वनतारा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अपने फैसले में कोर्ट ने वनतारा के खिलाफ दायर अर्जियों का निपटारा करते हुए जामनगर स्थित इस प्राणी बचाव एवं पुनर्वास केंद्र को ‘क्लीन चिट’ दे दी। कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने अपनी जांच में पाया है कि वनतारा में देश एवं विदेश से लाए गए जानवरों के अधिग्रहण से जुड़े एवं वन्यजीव संरक्षण कानून का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।
दरअसल, जामनगर स्थित इस प्राणी बचाव एवं पुनर्वास केंद्र और राधे कृष्णा टेंपल एलिफेंट वेलफेयर ट्रस्ट के खिलाफ कथित अवैधता एवं अनीति से जुड़ी याचिकाएं दायर की गई थीं। बीते 25 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट को इन आरोपों के समर्थन में कोई सामग्री नहीं मिली फिर भी मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने तथ्यों की जांच करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीशों एवं वरिष्ठ अधिकारियों की अगुवाई में एक विशेष जांच दल गठित की।
इसके बाद एसआईटी ने सीजेडए, सीबीआई, ईडी, डीआरआई, कस्टम, सीआईटीईएस जैसी भारतीय एवं विदेशी एजेंसियों के साथ समन्वय किया। इस टीम ने रिकॉर्ड्स, हलफनामों की जांच की, वनतारा का दौरा किया। विशेषज्ञों और व्यक्तिगत रूप से लोगों से भी बात की।
एसआईटी ने जानवरों-पशुओं के अधिग्रहण, तस्करी, अवैध कारोबार, कर्याण, संरक्षण, वित्तीय अनियमितताओं एवं पर्यावरण संबंधी मुद्दों से जुड़े आरोपों की जांच की।
अपनी जांच में एसआईटी ने पाया कि वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972, चिड़ियाघर नियम, सीजेडए दिशानिर्देश, सीमा शुल्क अधिनियम, फेमा, पीएमएलए या CITES का कोई उल्लंघन नहीं हुआ।
प्राणी बचाव एवं पुनर्वास केंद्र में जो भी पशु एवं जानवर लाए गए उनकी बकायदा अनुमति मिली थी और उनका दस्तावेजीकरण हुआ।
कल्याण, पशुपालन और पशु-चिकित्सा देखभाल के लिए जो निर्धारित मानक हैं, वे वनतारा में अधिक हैं। यही नहीं जानवरों की मृत्यु दर वैश्विक प्राणी विज्ञान के अनुरूप है। केंद्र को ग्लोबल ह्यूमन सोसायटी का प्रमाणपत्र भी मिला हुआ है।
यही नहीं, एसआईटी ने अपनी जांच में कार्बन क्रेडिट्स, पानी के गलत इस्तेमाल अथवा मनीलॉन्ड्रिंग के दावों को आधारहीन पाया। जांच में किसी अवैध फंड के इस्तेमाल अथवा तस्करी की बात सामने नहीं आई।
अपने ऐतिहासिक फैसले में कोर्ट ने कहा कि वनतारा पर इसी तरह के आरोप बार-बार लगाए गए हैं और इन सभी आरोपों में कोई दम नहीं है। न्यायालय ने इस तरह की अटकल वाली अर्जियों को प्रक्रिया का गलत इस्तेमाल करार दिया।
कोर्ट ने एसआईटी की रिपोर्ट को सील करने और इसकी पूरी कॉपी को वनतारा को देने का निर्देश दिया ताकि वह इसका आंतरिक इस्तेमाल कर सके। कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि एसआईटी रिपोर्ट की समरी गोपनीय नहीं है, वह न्यायालय के आदेश का हिस्सा है। शेड्यूल ए में दर्ज सभी शिकायतें/अर्जियां खत्म की जाती हैं। इसी तरह के आरोपों वाली कोई भी शिकायत किसी भी मंच पर सुनी नहीं जाएगी। कोर्ट ने एसआईटी द्वारा सुझाए गए उपायों को लागू करने के लिए वनतारा एवं उसके अधिकारियों को निर्देश दिए।
इसके अलावा, कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि इस मामले में मानहानि करने वाले प्रकाशकों के खिलाफ वनतारा कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकता है। सेवारत आईआरएस अधिकारियों को छोड़कर एसआईटी में शामिल अन्य सदस्यों को उनके काम के लिए मानदेय देने के निर्देश दिए जाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने एसआईटी की रिपोर्ट को पूरी तरह स्वीकार करते हुए उसके खिलाफ सभी मामलों को बंद कर दिया। साथ ही अदालत ने एक ही मुद्दे पर बार-बार मुकदमेबाजी पर रोक लगा दी। एससी ने बेबुनियाद आरोपों से सावधान रहने की चेतावनी देते हुए वनतारा के कल्याण मानकों और संरक्षण प्रयासों की सराहना भी की। एसआईटी का यह फैसला इसलिए भी और महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि इसकी एसआईटी की संरचना और उसके सदस्यों की विश्वसनीयता पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। कोई इस तथ्य से इनकार नहीं कर सकता कि जस्टिस चेलमेश्वर मौजूदा समय के सबसे बड़े न्यायविदों में से एक हैं। उन्हें हमेशा राजनीतिक वर्ग और अन्य दबावों से अप्रभावित माना गया है। वे तर्क की आवाज के रूप में देखे जाते हैं और ऐसे व्यक्ति समझे जाते हैं जो धारा के विपरीत तैरने से भी नहीं डरते।
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