट्रंप ने न केवल हरी झंडी दी, बल्कि भारत के लिए टैरिफ की दीवारें भी गिरा दीं। विशेषज्ञों की मानें तो यह महज एक व्यापारिक समझौता नहीं, बल्कि एक ऐसी 'परदादा' डील है जो चीन के दबदबे को खत्म कर भारत को दुनिया का नया आर्थिक बॉस बना सकती है।

trade deal

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पिछले 6 सालों में भारत ने ग्लोबल ट्रेड की पिच पर ऐसी बल्लेबाजी की है कि दुनिया के बड़े-बड़े देश हैरान हैं। ब्रिटेन, ओमान, न्यूजीलैंड, यूएई और यूरोपीय यूनियन (EU) जैसे दिग्गजों के साथ एक के बाद एक 9 ट्रेड डील साइन करके भारत ने साफ कर दिया है कि वह अब रुकने वाला नहीं है। लेकिन सबसे चौंकाने वाली खबर आई 'सुपरपावर' अमेरिका से। जिस ट्रेड डील के लिए फरवरी 2025 से माथापच्ची चल रही थी, वह अचानक से कैसे फाइनल हो गई? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो अपने सख्त तेवरों के लिए जाने जाते हैं, उन्होंने न केवल भारत के साथ हाथ मिलाया बल्कि टैरिफ को भी 50% से घटाकर सीधे 18% कर दिया। आखिर ट्रंप को ऐसा कौन सा डर सता रहा था जिसने उन्हें भारत के सामने झुकने या कहें तो 'दोस्ती' का पक्का हाथ बढ़ाने पर मजबूर कर दिया?

अमेरिका के 'प्रेशर' में आने की असली कहानी

दुनिया यह समझ नहीं पा रही थी कि जो ट्रंप 'अमेरिका फर्स्ट' की बात करते हैं, वे अचानक भारत पर इतने मेहरबान कैसे हो गए। असल में, इसकी जड़ भारत की उन 9 ट्रेड डील्स में छिपी है जो उसने पिछले कुछ सालों में की हैं। भारत ने अपनी निर्यात (Export) नीतियों को इतनी तेजी से बदला कि अमेरिका को अपनी जमीन खिसकती नजर आने लगी। अमेरिका की टैरिफ वॉर और युद्ध नीतियों की वजह से दुनिया के कई देश पहले से ही उससे खफा थे। जब अमेरिका ने देखा कि भारत एक के बाद एक फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) कर रहा है, तो उसे डर लगा कि कहीं अंतरराष्ट्रीय बाजार में उसकी मोलभाव (Bargaining) करने की ताकत खत्म न हो जाए।

EU-भारत डील बनी टर्निंग पॉइंट

एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच हुई फ्री ट्रेड डील ने अमेरिका के लिए 'अलार्म' का काम किया। अमेरिका को यह अहसास हो गया कि अगर उसने जल्द ही भारत के साथ कोई ठोस समझौता नहीं किया, तो भारत को अमेरिका का एक मजबूत विकल्प इन यूरोपीय देशों के रूप में मिल जाएगा। अगर ऐसा होता, तो भारत की निर्भरता अमेरिका पर कम हो जाती और वैश्विक राजनीति में अमेरिका का दबदबा कमजोर पड़ता। इसी 'दबाव' और 'डर' ने डोनाल्ड ट्रंप को भारत के साथ टेबल पर बैठने और टैरिफ कम करने के लिए विवश कर दिया।

चीन से बढ़े कारोबार

भारत और अमेरिका के बीच जिस ऐतिहासिक ट्रेड डील की चर्चा हो रही है, उसके पीछे का असली ट्रिगर भारत और चीन के बीच सुधरते रिश्तों की 'पिघलती बर्फ' है। अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी के बाद से ग्लोबल समीकरण तेजी से बदले हैं। जहां एक तरफ सीमा विवादों की खबरें रहती हैं, वहीं दूसरी तरफ भारत और चीन के बीच कारोबारी संबंध अब एक नई ऊंचाई पर पहुंच गए हैं। आज चीन भारत का सबसे बड़ा ट्रेड पार्टनर बन चुका है और दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 155.6 अरब डॉलर के पार निकल गया है। भारत में चीन के राजदूत जू फेइहोंग के मुताबिक, पिछले साल की तुलना में इस व्यापार में 12% की भारी बढ़ोतरी देखी गई है।

