ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक ऊर्जा बाजार के लिए एक बड़ा खतरा बन गया है, जिसने भारतीय उपभोक्ताओं की भी चिंताएं बढ़ा दी हैं। हर किसी के मन में यही सवाल है कि क्या दोनों देशों के बीच तनाव के कारण भारत में एक बार फिर रसोई गैस (LPG) की कीमतों में भारी उछाल देखने को मिलेगा? दरअसल, भारत अपनी घरेलू एलपीजी और कच्चे तेल (Crude Oil) की जरूरतों का एक बहुत बड़ा हिस्सा आयात (Import) के जरिए पूरा करता है। जब भी मध्य पूर्व (Middle East) में अशांति का माहौल बनता है, तो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में अस्थिरता आ जाती है। अगर ईरान और अमेरिका के बीच यह तनातनी जल्द ही शांत नहीं हुई, तो आने वाले समय में भारतीय बाजारों पर इसका सीधा और बड़ा असर देखने को मिल सकता है, जिससे आम आदमी की जेब पर बोझ बढ़ना तय माना जा रहा है।
भारत के लिए क्यों बढ़ सकती है मुसीबत?
हालांकि, जहां तक कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई का सवाल है, भारत की स्थिति पहले के मुकाबले काफी सुरक्षित नजर आती है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि पिछले कुछ वर्षों में भारत ने अपने क्रूड ऑयल आयात के स्रोतों में बड़ा बदलाव किया है। भारत अब केवल मध्य पूर्व के देशों पर निर्भर नहीं है, बल्कि वह रूस, अफ्रीका और लैटिन अमेरिकी देशों से भी भारी मात्रा में कच्चे तेल की खरीदारी कर रहा है।
इसके अतिरिक्त, भारतीय तेल कंपनियों ने लंबी अवधि के रणनीतिक समझौते (Strategic Contracts) कर रखे हैं, जो वैश्विक संकट के समय भी कच्चे तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं। इस रणनीतिक डायवर्सिफिकेशन के कारण विशेषज्ञों का मानना है कि देश में पेट्रोल और डीजल के लिए कच्चे तेल की कमी होने की आशंका बेहद कम है और हमारी क्रूड ऑयल सप्लाई काफी हद तक सुरक्षित बनी रहेगी।
LPG की कीमतों में फिर लगेगी आग?
लेकिन कहानी का दूसरा और सबसे चिंताजनक पहलू एलपीजी (LPG) यानी रसोई गैस से जुड़ा है, जहाँ भारत के लिए मुसीबत बढ़ सकती है। भारत अपनी कुल एलपीजी खपत का लगभग 50 से 55 फीसदी हिस्सा आयात करता है, और इस आयात का एक बहुत बड़ा हिस्सा कतर, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) जैसे खाड़ी देशों से आता है। इस पूरे रूट का सबसे संवेदनशील हिस्सा 'स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज' (Strait of Hormuz) है, जो ईरान के नियंत्रण के बेहद करीब है। यदि ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध जैसी स्थिति बनती है, तो इस समुद्री मार्ग से होने वाले जहाजों के आवागमन में भारी बाधा आ सकती है, जिससे एलपीजी की वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा जाएगी। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में एलपीजी की बेंचमार्क दरें (जैसे सऊदी अरामको का प्रोपेन और ब्यूटेन प्राइस) तेजी से ऊपर भाग सकती हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस की कीमतें बढ़ने का सीधा असर भारतीय तेल कंपनियों (IOC, HPCL, BPCL) की इनपुट कॉस्ट पर पड़ेगा। भले ही सरकार आम जनता को महंगाई से राहत देने के लिए सब्सिडी का सहारा ले, लेकिन वैश्विक स्तर पर कीमतों में होने वाली यह भारी बढ़ोतरी लंबे समय तक खुदरा बाजार पर हावी रह सकती है। संक्षेप में कहें तो, जहां भारत अपनी सूझबूझ और विभिन्न देशों से तेल खरीद की नीति के कारण कच्चे तेल की सप्लाई को सुरक्षित रखने में सक्षम दिख रहा है, वहीं खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण एलपीजी (LPG) के मोर्चे पर भारत को एक नया झटका लग सकता है। अगर वैश्विक स्तर पर कूटनीतिक बातचीत के जरिए ईरान-अमेरिका संकट का समाधान नहीं निकला, तो आने वाले महीनों में घरेलू रसोई गैस सिलेंडरों की कीमतों में बड़ी बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता।
