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क्या आप जानते हैं? 'S&P 500 Index' और 'Dow Jones' क्या है अंतर और ये अमेरिकी बाजार पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को कैसे नचाते हैं?

'S&P 500' और 'डाओ जोंस' अमेरिकी शेयर बाजार के दो सबसे बड़े संकेतक हैं। डाओ जोंस जहां 30 दिग्गज कंपनियों का प्रतिनिधित्व करता है, वहीं S&P 500 में 500 बड़ी कंपनियां शामिल हैं, जिनकी हर हलचल पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करती है।

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S&P 500 Index & Dow Jones

जब भी वैश्विक अर्थव्यवस्था, शेयर बाजार या बिजनेस न्यूज की बात होती है, तो 'एसएंडपी 500' (S&P 500) और 'डाओ जोंस' (Dow Jones) जैसे नाम बार-बार सुनने को मिलते हैं। अक्सर हम देखते हैं कि अमेरिकी बाजारों में होने वाली मामूली सी हलचल भी भारतीय शेयर बाजार (Sensex और Nifty) समेत दुनिया भर के बाजारों को हिलाकर रख देती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये दोनों असल में क्या हैं, इनके बीच बुनियादी अंतर क्या है और ये दुनिया भर के निवेशकों के लिए इतने महत्वपूर्ण क्यों हैं?

आसान शब्दों में कहें तो, जैसे भारत के शेयर बाजार की सेहत को मापने के लिए 'सेंसेक्स' और 'निफ्टी' का इस्तेमाल किया जाता है, ठीक वैसे ही अमेरिका के शेयर बाजार की चाल को समझने के लिए S&P 500 और Dow Jones दो सबसे बड़े और प्रमुख सूचकांक (Indices) हैं। आइए जानते हैं इन दोनों में क्या अंतर है और अमेरिका के ये सूचकांक पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपनी उंगलियों पर कैसे नचाते हैं।

क्या है Dow Jones?

सबसे पहले बात करते हैं डाओ जोंस (Dow Jones Industrial Average - DJIA) की, जो दुनिया के सबसे पुराने सूचकांकों में से एक है। इसकी शुरुआत 1896 में हुई थी। डाओ जोंस की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह अमेरिका की सिर्फ 30 सबसे बड़ी, पुरानी और प्रतिष्ठित कंपनियों का एक समूह है। इसमें माइक्रोसॉफ्ट, ऐपल, कोका-कोला और वॉलमार्ट जैसी दिग्गज 'ब्लूचिप' कंपनियां शामिल हैं। डाओ जons को मापने का तरीका थोड़ा पुराना है, जिसे 'प्राइस-वेटेड इंडेक्स' (Price-Weighted Index) कहा जाता है। इसका मतलब यह है कि जिस कंपनी के शेयर की कीमत (Price) जितनी ज्यादा होगी, डाओ जोंस में उसका असर उतना ही अधिक होगा, भले ही वह कंपनी आकार में दूसरी कंपनियों से छोटी ही क्यों न हो। इसे आप अमेरिकी कॉर्पोरेट जगत के सबसे वीआईपी और चुनिंदा क्लब के रूप में देख सकते हैं।

क्या है S&P500?

दूसरी तरफ है एसएंडपी 500 (Standard & Poor's 500), जिसे आधुनिक दौर का सबसे सटीक और विश्वसनीय सूचकांक माना जाता है। इसकी शुरुआत 1957 में हुई थी। जैसा कि इसके नाम से ही साफ है, इस इंडेक्स में अमेरिका की अलग-अलग सेक्टर्स (जैसे टेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर, फाइनेंस आदि) की 500 सबसे बड़ी कंपनियां शामिल होती हैं। S&P 500 को मापने के लिए 'मार्केट-कैपिटलाइजेशन वेटेड' (Market-Cap Weighted) तरीके का इस्तेमाल किया जाता है। यानी जिस कंपनी की कुल बाजार कीमत (Market Valuation) जितनी ज्यादा होगी, इंडेक्स पर उसका प्रभाव उतना ही बड़ा होगा। यही वजह है कि विशेषज्ञ अमेरिकी अर्थव्यवस्था की असली और व्यापक तस्वीर देखने के लिए डाओ जोंस के मुकाबले S&P 500 को ज्यादा तवज्जो देते हैं, क्योंकि यह केवल 30 कंपनियों तक सीमित न होकर पूरे अमेरिकी बाजार का प्रतिनिधित्व करता है।

दुनिया की इकोनॉमी पर कैसे पड़ता है असर?

अब सबसे बड़ा और दिलचस्प सवाल यह उठता है कि ये दोनों अमेरिकी इंडेक्स पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और आपके पैसों को कैसे प्रभावित करते हैं? अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वैश्विक व्यापार का एक बहुत बड़ा हिस्सा अमेरिकी डॉलर में होता है। जब S&P 500 या डाओ जोंस में भारी गिरावट आती है, तो इसका सीधा मतलब होता है कि अमेरिकी कंपनियों और वहां के उपभोक्ताओं के सेंटिमेंट (मूड) में कमजोरी है। जब अमेरिका में मंदी या डर का माहौल होता है, तो वहां के बड़े विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPIs/FIIs) भारत जैसे उभरते बाजारों (Emerging Markets) से अपना पैसा निकालना शुरू कर देते हैं, जिससे भारतीय शेयर बाजार में भी भारी गिरावट आ जाती है। इसके अलावा, दुनिया भर की बड़ी आईटी और मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों का एक बड़ा राजस्व (Revenue) अमेरिकी बाजार से आता है; अगर वहां सुस्ती आती है, तो दुनिया भर की कंपनियों का मुनाफा और रोजगार घटने लगता है।

इसके विपरीत, जब अमेरिकी बाजार रिकॉर्ड ऊंचाई छू रहे होते हैं, तो पूरी दुनिया में सकारात्मक संदेश जाता है। विदेशी निवेशक भारत जैसे देशों में जमकर निवेश करते हैं, जिससे हमारे बाजार को भी रफ्तार मिलती है। संक्षेप में कहें तो, डाओ जोंस जहां अमेरिकी कॉर्पोरेट इतिहास के कुछ सबसे बड़े दिग्गजों की सेहत बताता है, वहीं S&P 500 पूरी अमेरिकी अर्थव्यवस्था का मुख्य आईना है। वैश्विक स्तर पर जुड़े आज के युग में, इन दोनों सूचकांकों की चाल पर नजर रखना सिर्फ अमेरिकी नागरिकों के लिए ही नहीं, बल्कि भारत के एक छोटे निवेशक और आम आदमी के लिए भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि ग्लोबल मार्केट की इस डोर का मुख्य सिरा हमेशा इन्हीं दोनों के हाथ में रहता है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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