चावल को लेकर राज्य सभा में उठी ये मांग, सांसद ने क्यों कहा- तीन कैटेगरी में बांटें
- Authored by: रामानुज सिंह
- Updated Feb 11, 2026, 12:09 PM IST
Rice Classification: राज्यसभा में बीजेपी सांसद ब्रजलाल ने चावल के तीन कैटेगरी में वर्गीकरण की मांग की। उन्होंने कहा कि फिलहाल वाणिज्य मंत्रालय चावल को केवल बासमती और गैर-बासमती में बांटता है, जिससे गैर-बासमती चावल उगाने वाले किसानों को नुकसान होता है। ब्रजलाल ने शून्यकाल में इसे उठाते हुए कहा कि विशेष किस्मों को अलग श्रेणी में रखा जाना चाहिए।
राज्यसभा में चावल के नए वर्गीकरण की मांग (तस्वीर-PTI/istock)
Rice Classification: राज्यसभा में मंगलवार को चावल के वर्गीकरण को लेकर अहम मुद्दा उठाया गया। भारतीय जनता पार्टी के सांसद ब्रजलाल ने मांग की कि चावल को केवल दो नहीं बल्कि तीन श्रेणियों में बांटा जाए। उन्होंने कहा कि अभी वाणिज्य मंत्रालय चावल को सिर्फ बासमती और गैर-बासमती दो हिस्सों में वर्गीकृत करता है। इस व्यवस्था से गैर-बासमती चावल उगाने वाले किसानों को नुकसान होता है।
दो श्रेणियों की व्यवस्था से किसानों को नुकसान
शून्यकाल के दौरान यह मुद्दा उठाते हुए ब्रजलाल ने कहा कि जब देश में चावल की पैदावार ज्यादा हो जाती है और सरकार निर्यात पर रोक लगाती है, तो सबसे पहले गैर-बासमती चावल के निर्यात पर रोक लगती है। इससे उन किसानों को सीधा नुकसान होता है, जो खास किस्म का गैर-बासमती चावल उगाते हैं। उन्होंने कहा कि कई राज्यों में विशेष किस्म का चावल पैदा होता है, जिसकी अपनी अलग पहचान और मांग है, लेकिन उसे सामान्य गैर-बासमती श्रेणी में डाल दिया जाता है।
तीन कैटेगरी में वर्गीकरण की मांग
न्यूज एजेंसी पीटीआई-भाषा के मुताबिक ब्रजलाल ने मांग की कि चावल का वर्गीकरण तीन हिस्सों में किया जाना चाहिए। बासमती, विशेष चावल और सामान्य चावल। उनका कहना था कि विशेष किस्म के चावल को अलग श्रेणी में रखने से उनके निर्यात और बाजार मूल्य पर सकारात्मक असर पड़ेगा। इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकेंगे और उनका उत्साह भी बढ़ेगा।
अलग-अलग राज्यों के विशेष चावल का जिक्र
उन्होंने कई राज्यों के प्रसिद्ध चावलों का उदाहरण देते हुए कहा कि बिहार का ‘कतरनी’ चावल मुंगेर, भागलपुर और बांका जिलों में उगाया जाता है और इसकी खुशबू व स्वाद अलग होता है। असम का ‘जोहरा’ और ‘गुड़ी’ चावल भी काफी लोकप्रिय है। पश्चिम बंगाल का ‘गोविंद भोग’ और ‘विष्णु भोग’ चावल अपनी गुणवत्ता के लिए जाना जाता है। गुजरात का ‘कृष्णकमोद’ चावल भी बहुत अच्छी किस्म का होता है।
ब्रजलाल ने उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले के ‘काला नमक’ चावल का भी विशेष रूप से उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि यह चावल बुद्धकाल से जुड़ा हुआ है और ‘बुद्ध ब्रांड’ के नाम से निर्यात भी किया जाता है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इसे ‘वन डिस्ट्रिक्ट वन प्रोडक्ट’ योजना में शामिल किया है, जिससे इसकी बिक्री में अच्छी बढ़ोतरी हुई है।
काला नमक चावल की खासियत
ब्रजलाल ने कहा कि काला नमक चावल का ग्लाइसेमिक इंडेक्स 55 है, जो स्वास्थ्य के लिहाज से बेहतर माना जाता है। उन्होंने दावा किया कि इसमें शर्करा नहीं होती और यह विटामिन ए तथा प्रोटीन से भरपूर होता है। उन्होंने कहा कि ऐसी विशेष किस्मों को बढ़ावा देना जरूरी है, ताकि किसान परंपरागत और गुणवत्तापूर्ण खेती की ओर आकर्षित हों।
किसानों के हित में फैसला लेने की अपील
सांसद ने सरकार से आग्रह किया कि विशेष किस्म के चावल को अलग पहचान दी जाए। यदि इन्हें सामान्य गैर-बासमती चावल के साथ रखा जाएगा तो इनके निर्यात और कीमत पर असर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि तीन श्रेणियों में वर्गीकरण से विशेष चावल उगाने वाले किसानों को लाभ मिलेगा और उनकी आय बढ़ेगी।
चंदेरी और महेश्वरी साड़ियों के लिए भी उठी मांग
इसी दौरान भाजपा की ही सांसद कविता पाटीदार ने मध्य प्रदेश की प्रसिद्ध चंदेरी और महेश्वरी साड़ियों का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि इन साड़ियों के बुनकरों को विशेष सुविधाएं और प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। उन्होंने मांग की कि इन पारंपरिक साड़ियों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में पहचान दिलाने के लिए सरकार ठोस कदम उठाए। कविता पाटीदार ने कहा कि चंदेरी और महेश्वरी साड़ियां भारत की सांस्कृतिक धरोहर हैं। यदि बुनकरों को आधुनिक तकनीक, डिजाइन और मार्केटिंग की ट्रेनिंग मिले तो उनकी आमदनी बढ़ सकती है और ये साड़ियां वैश्विक बाजार में अपनी मजबूत पहचान बना सकती हैं।
राज्यसभा में उठे इन मुद्दों से साफ है कि जनप्रतिनिधि किसानों और कारीगरों के हितों को लेकर गंभीर हैं। चाहे विशेष किस्म के चावल का वर्गीकरण हो या पारंपरिक साड़ियों को बढ़ावा देने की बात, दोनों ही मांगों का उद्देश्य स्थानीय उत्पादों को पहचान और उचित बाजार दिलाना है। अब देखना होगा कि सरकार इन सुझावों पर क्या फैसला लेती है।
