Education Expenditure Explained : भारतीय संविधान में शिक्षा समवर्ती सूची का विषय है। यानी राज्य और केंद्र दोनों ही शिक्षा से जुड़े कानून और नीतियां बना सकते हैं। जाहिर है कि जब कानून बनाने का अधिकार राज्य और केंद्र दोनों का है, तो शिक्षा पर खर्च भी दोनों ही करेंगे। बहरहाल, यहां हम इस विषय की कानूनी पेचीदगियों पर बात नहीं कर रहे। बल्कि, जो है क्या व पर्याप्त है और दुनिया के मुकाबले में हम कहां हैं, यह जानते हैं।
राष्ट्रीय सर्वेक्षण, केंद्रीय बजट और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्टों के विश्लेषण से पता चलता है कि भारत में शिक्षा भले ही व्यापार नहीं है। लेकिन, एक ऐसा वित्तीय भार है, जिसे उठाने में देश के ज्यादातर परिवार का दम निकल जा रहा है। देश के सरकारी स्कूलों में पढ़ाई अपेक्षाकृत सस्ती है, लेकिन गुणवत्ता की चिंता के चलते बड़ी संख्या में परिवार निजी स्कूलों और कोचिंग का सहारा ले रहे हैं।
सरकारी और निजी स्कूल का खर्च
सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन (MoSPI) की कॉम्प्रेहेंसिव मॉड्यूलर सर्वे और एजुकेशन रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रीय स्तर पर भारत के लगभग 55.9% छात्र सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जबकि करीब 31.9% छात्र निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों में नामांकित हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी स्कूलों की हिस्सेदारी अधिक है, जबकि शहरों में निजी स्कूलों का दबदबा साफ दिखाई देता है। सबसे बड़ा अंतर परिवारों के खर्च में दिखता है। सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले एक छात्र पर परिवार का औसत वार्षिक खर्च ₹2,863 है, जबकि निजी स्कूल में यही खर्च बढ़कर ₹25,002 तक पहुंच जाता है। यानी निजी स्कूल में पढ़ाई सरकारी स्कूल की तुलना में लगभग 8 से 10 गुना महंगी पड़ती है। यही वजह है कि शिक्षा का चुनाव केवल गुणवत्ता का नहीं बल्कि आर्थिक क्षमता का भी सवाल बन जाता है।
आखिर सबसे ज्यादा पैसा किस पर खर्च होता है?
जब शिक्षा के खर्च को अलग-अलग हिस्सों में बांटा जाता है तो सबसे बड़ा हिस्सा कोर्स फीस का होता है। औसतन एक छात्र पर परिवार हर साल ₹7,111 केवल फीस पर खर्च करता है। इसके अलावा किताबें, स्टेशनरी, यूनिफॉर्म और परिवहन भी कुल खर्च का बड़ा हिस्सा हैं। शहरी और ग्रामीण भारत के बीच भी बड़ा अंतर है। शहरों में परिवार कोर्स फीस पर औसतन ₹15,143 खर्च करते हैं, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह खर्च लगभग ₹3,979 है। इसका मतलब है कि शिक्षा की लागत केवल स्कूल के प्रकार से नहीं बल्कि रहने की जगह से भी प्रभावित होती है।
शिक्षा का खर्च आखिर कौन उठाता है?
