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ब्रिटिश सांसद ने जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए की ‘माफी’ की मांग, तो भुला दिए गए नायक सी. शंकरन नायर की यादें हुई ताजा

ब्रिटिश सांसद ने अपने देश की सरकार से जलियांवाला बाग नरसंहार के लिए ‘माफी’ मांगने की है। इस मांग से भुला दिए गए नायक सी शंकरन नायर के योगदान की यादें ताजा हो गई हैं। जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बेहद अहम भूमिका निभाई, लेकिन उनकी विरासत को इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिली, जिसकी वह हकदार थे।

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ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमैन ने अपने देश की सरकार से जलियांवाला बाग नरसंहार पर माफी मांगने को कहा।

यूनाइटेड किंगडम (यूके) सांसद बॉब ब्लैकमैन ने ब्रिटिश सरकार से औपचारिक रूप से जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए माफी मांगने का आग्रह किया है। यह एक ऐसी नृशंस घटना थी, जिसने उपनिवेशवाद के इतिहास पर अमिट काला धब्बा छोड़ा। जहां यह कदम सराहनीय है, वहीं यह हमें इस सच्चाई पर भी विचार करने के लिए मजबूर करता है कि भारत ने अपने ही एक महान सपूत- सर सी. शंकरन नायर को उचित सम्मान नहीं दिया, जिन्होंने इस हत्याकांड के बाद न्याय के लिए अथक संघर्ष किया, लेकिन उनके योगदान को इतिहास में वह स्थान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे।

सांसद बॉब ब्लैकमैन ने अपने बयान में क्या कहा?

एक दिन पहले ही (27 मार्च को) ब्रिटेन में विपक्षी कंजर्वेटिव पार्टी के सांसद बॉब ब्लैकमैन ने ब्रिटेन सरकार से 1919 के जलियांवाला बाग हत्याकांड के लिए भारत के लोगों से औपचारिक तौर पर माफी मांगने को कहा है। उन्होंने संसद में कहा कि ब्रिटिश सरकार को 13 अप्रैल से पहले माफी मांगनी चाहिए। अगले महीने जलियांवाला बाग हत्याकांड की 106वीं बरसी मनाई जाएगी। ब्रिटिश सांसद ब्लैकमैन ने अपने भाषण का एक वीडियो सोशल मीडिया पर भी शेयर किया है।

ब्लैकमैन ने अपने भाषण में कहा, 'बैसाखी के दिन कई सारे लोग शांतिपूर्वक तरीके से अपने परिवार के साथ जलियांवाला बाग में शामिल हुए थे। जनरल डायर ने ब्रिटिश सेना की तरफ से अपने सैनिकों को भेजा और मासूम लोगों पर तब तक गोलियां चलाने का आदेश दिया था, जब तक उनकी गोलियां खत्म न हो जाएं।'

वह व्यक्ति जिसने ब्रिटिश साम्राज्य को चुनौती दी

11 जुलाई 1857 को मालाबार (वर्तमान केरल) में जन्मे शंकरन नायर एक प्रख्यात वकील और प्रखर राष्ट्रवादी थे। वायसराय की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में, उन्होंने ब्रिटिश शासन की नीतियों को करीब से देखा और भारतीयों के अधिकारों की वकालत की। लेकिन 13 अप्रैल 1919 को जलियांवाला बाग में हुए नरसंहार ने उनकी सोच और दिशा को पूरी तरह बदल दिया। जब जनरल डायर के आदेश पर सैकड़ों निहत्थे भारतीयों को निर्ममता से गोलियों से भून दिया गया, तो नायर ने चुप रहने के बजाय इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का फैसला किया।

उन्होंने तत्काल प्रभाव से वायसराय परिषद से इस्तीफा दे दिया, जो ब्रिटिश प्रशासन के प्रति उनके असंतोष और विरोध का ऐतिहासिक प्रमाण था। लेकिन उनका संघर्ष यहीं नहीं रुका। उन्होंने ब्रिटिश शासन की क्रूरता को दुनिया के सामने लाने के लिए गांधी एंड एनार्की नामक एक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने न केवल ब्रिटिश नीतियों की कठोर आलोचना की, बल्कि उनकी बर्बरता को भी उजागर किया। उनके इस निर्भीक कदम के कारण ब्रिटिश सरकार ने उनके खिलाफ लंदन में मानहानि का मुकदमा दायर किया, जिसे नायर ने पूरी ताकत और साहस के साथ लड़ा।

एक भूला हुआ विरासत

ऐसा कहा जाता है कि भले ही शंकरन नायर ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम में बेहद अहम भूमिका निभाई हो, लेकिन उनकी विरासत को इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिली, जिसके वह हकदार थे। जहां महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों को भरपूर सम्मान दिया गया, वहीं नायर की निडरता और ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनके सशक्त संघर्ष को उतनी प्रमुखता नहीं मिली।

होम रूल के समर्थन में एनी बेसेंट के साथ उनके प्रयास, और 1919 के मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधारों में उनकी भूमिका, जो भारतीयों को प्रशासन में अधिक भागीदारी देने के उद्देश्य से लागू किए गए थे, स्वतंत्रता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम थे। फिर भी, ये योगदान मुख्यधारा के इतिहास में अपेक्षित पहचान हासिल नहीं कर पाए।

योगदान को सम्मान देने की मांग तेज

जब दुनिया भर में औपनिवेशिक अत्याचारों पर माफी की मांग तेज हो रही है, तो भारत के गुमनाम नायकों को भी उचित सम्मान मिलना चाहिए। सी. शंकरन नायर द्वारा दिखाया गया साहस और नैतिक दृढ़ता अन्याय के खिलाफ प्रतिरोध का प्रतीक है।

