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ब्याज दरें बढ़ीं, तो शेयरों पर क्या असर? समझें ग्रोथ स्टॉक्स और PE रेश्यो की पूरी कहानी

Devina Mehra
Expert view: Devina Mehra

दुनियाभर में ब्याज दरें बढ़ रही हैं। भारत में भी यह आशंका हावी हो रही है। अगर आपको अपने पोर्टफोलियो पर इसका असर पड़ने का डर है, तो पहले ग्रोथ स्टॉक्स और P/E रेश्यों की पूरी कहानी समझें।

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ब्याज दर बढ़ने का ग्रोथ स्टॉक्स के पीई पर होता है असर

PE Ratio Vs Interest Rate and Stocks Price : अमेरकी केंद्रीय बैंक (US FED) और बैंक ऑफ जापान (BoJ) ने पिछले दिनों ब्याज दरें बढ़ा दी हैं। अब निवेशकों की नजर RBI की MPC पर है। अगले महीने होने वाली बैठक में इस बात की बहुत संभावना है कि भारतीय रिजर्व बैंक भी ब्याज दरें बढ़ा दे। एक निवेशक के तौर पर ब्याज दरों की बढ़ोतरी की वजह से स्टॉक्स की कीमत पर असर को लेकर चिंतित होना सहज है।

ब्याज दरों का स्टॉक्स पर असर?

फर्स्ट ग्लोबल की संस्थापक और दिग्गज निवेशक देविना मेहरा के मुताबिक जब Interest Rates बढ़ती हैं, तो इसका असर सिर्फ Loan, EMI या FD की ब्याज दरों तक सीमित नहीं रहता। इसका सीधा असर शेयर बाजार की Valuation पर भी पड़ता है। खासतौर पर P/E Ratio यानी प्राइस टू अर्निंग्स रेश्यो में बदलाव देखने को मिल सकता है।

क्या सभी स्टॉक्स बराबर प्रभावित होंगे?

निवेशक के तौर पर बड़ा सवाल है यह कि ब्याज दर बढ़ने से P/E क्यों घटता है और इसका असर कुछ कंपनियों पर ज्यादा जबकि कुछ पर कम क्यों पड़ता है? देविना मेहरा के मुताबिक इसे समझने के लिए सबसे पहले रिवर्स P/E यानी अर्निग्स यील्ड (Earnings Yield) को समझना होगा। किसी शेयर का P/E यह बताता है कि कंपनी की एक साल की अर्निंग के मुकाबले निवेशक शेयर के लिए कितनी कीमत चुका रहा है। वहीं, रिवर्स पीई यानी E/Y बताता है कि शेयर की मौजूदा कीमत के मुकाबले कंपनी की अर्निंग्स कितनी है।

मसलन, अगर किसी शेयर का P/E 20 है तो उसका Earnings Yield 5% होगा। यानी P/E का इनवर्स निकालें, तो Earnings Yield = 1/P/E होता है। यहीं से ब्याज दरों और स्टॉक्स वैल्यूएशन का कनेक्शन समझ में आता है।

ब्याज दर बढ़ने पर क्या चाहते हैं निवेशक?

पूरी इकोनॉमी के लिए ब्याज दर बेहद अहम होती हैं। क्योंकि, गवर्नमेंट बॉन्ड जैसे रिस्क फ्री एसेट का रिटर्न ब्याज दर से तय होता है। जब ब्याज दर बढ़ती है, तो निवेशक रिस्क फ्री एसेट की तरफ जाते हैं। वहीं, जब ब्याज सस्ता होता है, तो इक्विटी जैसे एसेट्स का रुख करते हैं। वजह साफ है कि जब निवेशकों को बॉन्ड या FD में अच्छा रिटर्न मिलेगा, तो वे इक्विटी में रिस्क सिर्फ तभी लेंगे, जब वहां सिक्योर एसेट की तुलना में बहुत आकर्षक रिटर्न मिलने की उम्मीद दिखे। यही वजह है कि सेफ ऐसेट में रिटर्न बढ़ने पर Equity से भी निवेशकों की रिटर्न एक्सपेक्टेशन बढ़ जाती है और इसका असर Earnings Yield पर पड़ता है। अगर निवेशक शेयर में ज्यादा Earnings Yield चाहता है, तो उसे अपेक्षाकृत कम P/E पर शेयर खरीदना पसंद करेगा। यानी सरल भाषा में कहें, तो ब्याज दर बढ़ने पर शेयर मार्केट का एक्सेप्टेबल P/E मल्टीपल कम हो सकता है।

क्यों हर कंपनी पर असर बराबर नहीं होता

यहां कहानी और दिलचस्प हो जाती है। मान लीजिए दो कंपनियां हैं। पहली कंपनी आज ही मजबूत प्रॉफिट कमा रही है और उसकी ग्रोथ सामान्य लेकिन स्थिर है। दूसरी कंपनी अभी बहुत कम प्रॉफिट कमा रही है या बिल्कुल प्रॉफिट में नहीं है। लेकिन बाजार को उम्मीद है कि आने वाले वर्षों में उसकी ग्रोथ बहुत तेजी से बढ़ेंगी। Interest Rates बढ़ने पर दूसरी कंपनी पर ज्यादा असर हो सकता है। क्योंकि, उसका वैल्यूएशन का बड़ा हिस्सा आज की आनिंग्स से नहीं बल्कि भविष्य के प्रॉफिट की उम्मीद से बना हुआ है।

क्यों घट जाती स्टॉक्स की वैल्यू?

इसे Time Value of Money से आसान तरीके से समझ सकते हैं। मान लीजिए आपको आज ₹100 मिलते हैं और वही ₹100 आपको 5 साल बाद मिलें। दोनों की वैल्यू एक जैसी नहीं होगी, क्योंकि आज मिले ₹100 को आप कहीं निवेश करके उस पर रिटर्न कमा सकते हैं। अगर ब्याज दर शून्य हो, तो 5 साल बाद मिलने वाले ₹100 की आज की वैल्यू भी ₹100 के बराबर मानी जाएगी। लेकिन अगर ब्याज दर 5% हो, तो 5 साल बाद मिलने वाले ₹100 की आज की वैल्यू घटकर करीब ₹78 रह जाती है। यानी जैसे-जैसे ब्याज दर बढ़ती है, भविष्य में मिलने वाले पैसे की आज की वैल्यू कम होती जाती है।

Growth Stocks को ज्यादा चोट क्यों लगती है?

कल्पना कीजिए किसी AI Company की आज की प्रॉफिटेबिलिटी बहुत कम है। लेकिन, इन्वेस्टर्स को उम्मीद है कि अगले 5-10 साल में कंपनी की अर्निंग तेजी से बढ़ेंगी। अब अगर ब्याज दर बहुत कम है, तो बाजार फ्यूचर अर्निंग्स को अपेक्षाकृत ज्यादा वैल्यू दे सकता है और कंपनी को ऊंचा P/E मल्टीपल मिल सकता है। लेकिन, जैसे-जैसे ब्याज दर बढ़ती हैं, भविष्य की अर्निंग को को ज्यादा डिस्काउंट किया जाता है। ऐसे में कंपनी की बिजनेस स्टोरी वही रह सकती है, लेकिन उसका प्रेजेंट वैल्यूएशन कम हो सकता है। यही वजह है कि High-growth और High-P/E Stocks पर रेट हाइक का सीधा असर होता है।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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