IMF की मैनेजिंग डायरेक्टर क्रिस्टलिना जॉर्जीवा के मुताबिक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वैश्विक आर्थिक वृद्धि को 0.8% तक बढ़ा सकता है। इसके साथ ही उनका कहना है कि भारत को भी इसका लाभ मिलेगा और 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने का लक्ष्य हासिल करना संभव हो सकता है। नई दिल्ली स्थिति भारत मंडपम में आयोजित हो रहे India AI Impact Summit 2026 में शामिल हुईं, जॉर्जीवा ने कहा, ग्लोबल इकोनॉमी के लिए AI गेमचेंजर साबित हो सकती है। IMF चीफ के मुताबिक AI के बढ़ते उपयोग से वैश्विक आर्थिक वृद्धि में करीब 0.8 प्रतिशत की तेजी संभव है, जिसका सकारात्मक असर भारत पर भी पड़ेगा।
वैश्विक वृद्धि को मिल सकता है 0.8% का बूस्ट
अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष की प्रमुख क्रिस्टलिना जॉर्जीवा ने ‘AI इम्पैक्ट समिट’ में कहा कि IMF के अध्ययन के मुताबिक AI वैश्विक आर्थिक वृद्धि को लगभग एक प्रतिशत अंक तक बढ़ा सकता है। फिलहाल उपलब्ध आकलन के अनुसार यह बढ़ोतरी करीब 0.8 प्रतिशत रहने का अनुमान है। उनका कहना है कि इससे दुनिया की अर्थव्यवस्था कोविड-पूर्व स्तर से भी तेज गति से बढ़ सकती है।
‘विकसित भारत’ लक्ष्य को मिल सकता है बल
जॉर्जीवा ने कहा कि AI से होने वाली तेज वृद्धि का लाभ भारत को भी मिलेगा। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने और 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने जो लक्ष्य रखा है, उसे भी हासिल किया जा सकता है। इसके साथ ही उन्होंने कहा कि AI से उत्पादकता में बढ़ोतरी होगी। इसके अलावा डिजिटल इकोसिस्टम और इनोवेशन से विकसित भारत के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी।
अधिक वृद्धि का मतलब ज्यादा अवसर
IMF प्रमुख के मुताबिक तेज आर्थिक वृद्धि का सीधा अर्थ है अधिक अवसर और रोजगार सृजन। AI दक्षता बढ़ाकर कंपनियों की उत्पादकता में सुधार ला सकता है, जिससे आय और निवेश दोनों में बढ़ोतरी संभव है।
रोजगार पर ‘सुनामी’ जैसा असर संभव
हालांकि जॉर्जीवा ने चेतावनी भी दी कि AI का असर श्रम बाजार पर गंभीर हो सकता है। IMF के अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में करीब 40 प्रतिशत नौकरियां AI से प्रभावित हो सकती हैं। उभरते बाजारों में यह आंकड़ा लगभग 40 प्रतिशत और विकसित देशों में 60 प्रतिशत तक पहुंच सकता है।
अवसर और चुनौती दोनों साथ
कुल मिलाकर IMF का आकलन बताता है कि AI वैश्विक और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा अवसर लेकर आया है, लेकिन इसके साथ रोजगार संरचना में बड़े बदलाव की चुनौती भी जुड़ी हुई है। नीति-निर्माताओं के लिए संतुलित रणनीति बनाना अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गया है।
