अमेरिकी सीनेट ने रूस से तेल खरीदने वाले देशों के खिलाफ कड़ा कदम उठाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उन देशों पर 100% तक सीमा शुल्क यानी टैरिफ लगाने का फैसला किया है, जो रूस से भारी मात्रा में तेल और प्राकृतिक गैस खरीदते हैं। इस नए कदम से भारत और चीन जैसे बड़े एशियाई देश सीधे तौर पर प्रभावित हो सकते हैं।
हालांकि, ट्रंप के इस फैसले को लेकर अब अमेरिका में ही विरोध के स्वर उठने लगे हैं। अमेरिकी सीनेट ने रूस पर कड़े प्रतिबंध लगाने वाले एक व्यापक विधेयक को मंजूरी दे दी है, जिसमें राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से ऊर्जा खरीदने वाले प्रमुख देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने का अधिकार देने का प्रावधान है। भारत और चीन इस प्रावधान के दायरे में आ सकते हैं।
हालांकि, कुछ अमेरिकी सांसदों ने इतनी ऊंची टैरिफ दर को लेकर चिंता जताई है। उनका तर्क है कि भारत और चीन पर भारी शुल्क लगाने से रूस पर दबाव डालने के बजाय इसका नुकसान अमेरिकी कंपनियों और उपभोक्ताओं को भी हो सकता है।
100% टैरिफ का मामला क्या है?
अमेरिकी सीनेट ने शुक्रवार को रूस के खिलाफ प्रतिबंधों से जुड़े विधेयक को 86-11 वोट से पारित किया। इसका मकसद रूस की तेल और गैस से होने वाली कमाई को प्रभावित करना है, ताकि यूक्रेन युद्ध के लिए मॉस्को की आर्थिक क्षमता पर दबाव बढ़ाया जा सके।
विधेयक में राष्ट्रपति को रूस के प्रमुख ऊर्जा खरीदारों पर 100% तक टैरिफ लगाने की शक्ति देने का प्रावधान है। भारत और चीन जैसे देश इस व्यवस्था से प्रभावित हो सकते हैं, क्योंकि दोनों रूस से बड़ी मात्रा में ऊर्जा खरीदते हैं। हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि सीनेट से पारित होना अंतिम मंजूरी नहीं है। अब विधेयक को अमेरिकी प्रतिनिधि सभा यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में जाना है।
अमेरिकी सांसदों को क्यों है आपत्ति?
विरोध करने वाले सांसदों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि टैरिफ का इस्तेमाल रूस को दंडित करने के लिए किया जाए, लेकिन इसका आर्थिक बोझ आखिरकार अमेरिकी बाजार पर पड़ सकता है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में भी कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति को इतनी व्यापक टैरिफ शक्तियां देने पर सवाल उठाए हैं।
उनका कहना है कि इससे राष्ट्रपति को टैरिफ नीति में बहुत ज्यादा अधिकार मिल जाएंगे और इसका इस्तेमाल जरूरत से ज्यादा किया जा सकता है। यही वजह है कि इस नीति को आलोचक ‘शूटिंग इटसेल्फ इन द फुट’ यानी ‘खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने’ जैसा बता रहे हैं।
भारत के लिए क्यों अहम है यह मामला?
भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है। रूस से मिलने वाला तेल भारतीय रिफाइनरियों के लिए महत्वपूर्ण स्रोत बन चुका है और इससे भारत को वैश्विक तेल कीमतों के बीच अपनी ऊर्जा लागत को नियंत्रित रखने में मदद मिली है।
अगर अमेरिका भारत के उत्पादों पर 100% तक अतिरिक्त टैरिफ लगाता है, तो भारतीय निर्यातकों के लिए अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धा करना काफी मुश्किल हो सकता है। इसका असर टेक्सटाइल, इंजीनियरिंग उत्पाद, रत्न-आभूषण और दूसरे निर्यात क्षेत्रों पर पड़ सकता है। वहीं, अमेरिकी कंपनियां भी भारतीय उत्पादों और सप्लाई चेन पर निर्भर हैं। इसलिए ऊंचे टैरिफ का एक हिस्सा अंततः अमेरिकी आयातकों और ग्राहकों पर भी पड़ सकता है।
क्या भारत रूस से तेल खरीदना बंद करेगा?
फिलहाल ऐसा कोई संकेत नहीं है कि भारत ने रूस से तेल खरीद बंद करने का फैसला किया है। भारत के लिए रूस से कच्चे तेल की खरीद का मुद्दा सिर्फ व्यापार नहीं बल्कि ऊर्जा सुरक्षा और कीमतों से भी जुड़ा है। इससे पहले विदेश मंत्रालय ने दो टूक कहा है कि सरकार देश हित से कोई समझौता नहीं करने वाली।
भारत के साथ चीन भी इस अमेरिकी कदम के निशाने पर है। चीन दुनिया में रूसी ऊर्जा का सबसे बड़ा खरीदार है और इसलिए प्रस्तावित व्यवस्था का असर बीजिंग पर भी पड़ सकता है। इससे मामला सिर्फ अमेरिका-रूस टकराव तक सीमित नहीं रहता, बल्कि अमेरिका बनाम रूस के ऊर्जा खरीदारों का बड़ा आर्थिक विवाद बन सकता है।