ब्रिटिश सरकार से माफी की मांग अतीत के अन्याय को स्वीकार करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। सर सी. शंकरन नायर का दृढ़ संकल्प और ब्रिटिश शासन के खिलाफ उनकी निडर लड़ाई भारतीय इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखे जाने योग्य है।

Ayush Sinha
आयुष सिन्हाauthor

मैं टाइम्स नाउ नवभारत (Timesnowhindi.com) से जुड़ा हुआ हूं। कलम और कागज से लगाव तो बचपन से ही था, जो धीरे-धीरे आदत और जरूरत बन गई। मुख्य धारा की पत्रकारिता से जुड़े हुए 10 साल पूरे हो चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2014 से पहले ही मैंने पत्रकारिता की पढ़ाई के बीच में ही देश की राजधानी दिल्ली आने की ठान ली थी। उससे पहले मैंने कभी ये सोचा तक नहीं था कि मैं बनारस बोले तो वाराणसी शहर से बाहर भी जा सकता हूं। जी हां, मेरा नाता काशी से है। जन्म के साथ-साथ शिक्षा दीक्षा भी बनारस में ही हुई। राष्ट्रपिता मोहनदास करमचंद गांधी (बापू) द्वारा स्थापित किए गए विश्वविद्यालय- 'महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ' से मैंने पत्रकारिता में स्नातक किया है। ग्रेजुएशन के दौरान ही विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के अध्यापकों ने बड़ी ही सख्ती से मेरी नक्काशी करने की कोशिश की। ग्रेजुएशन के आखिरी वर्ष आते-आते मैंने दिल्ली की ट्रेन पकड़ी और यहां पहुंच गया। आव देखा न ताव, दिल्ली NCR में बड़े-बड़े मीडिया समूहों के दफ्तरों के बाहर अपना बायोडेटा डाल कर प्रयास में जुट गया। काफी धैर्य के बाद ZEE मीडिया समूह से जुड़ने का मौका मिला। मेरे पत्रकारिता के सफर की शुरुआत टेलीविजन के इनपुट डिपार्टमेंट से हुई। यहां मैं असाइनमेंट डेस्क पर था। कुछ महीनों तक खुद को इस समूह के साथ जोड़े रखने के बाद वर्ष 2015 में मैंने प्रिंट मीडिया का रुख कर लिया और ALL RIGHTS नाम की मैगज़ीन के साथ जुड़ गया। बतौर विशेष संवाददाता (Special Correspondent) मेरे कंधों पर बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई थी। मैं उन दिनों देशभर के अलग-अलग लोकसभा क्षेत्र के सांसदों, केंद्रीय मंत्रियों और दिल्ली सरकार के विधायकों और मंत्रियों का साक्षात्कार करता था। मैगज़ीन के संपादकीय पृष्ठ के लिए मैं लेख भी लिखता था। राजनीतिक खबरों से लगाव होने के चलते मैंने इस बीट को ही अपना हमसाया बना लिया। मैगजीन के बाद फिर टेलीविजन का रुख किया और इसी साल दोबारा ज़ी मीडिया से जुड़ गया। यहां साढ़े 3 सालों तक काम करने के बाद मैंने डिजिटल मीडिया में कदम रखने की ठान ली। रिपब्लिक भारत की लॉन्चिंग से पहले मुझे इसकी वेबसाइट से जुड़ने का मौका मिला। रिपब्लिक से जुड़ने के साथ ही मैंने दिल्ली छोड़कर मुंबई का रुख कर लिया। समंदर किनारे बसे इस शहर में मैंने डिजिटल पत्रकारिता के गुर को सीखा। इस संस्थान में मुझे रिपोर्टर के तौर पर मौका दिया था। कुछ ही महीने बाद मैं वापस दिल्ली आ गया और मैंने न्यूज़ वर्ल्ड इंडिया में एसोसिएट प्रोड्यूसर और रिपोर्टर की भूमिका में काम किया। चंद महीने बाद ही ज़ी मीडिया समूह के डिजिटल प्लेटफॉर्म पर काम करने का अवसर मिला। ज़ी हिन्दुस्तान के लिए मैंने स्पेशल खबरों पर काम किया और इस समूह का पहला डिजिटल रिपोर्टर बन गया। इसके बाद मुझे वीडियो सेक्शन का हेड बना दिया गया। मैंने चुनावी कवरेज की, ग्राउंड रिपोर्टिंग की और साथ ही साथ वीडियो सेक्शन को नए शिखर पर पहुंचाने की कोशिश की। मैं कविताएं और किस्से-कहानियां भी लिखता रहता हूं। पढ़ाई के दौरान ही मैंने दो किताबें भी लिखी, एक नॉवेल और दूसरी पोएट्री बुक। पत्रकारिता में रहते हुए मैंने कई "स्टिंग ऑपरेशन" भी किए। मेरे सफर को और भी खूबसूरत बनाने के लिए टाइम्स समूह ने मुझे मौका दिया। मैं जुलाई, 2023 में इस संस्थान से जुड़ा और मुझे मेन डेस्क पर खबरों से दो-चार होते रहने की जिम्मेदारी सौंपी गई। राजनीतिक विश्लेषण के साथ विस्तार से खबरों को परोसता हूं और अपने पाठकों को कुछ नया देने का प्रयास करता हूं।

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