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315 जिलों में कम बारिश की संभावना, मानसून की कमी से 111 जिलों में फसल नुकसान का सबसे ज्यादा खतरा

राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे कम पानी की जरूरत वाली दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों को बढ़ावा दें और किसी एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय कम समय में तैयार होने वाली और जलवायु के अनुकूल बीजों की किस्मों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें।

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देशभर के कई जिलों में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है।

कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मंगलवार को कहा कि सरकार ने 111 जिलों की पहचान की है जहां फसल को सबसे ज्यादा नुकसान का खतरा है, क्योंकि अल नीनो के कारण मानसून में 43 प्रतिशत की कमी खरीफ की बुवाई को प्रभावित कर रही है। उन्होंने ने कहा कि मानसून की कमजोर स्थिति दो जुलाई तक बने रहने की संभावना है, जिससे किसानों के पास खरीफ (गर्मी) की फसल बोने के लिए बहुत कम समय बचेगा।

22 जून तक, खरीफ फसलों की बुवाई कुल बोए जाने वाले क्षेत्र के 10 प्रतिशत से भी कम हिस्से में हुई है, जो पिछले साल की इसी अवधि में दर्ज एक करोड़ 17.9 लाख हेक्टेयर की तुलना में थोड़ा अधिक यानी एक करोड़ 19.9 लाख हेक्टेयर है। और सोयाबीन को छोड़कर ज्यादातर फसलें आगे चल रही हैं।

मानसून की प्रगति पर समीक्षा बैठक के बाद चौहान ने पत्रकारों से कहा, ’’कुल मिलाकर, मानसून की बारिश में 43 प्रतिशत की कमी है। मौसम विभाग का अनुमान है कि कमजोर मानसून दो जुलाई तक जारी रहने की संभावना है। इसका मतलब है कि खरीफ फसलों पर असर पड़ सकता है।’’

इन राज्यों में कम बारिश की संभावना

मंत्रालय ने मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, तमिलनाडु, गुजरात, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, कर्नाटक, बिहार, झारखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और ओडिशा में 315 जिलों की पहचान की है, जहां सामान्य से कम बारिश होने की संभावना है।

इनमें से 111 जिलों - जिनमें महाराष्ट्र के 20 जिले शामिल हैं - को ’’सबसे ज्यादा जोखिम वाले’’ जिलों के तौर पर वर्गीकृत किया गया है, क्योंकि वहां सिंचाई की सुविधा 25 प्रतिशत से कम है। 25-50 प्रतिशत सिंचाई सुविधा वाले 76 जिले ’’मध्यम जोखिम’’ वाली श्रेणी में आते हैं, जबकि पर्याप्त बांध और सिंचाई बुनियादी ढांचे वाले 128 जिलों को ’’सबसे कम जोखिम’’ वाला माना गया है।

मंत्रालय ने तैयार की योजना

मंत्रालय ने राज्य-वार आकस्मिक योजनाएं तैयार की हैं, जिनमें कम बारिश की स्थिति के अनुकूल वैकल्पिक फसलों की सिफारिश की गई है। राज्यों को निर्देश दिया गया है कि वे कम पानी की जरूरत वाली दालों, तिलहनों और मोटे अनाजों को बढ़ावा दें और किसी एक फसल पर निर्भर रहने के बजाय कम समय में तैयार होने वाली और जलवायु के अनुकूल बीजों की किस्मों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करें।

मंत्री ने कहा, ’’बारिश में कमी है। हमें किसानों को वैकल्पिक फसलें अपनाने का सुझाव देने की जरूरत है। हम खेतों को खाली नहीं रहने देंगे।’’ उन्होंने कहा कि इस सत्र के लिए बीज और खाद की पर्याप्त उपलब्धता है।

जलाशयों के पानी में आ रही कमी

जलाशयों में पानी का स्तर अभी पिछले साल के मुकाबले ज्यादा है, हालांकि इसमें कमी आ रही है। राज्यों से कहा गया है कि वे पानी का समझदारी से इस्तेमाल करें और सिंचाई की जरूरतों के लिए पानी बचाने के मकसद से वीबी-ग्राम जी (विकसित भारत–रोजगार गारंटी और आजीविका मिशन ग्रामीण) कार्यक्रम के तहत तालाबों, नदियों, खेतों के तालाबों और चेक डैम की सफाई करें।

मंत्रालय ने चुनिंदा राज्यों में फसल बीमा योजनाओं और किसान क्रेडिट कार्ड के तहत बड़े पैमाने पर पंजीकरण करने को कहा है। 731 कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) से कहा गया है कि वे किसानों तक अपनी पहुंच बढ़ाएं और एसएमएस, व्हाट्सएप, कॉल सेंटर व अन्य माध्यमों से समय-समय पर सलाह पहुंचाएं।

उत्पादन के अनुमानों पर चौहान ने कहा कि ये अनुमान सामान्य स्थितियों पर आधारित हैं, लेकिन उन्होंने भरोसा दिलाया, ’’हम यह पक्का करेंगे कि उत्पादन में कोई कमी न आए।’’ मंत्रालय ने वास्तविक समय पर निगरानी और सलाह देने के लिए एक ’अल नीनो निगरानी प्रकोष्ठ’ और ’क्रॉप वेदर वॉच ग्रुप’ बनाया है। संवाददाता सम्मेलन में कृषि सचिव अतिश चंद्र, आईसीएआर के महानिदेशक एमएल जाट और कृषि आयुक्त पीके सिंह भी मौजूद थे।

(इनपुट-भाषा)

Gaurav Tiwari
गौरव तिवारीauthor

गौरव तिवारी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में टेक और ऑटो बीट को कवर करते हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 9 वर्षों के अनुभव के साथ, गौरव तकनीकी दुनिया की तेजी से बदलती जानकारियो को सरल और समझने योग्य भाषा में पेश करने के लिए जाने जाते हैं। वह गैजेट रिव्यू, टेलिकॉम अपडेट्स, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर क्राइम, टिप्स एंड ट्रिक्स, ई-कॉमर्स और ऑटोमोबाइल सेक्टर की महत्वपूर्ण खबरों पर लगातार काम करते हैं। गौरव अब तक 10,000 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुके हैं। उनकी स्टोरीज न सिर्फ टेक-सेवी पाठकों के लिए उपयोगी होती हैं, बल्कि आम यूजर्स को भी नई तकनीक समझने और अपनाने में मदद करती हैं।

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