Airfare Hike : दुनिया भर में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और रिफाइनरियों की सीमित क्षमता का असर अब एविएशन सेक्टर पर साफ दिखने लगा है। वैश्विक कंसल्टिंग कंपनी McKinsey & Company की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, जेट फ्यूल की सप्लाई प्रभावित होने से एयरलाइंस की लागत बढ़ रही है, जिसका सीधा असर आने वाले महीनों में हवाई टिकटों की कीमतों (airline ticket prices) पर पड़ सकता है। रिपोर्ट के अनुसार, गर्मियों के ट्रैवल सीजन से पहले हवाई यात्राओं की मांग तेजी से बढ़ने वाली है। ऐसे में जेट फ्यूल की खपत भी बढ़ेगी। लेकिन इस समय बाजार में जेट फ्यूल (Jet fuel supply crisis) का स्टॉक पहले से ही कम है। यही वजह है कि सप्लाई और डिमांड के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर मांग बढ़ती रही और सप्लाई सामान्य नहीं हुई, तो एयरलाइंस के लिए ईंधन खरीदना और महंगा हो सकता है।
क्यों बढ़ रही हैं जेट फ्यूल की कीमतें?
न्यूज एजेंसी एएनआई के मुताबिक रिपोर्ट में बताया गया है कि जेट फ्यूल की कीमतें मुख्य रूप से कच्चे तेल (क्रूड ऑयल) की बढ़ती कीमतों के कारण बढ़ रही हैं। लेकिन सिर्फ यही वजह नहीं है। दूसरी बड़ी वजह यह है कि खाड़ी क्षेत्र (Gulf region) और एशिया के बड़े जेट फ्यूल निर्यातक देशों में रिफाइनरी उत्पादन घटा है। ये देश मिलकर दुनिया की करीब 40 फीसदी जेट फ्यूल सप्लाई करते हैं। ऐसे में उत्पादन कम होने का असर वैश्विक बाजार पर साफ दिख रहा है।
‘क्रैक स्प्रेड’ में भारी उछाल
रिपोर्ट में ‘क्रैक स्प्रेड’ का भी जिक्र किया गया है। यह एक ऐसा पैमाना है, जिससे पता चलता है कि कच्चे तेल और उससे बनने वाले फ्यूल के दाम में कितना अंतर है। आमतौर पर जेट फ्यूल का क्रैक स्प्रेड 20 डॉलर प्रति बैरल या उससे कम रहता था। लेकिन 2026 में यह औसतन 50 डॉलर प्रति बैरल से ज्यादा पहुंच सकता है। यह संकेत है कि रिफाइनिंग की लागत और मुनाफा दोनों तेजी से बढ़ रहे हैं।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर निर्भरता
रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से टैंकरों की आवाजाही बढ़ती है, तो ईंधन की कीमतों पर कुछ राहत मिल सकती है। लेकिन सप्लाई चेन को सामान्य होने और स्टॉक दोबारा भरने में समय लगेगा। इस वजह से जेट फ्यूल की कीमतों और क्रैक स्प्रेड में आने वाले महीनों तक उतार-चढ़ाव बना रह सकता है।
एशियाई देश भी नहीं दे पाएंगे राहत
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि फिलहाल एशियाई देश इस सप्लाई गैप को जल्दी भरने की स्थिति में नहीं हैं। चीन, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने भू-राजनीतिक तनाव के चलते जेट फ्यूल एक्सपोर्ट पर आंशिक रोक या सीमाएं लगा दी हैं। दूसरी ओर, दुनिया की कई बड़ी रिफाइनरियां पहले से ही अपनी पूरी क्षमता के करीब काम कर रही हैं। ऐसे में उत्पादन बढ़ाने की गुंजाइश बहुत कम बची है।
टिकट कीमतों पर कितना असर?
McKinsey & Company की रिपोर्ट के मुताबिक, किसी भी एयरलाइन टिकट की कीमत का करीब 30 फीसदी हिस्सा फ्यूल कॉस्ट होता है। अगर जेट फ्यूल की कीमत दोगुनी हो जाती है और इसका बोझ यात्रियों पर डाला जाता है, तो टिकट किराए में 20 से 25 फीसदी तक बढ़ोतरी हो सकती है। इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में हवाई यात्रा करना आम लोगों के लिए और महंगा हो सकता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऊंचे रिफाइनिंग मार्जिन को देखते हुए कई रिफाइनरियां जेट फ्यूल उत्पादन बढ़ा रही हैं, जिससे सप्लाई को कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, स्टॉक भरने और रणनीतिक भंडारण को दोबारा मजबूत करने में समय लगेगा। ऐसे में एक्सपर्ट्स का मानना है कि निकट भविष्य में जेट फ्यूल की कीमतें ऊंची बनी रह सकती हैं और इसका असर सीधे एयरलाइन उद्योग और यात्रियों की जेब पर पड़ेगा।
