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100 लाख टन यूरिया आयात के बोझ तले भारत, अब खेती में सीधे आजमाया जाएगा अमोनिया

पश्चिम एशिया संकट ने भारत को तेल के साथ ही उर्वरकों के मामले में भी आत्मनिर्भर बनने की सीख दी है। इसे देखते हुए केंद्र सरकार ने खेती में सीधे अमोनिया के इस्तेमाल को मंजूरी दी है।

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अमोनिया के इस्तेमाल से आयात से मिलेगी राहत

Ammonia In Agriculture : भारत हर साल घरेलू जरूरत पूरी करने के लिए करीब 100 लाख टन यूरिया आयात करता है। इसके बावजूद किसानों को कई बार मांग के समय पर्याप्त आपूर्ति की चुनौती का सामना करना पड़ता है। इसी आयात निर्भरता को कम करने के लिए केंद्र सरकार ने देश में पहली बार खेती में एनहाइड्रस अमोनिया (Anhydrous Ammonia) के इस्तेमाल की अनुमति दी है।

अगर यह प्रयोग सफल रहा तो भारत अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया के बाद खेती में सीधे अमोनिया का इस्तेमाल करने वाला दुनिया का चौथा देश बन जाएगा। सरकार को उम्मीद है कि भविष्य में इससे यूरिया आयात पर निर्भरता कम होगी और देश की उर्वरक सुरक्षा मजबूत होगी। कृषि मंत्रालय की तरफ से जारी नोटिफिकेशन के मुताबिक कम से कम 82% नाइट्रोजन वाले एनहाइड्रस अमोनिया को तीन साल के लिए उर्वरक के रूप में निर्माण और उपयोग की मंजूरी दी है। यह अनुमति उर्वरक (नियंत्रण) आदेश, 1985 के तहत दी गई है।

Q1 में ही 25 लाख टन से ज्यादा यूरिया आयात

भारत की उर्वरक जरूरतों का बड़ा हिस्सा अब भी आयात से पूरा होता है। लोकसभा में रसायन एवं उर्वरक मंत्री जेपी नड्डा (JP Nadda) ने सोमवार 27 जुलाई को बताया कि 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में देश ने 25.08 लाख टन यूरिया और 7.11 लाख टन डीएपी का आयात किया। इसी अवधि में घरेलू यूरिया उत्पादन 71.55 लाख टन रहा। पिछले पूरे वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने 103.50 लाख टन यूरिया और 61.94 लाख टन डीएपी आयात किया था। ऐसे में सरकार अब ऐसे विकल्पों पर काम कर रही है, जिससे आने वाले वर्षों में आयात का बोझ कम किया जा सके।

अमोनिया से क्या फायदा?

ICMR के शुरुआती परीक्षणों में कुछ फसलों, खासकर सीधे बोए गए धान में, सामान्य यूरिया की तुलना में बेहतर हरियाली और अधिक बायोमास देखने को मिला।देश के कई यूरिया संयंत्रों में हर साल 2,000-6,000 टन अतिरिक्त अमोनिया बच जाता है। इसे सीधे खेती में इस्तेमाल करने का रास्ता खुल सकता है। भारत में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले यूरिया में 46% नाइट्रोजन होती है, जबकि एनहाइड्रस अमोनिया में 82% नाइट्रोजन होती है। यानी कम मात्रा में अधिक नाइट्रोजन उपलब्ध कराई जा सकती है। यही वजह है कि विकसित देशों में कई दशकों से इसका इस्तेमाल किया जा रहा है।

सबसे बड़ी चुनौती होगी इंफ्रास्ट्रक्चर

उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अनुमति मिलना पहला कदम है, लेकिन असली चुनौती इसे जमीन पर लागू करने की होगी। क्योंकि, इसे सामान्य यूरिया की तरह खेत में छिड़का नहीं जा सकता। अमोनिया गैस को विशेष उपकरणों की मदद से मिट्टी के अंदर इंजेक्ट करना पड़ता है, ताकि गैस वातावरण में न निकल सके। अमोनिया गैस के इस्तेमाल के लिए विशेष इंजेक्शन मशीनें, सुरक्षित भंडारण और परिवहन व्यवस्था, गैस रिसाव रोकने के लिए सुरक्षा मानक और किसानों और ऑपरेटरों का प्रशिक्षण जरूरी है। इन तैयारियों के बिना बड़े पैमाने पर इसका इस्तेमाल संभव नहीं होगा।

आयात के लिए कई देशों से समझौते

सरकार ने उर्वरक आपूर्ति सुरक्षित रखने के लिए आयात के स्रोत भी बढ़ाए हैं। सऊदी अरब से हर साल करीब 31 लाख टन डीएपी की आपूर्ति का दीर्घकालिक समझौता किया है। इसके अलावा रूस से 26.50 लाख टन डीएपी और एनपीके उर्वरकों की आपूर्ति का करार किया गया है। एमओपी की खरीद के लिए रूस, जर्मनी और तुर्कमेनिस्तान से समझौते हुए हैं। वहीं, चीन पर निर्भरता कम करने के लिए बेल्जियम, मिस्र, जर्मनी, मोरक्को और अमेरिका से भी विशेष उर्वरकों की खरीद बढ़ाई जा रही है।

Yateendra Lawaniya
यतींद्र लवानियाauthor

प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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