कुआलालंपुर में आयोजित आसियान शिखर सम्मेलन से पहले अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो के बयान ने दक्षिण एशियाई कूटनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। रुबियो ने साफ कहा है कि अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को मज़बूत करने का इच्छुक है, लेकिन यह प्रक्रिया भारत के साथ उसके गहरे, ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण रिश्तों की कीमत पर नहीं होगी।
भारत-अमेरिका के रिश्ते में तनाव
रुबियो का यह बयान उस समय आया है जब अमेरिका, भारत और पाकिस्तान- तीनों देशों के आपसी संबंध जटिल दौर से गुजर रहे हैं। एक ओर भारत और अमेरिका ने बीते एक दशक में रणनीतिक, रक्षा और तकनीकी साझेदारी को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है, वहीं दूसरी ओर वॉशिंगटन इस्लामाबाद के साथ भी अपने पुराने सैन्य और सुरक्षा रिश्तों को पुनर्जीवित करता दिखाई दे रहा है। उनके इस बयान से पहले अमेरिका और पाकिस्तान के बीच पिछले छह महीनों में नजदीकी बढ़ी है। मई में भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य तनाव के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तानी सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर से मुलाकात की थी। इस मुलाकात के बाद अमेरिका और पाकिस्तान के बीच खुफिया एवं सुरक्षा सहयोग को नया आयाम मिला। पाकिस्तान ने तो यह तक दावा किया कि दोनों देशों के बीच संघर्ष विराम में अमेरिकी राष्ट्रपति ने भूमिका निभाई, हालांकि भारत ने ट्रंप के मध्यस्थता के दावों को सिरे से खारिज कर दिया।
क्या बोले रुबियो
रुबियो ने कुआलालंपुर में विदेश मंत्री एस. जयशंकर से होने वाली बैठक से पहले पत्रकारों से बातचीत में कहा कि भारत को यह समझना चाहिए कि अमेरिका को कई देशों के साथ संबंध बनाए रखने होते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि “भारतीय कूटनीति परिपक्व और व्यावहारिक है,” जो यह समझती है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में स्थायी दोस्ती नहीं, बल्कि स्थायी हित होते हैं। रुबियो ने रूस के साथ भारत के ऊर्जा संबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने कहा कि नयी दिल्ली ने पहले ही कच्चे तेल की खरीद में विविधता लाने की इच्छा व्यक्त की है। उनका संकेत स्पष्ट था- अमेरिका भारत को ऊर्जा क्षेत्र में साझेदारी बढ़ाने के अवसर देना चाहता है, खासकर तब जब वॉशिंगटन ने हाल ही में रूस की दो बड़ी तेल कंपनियों- रोसनेफ्ट और लुकोइल- पर प्रतिबंध लगाए हैं। इन प्रतिबंधों के बाद भारतीय कंपनियों की रूसी तेल आयात को लेकर असमंजस बढ़ गया है।