रिपोर्ट का सबसे अहम निष्कर्ष यह है कि भारत में 95% छात्रों की पढ़ाई का मुख्य खर्च उनके परिवार उठाते हैं। सरकारी छात्रवृत्ति केवल 1.2% छात्रों के लिए ही प्रमुख वित्तीय सहारा बन पाती है। यानी शिक्षा का वित्तीय मॉडल अभी भी परिवार-केंद्रित है। आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के लिए यह व्यवस्था चुनौती पैदा करती है, क्योंकि उन्हें पढ़ाई जारी रखने के लिए अतिरिक्त आर्थिक दबाव झेलना पड़ता है।
स्कूल के बाद अब कोचिंग भी बड़ी जरूरत
भारत में प्रतियोगी परीक्षाओं और बेहतर अंकों की दौड़ ने निजी कोचिंग को लगभग समानांतर शिक्षा व्यवस्था बना दिया है। सर्वेक्षण के अनुसार देश के 27% छात्र नियमित रूप से निजी कोचिंग लेते हैं। जैसे-जैसे कक्षा बढ़ती है, कोचिंग पर खर्च भी तेजी से बढ़ता जाता है। उच्च माध्यमिक स्तर पर एक छात्र पर औसत कोचिंग खर्च ₹6,384 सालाना है। शहरों में यही खर्च लगभग ₹9,950 तक पहुंच जाता है, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह करीब ₹4,548 है। यह संकेत देता है कि केवल स्कूल की पढ़ाई कई परिवारों को पर्याप्त नहीं लगती, इसलिए उन्हें अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है।
प्री-स्कूल शिक्षा भी होती जा रही महंगी
एक समय था जब सबसे अधिक खर्च कॉलेज शिक्षा पर माना जाता था, लेकिन अब शुरुआती शिक्षा भी महंगी होती जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार पूर्व-प्राथमिक स्तर पर एक बच्चे पर परिवार का औसत वार्षिक खर्च ₹9,807 तक पहुंच चुका है। निजी नर्सरी और प्ले-स्कूल की बढ़ती संख्या तथा नियमन की कमी के कारण शुरुआती शिक्षा भी महंगी होती जा रही है।
सरकार शिक्षा पर कितना खर्च कर रही है?
केंद्रीय बजट 2026-27 में शिक्षा मंत्रालय के लिए ₹1.39 लाख करोड़ का प्रावधान किया गया है। यह पिछले संशोधित बजट की तुलना में लगभग 14% अधिक है। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा समग्र शिक्षा योजना, पीएम पोषण, पीएम श्री स्कूल और उच्च शिक्षा संस्थानों को दिया गया है। हालांकि, एक बड़ी चुनौती अब भी बनी हुई है। केंद्र और राज्यों का संयुक्त शिक्षा व्यय अभी भी देश की जीडीपी का लगभग 4.1% है, जबकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) ने इसे 6% तक ले जाने का लक्ष्य रखा है। अगर देश के कुल शिक्षा बजट को प्रति छात्र बांट दिया जाए, तो यह 450 से 500 डॉलर के करीब है।
राज्यों के बीच भी बड़ा अंतर
देशभर में हर छात्र पर होने वाला सरकारी खर्च समान नहीं है। दिल्ली जैसे राज्यों में सरकारी स्कूल के एक छात्र पर सालाना खर्च ₹60,000 से अधिक है। वहीं हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे राज्यों में भी प्रति छात्र खर्च राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। इसके विपरीत बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे बड़े राज्यों में छात्रों की संख्या अधिक होने के कारण प्रति छात्र खर्च अपेक्षाकृत कम रहता है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि देश में अब भी एक लाख से अधिक स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक पढ़ा रहा है।
शिक्षा पर खर्च में पीछे भारत
दुनिया के मुकाबले भारत कहां खड़ा है?
अंतरराष्ट्रीय तुलना में भारत की तस्वीर मिश्रित दिखाई देती है। भारत शिक्षा पर जीडीपी का करीब 4.1% खर्च करता है, जो कई उभरती अर्थव्यवस्थाओं के आसपास है। लेकिन जब प्रति छात्र वास्तविक निवेश की बात आती है तो तस्वीर बदल जाती है। लेकिन, जब PPP के हिसाब से वास्तविक खर्च की तस्वीर को देखते हैं, तो पता चलता है कि हम दौड़ में बहुत पीछे हैं। क्योंकि, OECD देशों में प्राथमिक से माध्यमिक स्तर तक प्रति छात्र औसत खर्च 12,438 डॉलर (PPP) है, जबकि भारत का अनुमानित सार्वजनिक निवेश 1,000 से 1,200 डॉलर (PPP) के बीच माना गया है। इसकी सबसे बड़ी वजह भारत की विशाल छात्र आबादी और अपेक्षाकृत कम प्रति व्यक्ति आय है। बड़ी संख्या में छात्रों के बीच बजट बंटने से प्रति छात्र उपलब्ध संसाधन काफी कम रह जाते हैं।
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