भारत-चीन समीकरण ने ट्रंप को बैकफुट पर धकेला

अगस्त 2025 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजिंग यात्रा और राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात ने रिश्तों में जमी बर्फ को पिघलाने का काम किया। इसके बाद से न सिर्फ कैलाश मानसरोवर यात्रा फिर से शुरू हुई, बल्कि चीनी पर्यटकों के लिए वीजा और दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें भी बहाल हो गईं। भारत से चीन को होने वाला निर्यात भी 9.7% बढ़ गया है। भारत और चीन की यह नजदीकी अमेरिका के लिए किसी सिरदर्द से कम नहीं है। अमेरिका को डर है कि अगर एशिया की ये दो बड़ी ताकतें एक साथ आ गईं, तो वैश्विक मंच पर वाशिंगटन का दबदबा खत्म हो सकता है। यही वजह है कि ट्रंप प्रशासन अब भारत को लुभाने के लिए टैरिफ घटाने और बड़ी डील्स करने पर मजबूर हो गया है।

IMF 2026 की रिपोर्ट

IMF की 2026 की रिपोर्ट एक ऐसे 'वर्ल्ड ऑर्डर' की ओर इशारा कर रही है जो अमेरिका की नींद उड़ाने के लिए काफी है। साल 2026 में वैश्विक अर्थव्यवस्था की ग्रोथ में भारत का योगदान 17% रहने का अनुमान है, जबकि चीन का 26.6% और अमेरिका का महज 9.9%। अगर भारत और अमेरिका साथ रहते हैं, तो ग्लोबल इकोनॉमी में उनका साझा योगदान 26.9% होगा, जो अकेले चीन के बराबर है। लेकिन, अगर किसी मोड़ पर भारत और चीन का आर्थिक तालमेल बैठ गया, तो यह आंकड़ा 43.6% तक पहुंच जाएगा। यह ग्लोबल इकोनॉमी का लगभग आधा हिस्सा होगा, जिसके सामने अमेरिका कहीं नहीं टिक पाएगा। हालांकि, भारत अपनी संप्रभुता और हितों को देखते हुए पूरी तरह किसी एक पाले में नहीं जाएगा, लेकिन यह संतुलन ही भारत की असली ताकत है।

चीन का विकल्प बनता भारत

आज पूरी दुनिया भारत को चीन के विकल्प (China Plus One) के तौर पर देख रही है। भारत की तेज रफ्तार जीडीपी, विशाल युवा आबादी और बिजनेस के अनुकूल नीतियां ग्लोबल कंपनियों को अपनी ओर खींच रही हैं। चीन में सरकार के बढ़ते दखल और सख्त नीतियों से परेशान होकर कंपनियां अब भारत का रुख कर रही हैं। अमेरिका को अच्छी तरह पता है कि वह भारत जैसे विशाल बाजार और उभरती हुई आर्थिक शक्ति को खुद से अलग नहीं रख सकता। भारत और चीन की नजदीकी ने ट्रंप को यह अहसास करा दिया है कि अगर भारत को साथ नहीं रखा, तो भविष्य के 'ग्लोबल इकोनॉमिक मैप' से अमेरिका आउट हो सकता है।

मदर-फादर नहीं, यह 'परदादा' डील है!

इस समझौते को विशेषज्ञों ने 'परदादा' डील का नाम दिया है क्योंकि इसका आकार और प्रभाव किसी भी सामान्य व्यापार समझौते से कहीं बड़ा है। यह सिर्फ आयात-निर्यात तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारत को वैश्विक सप्लाई चेन का नया 'कैप्टन' बनाने की क्षमता रखती है। इस डील के जरिए भारत की पहुंच अमेरिकी बाजारों में आसान होगी, जिससे भारतीय उद्योगों को अरबों डॉलर का फायदा होगा। डिफेंस, टेक्नोलॉजी और एनर्जी जैसे सेक्टर में भारत अब उस मुकाम पर पहुंच जाएगा जहाँ चीन भी उसे चुनौती नहीं दे पाएगा।

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रिचा त्रिपाठी
रिचा त्रिपाठी author

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिच... और देखें

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