भारतीय बाजार में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में हाल ही में हुई लगभग 5 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी के बावजूद आम उपभोक्ताओं और तेल विपणन कंपनियों (OMCs) के बीच एक बड़ा संकट खड़ा हो गया है। देश की प्रमुख सरकारी तेल कंपनियों को इस मामूली मूल्य संशोधन से बहुत मामूली राहत मिली है, क्योंकि लागत और वास्तविक बिक्री मूल्य के बीच का अंतर अब भी एक बहुत बड़ी खाई बना हुआ है। अगर सभी प्रकार के स्थानीय टैक्स और डीलर कमीशन को हटाकर शुद्ध रूप से देखा जाए, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण तेल कंपनियों को आज भी पेट्रोल (Petrol) पर प्रति लीटर 13 रुपये और डीजल (Diesel) पर प्रति लीटर 38 रुपए का एक बहुत बड़ा अंडर-रिकवरी (वित्तीय नुकसान) उठाना पड़ रहा है। इस भारी घाटे के कारण इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी प्रमुख सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों की वित्तीय स्थिति बेहद नाजुक दौर में पहुंच गई है, जिससे देश के ऊर्जा सुरक्षा नेटवर्क पर भी गहरा असर पड़ने का खतरा पैदा हो गया है।
नहीं कम हो रहा नुकसान
ईंधन की कीमतों में हुई हालिया बढ़ोतरी के बावजूद देश की सरकारी तेल कंपनियों की वित्तीय मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। अगर सभी प्रकार के स्थानीय टैक्स और डीलर कमीशन को हटाकर शुद्ध रूप से देखा जाए, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की ऊंची लागत के कारण तेल विपणन कंपनियों (OMCs) को आज भी पेट्रोल पर प्रति लीटर 13 रुपए और डीजल पर प्रति लीटर 38 रुपए का एक बहुत बड़ा नुकसान (अंडर-रिकवरी) उठाना पड़ रहा है।
7 प्रति लीटर की मामूली बढ़ोतरी कंपनियों के इस विशाल घाटे को पाटने में पूरी तरह नाकाफी साबित हुई है। इस संकट के कारण अब उन राज्य सरकारों पर अपना मूल्य वर्धित कर यानी वैट (VAT) कम करने का भारी दबाव बढ़ गया है, जहां टैक्स की दरें 30% के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच चुकी हैं। यदि टैक्स के मोर्चे पर राहत नहीं मिली, तो आने वाले दिनों में खुदरा कीमतों में और बढ़ोतरी की आशंका बनी रहेगी।
क्यों हो रहा है नुकसान
तेल कंपनियों को हो रहे इस चौकाने वाले नुकसान के पीछे सबसे बड़ी और मुख्य वजह अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की अस्थिरता और घरेलू बाजार में लागू भारी टैक्स स्ट्रक्चर है। यद्यपि हाल ही में भू-राजनीतिक तनावों में मामूली सुधार देखा गया है, लेकिन पिछले महीनों में आई भारी उछाल के कारण कंपनियों की इनपुट कॉस्ट (लागत) बहुत ज्यादा बढ़ चुकी है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जिसके कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार का सीधा असर घरेलू खुदरा कीमतों पर पड़ता है। तेल कंपनियां लंबे समय से इस नुकसान को खुद वहन कर रही हैं ताकि देश में एक साथ महंगाई का कोई बड़ा विस्फोट न हो, लेकिन अब स्थिति नियंत्रण से बाहर होती जा रही है। 7 रुपए प्रति लीटर की मूल्य वृद्धि कंपनियों के इस विशाल घाटे को पाटने में पूरी तरह नाकाफी साबित हुई है, जिसके परिणामस्वरूप अब आने वाले दिनों में ईंधन की कीमतों में और अधिक चरणबद्ध बढ़ोतरी किए जाने की मजबूत आशंका बनी हुई है।
इस पूरे संकट का एक और महत्वपूर्ण पहलू राज्यों द्वारा वसूला जाने वाला मूल्य वर्धित कर यानी वैट (VAT) है, जो ईंधन को आम आदमी की पहुंच से दूर बना रहा है। वर्तमान टैक्स प्रणाली में केंद्र सरकार द्वारा एक निश्चित उत्पाद शुल्क (Excise Duty) लगाया जाता है, लेकिन राज्य सरकारें इस पर प्रतिशत के आधार पर वैट वसूलती हैं, जो कुछ राज्यों में 30 प्रतिशत से भी अधिक के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच चुका है। यही कारण है कि आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और केरल जैसे राज्यों में जहां पेट्रोल ₹115 प्रति लीटर के पार बिक रहा है, वहीं उत्तर प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में यह ₹100 के आसपास बना हुआ है। अब जबकि तेल कंपनियों का घाटा ₹13 और ₹38 प्रति लीटर पर है, केंद्र सरकार और आर्थिक विशेषज्ञों द्वारा उन राज्यों पर वैट की दरें कम करने का भारी दबाव बनाया जा रहा है जो बहुत अधिक टैक्स वसूल रहे हैं। यदि राज्य सरकारें अपना टैक्स कम नहीं करती हैं, तो तेल कंपनियों के पास खुदरा कीमतों को और बढ़ाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।
