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रिकॉर्ड बिकवाली के बाद FII की जोरदार वापसी; 5 दिन में की ₹7,500 करोड़ की खरीद, क्यों लिया यू-टर्न?

भारतीय शेयर बाजार में इस साल FII ने रिकॉर्ड बिकवाली की है। लेकिन, अब जून में माहौल बदलता दिख रहा है। पिछले पांच सत्र में विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार में 7500 करोड़ रुपये की खरीदारी की है।

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FII का रुख पूरी तरह पलटा

FII Return in Indian Market: भारतीय शेयर बाजार के लिए जून का महीना एक ऐतिहासिक टर्निंग पॉइंट साबित हो रहा है। साल 2026 की शुरुआत से लगातार भारतीय बाजार में चौतरफा बिकवाली करने वाले विदेशी संस्थागत निवेशक (FIIs) अब अचानक 'आक्रामक खरीदार' (Aggressive Buyers) बनकर वापस लौट आए हैं। ताजा आंकड़ों के मुताबिक, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (Foreign Institutional Investors) ने पिछले महज पांच कारोबारी सत्रों में भारतीय इक्विटी बाजार में लगभग 899 मिलियन डॉलर यानी करीब 7,500 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य के शेयरों की ताबड़तोड़ खरीदारी की है।

सिर्फ शेयर ही नहीं, बल्कि भारतीय बॉन्ड बाजार (Debt Market) में भी 4 जून के बाद से रिकॉर्ड 2.68 बिलियन डॉलर (लगभग 22,300 करोड़ रुपये) का विदेशी पैसा आया है। इस बड़े वित्तीय यू-टर्न ने घरेलू शेयर बाजार को एक नया जीवनदान दे दिया है, जिससे जून के महीने में ही सेंसेक्स और निफ्टी में करीब 3-3 फीसदी का बंपर उछाल देखने को मिला है।

महा-बिकवाली के दौर का अंत

विदेशी निवेशकों (FII) ने जनवरी से लेकर मई 2026 के बीच भारतीय शेयर बाजार से करीब 30 बिलियन डॉलर की रिकॉर्ड-तोड़ पूंजी बाहर निकाली थी। उस दौरान विदेशी निवेशक केवल भारतीय बॉन्ड बाजार में हल्की खरीदारी कर रहे थे, जहां उन्होंने 5 महीनों में महज 1.23 बिलियन डॉलर का निवेश किया था। लेकिन जून की शुरुआत होते ही विदेशी फंड्स का नजरिया पूरी तरह बदल गया है। इतनी भारी बिकवाली के बाद विदेशी निवेशकों को यह अहसास हो गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद दुनिया के दूसरे उभरते बाजारों की तुलना में बेहद मजबूत हैं। नतीजतन, जो निवेशक भारतीय बाजार से दूर भाग रहे थे, वे अब दोनों हाथों से भारतीय शेयर और सरकारी बॉन्ड खरीदने में जुट गए हैं।

कच्चे तेल ने मजबूत किया मैक्रो एनवायरमेंट

FII के मूड में आए इस बड़े बदलाव के पीछे सबसे बड़ा ट्रिगर जियो-पॉलिटिकल मोर्चे से आया है। अमेरिका और ईरान के बीच एक अंतरिम शांति समझौते के कारण कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें गिरकर 80 डॉलर प्रति बैरल के नीचे आ गई हैं, जिसने भारत जैसे बड़ी मात्रा में तेल आयात करने वाले देश की सबसे बड़ी चिंता को दूर कर दिया है। विदेशी निवेशक इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि अगर भारत का मैक्रो एनवायरमेंट स्थिर रहता है, तो यहां की कॉर्पोरेट अर्निंग्स और आर्थिक विकास दर को कोई नहीं रोक सकता।

ग्लोबल पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग का असर

ग्लोबल मार्केट्स में इस समय पोर्टफोलियो रीबैलेंसिंग का एक बहुत बड़ा खेल चल रहा है, जिसका सीधा फायदा भारत को मिल रहा है। पिछले कई महीनों से अमेरिका, दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे बाजारों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) पर आधारित टेक कंपनियों के शेयरों में एकतरफा रैली चल रही थी, जिससे वहां के वैल्यूएशन बेहद महंगे हो चुके थे। अब बड़े वैश्विक फंड्स उन टेक शेयरों में तगड़ी मुनाफावसूली (Profit Booking) कर रहे हैं और उस पैसे को भारत जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर और मजबूत बुनियादी ढांचे वाले विकासशील बाजारों में ट्रांसफर कर रहे हैं।

वैल्यूएशन में नरमी से मिला डबल बूस्ट

बाजार के जानकारों का कहना है कि पिछले कुछ महीनों में भारतीय बाजारों में जो टाइम और प्राइस करेक्शन (Time & Price Correction) देखने को मिला था, उसने कई प्रमुख सेक्टर्स के महंगे वैल्यूएशन के डर को काफी हद तक कम कर दिया है। स्टॉक अब निवेश के लिए अधिक आकर्षक और वाजिब कीमतों पर उपलब्ध हैं। इसके अलावा, हाल ही में हुए एफटीएसई (FTSE) इंडेक्स के रीबैलेंसिंग में भारत की कई नई लिस्टेड कंपनियों को शामिल किया गया है, जिसके चलते बड़े विदेशी इंडेक्स फंड्स को पैसिव इनफ्लो (Passive Inflow) के तहत मजबूरी में भारतीय शेयरों की खरीदारी करनी पड़ी है।

बैंकिंग, इंफ्रा और FMCG पहली पसंद

अगर सेक्टर्स की बात करें तो विदेशी संस्थागत निवेशकों का सबसे बड़ा दांव भारत के ग्रोथ-ओरिएंटेड और इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े क्षेत्रों पर लग रहा है। भारतीय कॉर्पोरेट जगत के वित्तीय नतीजे (Corporate Earnings Trajectory) काफी शानदार रहे हैं, जिसने विदेशी निवेशकों का भरोसा जीता है। इस समय बैंकिंग और फाइनेंशियल सर्विसेज, कैपिटल गुड्स, इंफ्रास्ट्रक्चर और डोमेस्टिक कंजम्पशन (खपत) से जुड़े सेक्टर्स में विदेशी पैसों की सबसे बड़ी बरसात हो रही है।

    Yateendra Lawaniya
    यतींद्र लवानियाauthor

    प्रिंट और डिजिटल मीडिया में बिजनेस एवं इकोनॉमी कैटेगरी में 10 वर्षों से अधिक का अनुभव। पिछले 7 वर्षों से शेयर बाजार, कॉरपोरेट सेक्टर और आर्थिक नीतियों से जुड़ी खबरों पर विशेष पकड़। लेखन में केवल हेडलाइन तक सीमित न रहकर आंकड़ों, नीतिगत फैसलों और कॉरपोरेट दावों के पीछे की वास्तविक तस्वीर को बैलेंस्ड और आसान शब्दों में पाठकों तक पहुंचाने का प्रयास। वर्तमान में Times Now Hindi के लिए बाजार की हर हलचल और आर्थिक घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए हैं।

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