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कंगाली में भी पाकिस्तान का नहीं छूट रहा शौक, चाय की चुस्की लेना छोड़ दे तो नहीं मांगनी पड़ेगी 'भीख'

  • Authored by: प्रांजुल श्रीवास्तव
  • Updated Apr 15, 2023, 09:04 AM IST

Pakistan Economy Crisis 2023: पाकिस्तान के आर्थिक हालात बद से बदतर हो चुके हैं। मुल्क का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो चुका है। आलम यह है कि जनता रोटी के लिए मोहताज है। ऐसे में देश IMF से बेल आउट पैकेज की किश्त रिलीज करने की गुहार लगा रहा है।

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पाकिस्तान में आर्थिक हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।

Photo : AP

Pakistan Economy Crisis 2023: पाकिस्तान इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रहा है। यहां महंगाई अपने चरम पर है। जनता को रोजमर्रा की चीजों को खरीदने के लिए जरूरत से ज्यादा कीमत चुकानी पड़ रही है। आलम यह है कि यह मुल्क आटा-दाल के लिए भी दूसरों का मोहताज है। ऐसे में पाकिस्तान अपनी बदहाली मिटाने के लिए अंतराष्ट्रीय मुद्रा कोष(IMF) और अन्य देशों के सामने भीख मांग रहा है।

हालांकि, कंगाली की इस हालत में भी पाकिस्तान के शौक नहीं छूट रहे हैं। चाय पर बड़े खर्च के बावजूद देश में इसकी खपत कम होने का नाम नहीं ले रही है। रोज बदतर हो रहे हालातों के बीच पाकिस्तान के सांख्यिकी ब्यूरो ने चाय से जुड़े आंकड़े जारी किए हैं। आंकड़ों के गणित के हिसाब से अगर पाकिस्तान चाय पर होने वाले खर्च को कम कर ले तो उसकी हालत कुछ हद तक सुधर सकती है।

पाकिस्तान में एक कप चाय का औसत खर्च 50 रुपये

आंकड़ों के मुताबिक, पाकिस्तान में एक कप चाय की औसत कीमत 50 रुपये है और प्रतिदिन एक व्यक्ति औसतन तीन कप चाय पीता है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, मुल्क में बीते एक दशक में चाय की कीमतें तीन गुना तक गढ़ गई हैं। इस हिसाब से एक व्यक्ति औसतन 4500 रुपये की चाय पीता है, जबकि देश में न्यूनतम मजदूरी 15000 रुपये प्रति माह है। ऐसे में एक व्यक्ति अपनी आय का एक बड़ा हिस्सा चाय पर ही खर्च कर रहा है।

कभी खुद उगाता था चाय और इंपोर्ट कर रहा

पाकिस्तान कभी चाय का उत्पादन खुद करता था, लेकिन आज की तारीख में यह देश चाय का सबसे बड़ा आयातक देश है। सांख्यिकी ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक, देश हर साल आधा बिलियन डॉलर चाय के आयात पर खर्च कर रहा है। यह हाल तब है जब पाकिस्तान में महंगाई दर 35 फीसदी के ऊपर पहुंच गई है और सरकार का विदेशी मुद्रा भंडार लगभग खाली हो चुका है।

दो साल चाय पीना छोड़ दे तो

पाकिस्तान एक साल में आधार बिलियन डॉलर चाय के आयात पर खर्च करता है। ऐसे में अगर देश दो साल तक चाय पीना छोड़ दे तो उसके आर्थिक हालात काफी हद तक सुधर सकते हैं। आंकड़ों के मुताबिक, चाय पर खर्च की जाने वाली राशि IMF के बेलआउट पैकेज की आखिरी किश्त के बराबर होगी। बता दें, पाकिस्तान इन दिनों IMF से 2019 में किए गए 6.5 अरब डॉलर के बेलआउट समझौते के तहत 1.1 अरब डॉलर की किश्त को जारी करने की गुहार लगा रहा है।
प्रांजुल श्रीवास्तव
प्रांजुल श्रीवास्तवauthor

<p>मैं इस वक्त टाइम्स नाउ नवभारत से जुड़ा हुआ हूं। पत्रकारिता के 8 वर्षों के तजुर्बे में मुझे और मेरी भाषाई समझ को गढ़ने और तराशने में कई वरिष्ठ पत्रकारों और संपादकों का योगदान रहा। 2016 में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से शुरू हुआ यह सफर देश की राजधानी दिल्ली में 'टाइम्स नाउ नवभारत' तक आ पहुंचा है। अखबारों में रिपोर्टिंग करते हुए शहरों की धूल फांकना और डिजिटल पत्रकारिता की बारीकियों को समझते हुए देश-विदेश की खबरों को आप तक पहुंचाने का मेरा ये सफर काफी किस्से-कहानियों से भरा हुआ है। लखनऊ की बाबा भीम राव अंबेडकर सेंट्रल यूनिवर्सिटी के क्लासरूम में प्रोफेसरों से मिले किताबी ज्ञान और पत्रकारीय सिद्धांतों को जमीन पर उतारने का मौका मुझे 2016 में ही मिल गया। पहला ब्रेक टाइम्स ग्रुप के प्रतिष्ठित अखबार 'नवभारत टाइम्स' ने दिया। यहां बतौर इंटर्न मुझे कई सामाजिक संगठनों की रिपोर्टिंग करने का मौका मिला। दिनभर शहर में घूम-घूम कर खबरों को बटोरना और शाम होते ही उन्हें लिखकर डेस्क के हवाले करना मेरी दिनचर्या का हिस्सा हो गया। इस अनुभव ने मुझे समाज के तौर तरीकों से परिचित कराया तो न्यूजरूम में सीनियर्स से मिली डांट ने पत्रकारिता की बारीकियों और भाषाई मर्यादा को समझने में मदद की। करीब 3 से 4 महीनों की इंटर्नशिप के बाद मुझे 2017 आते-आते गांधी परिवार के गढ़ रायबरेली भेजा गया। यह समय उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव और सत्ता के बदलाव का था। यहां बतौर रिपोर्टर मैं पहली बार राजनीतिक खबरों से रूबरू हुआ। रायबरेली के मिजाज को करीब 8 महीनों तक समझने के बाद नवभारत टाइम्स ने मुझे वापस लखनऊ बुलाया और शहर की रिपोर्टिंग करने का मौका दिया। यहां विज्ञान, पर्यावरण, बाजार, लखनऊ विकास प्राधिकरण, आवास विकास और मेट्रो जैसी बीट पर जमकर काम किया। यह सफर अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले मुरादाबाद तक पहुंच गया था, जहां मुझे दैनिक जागरण जैसे प्रतिष्ठित अखबार के लिए दो वर्षों तक रिपोर्टिंग करने का अवसर मिला। करीब दो वर्षों की पत्रकारिता के बाद अब मुझे देश की राजधानी की ओर रुख करना था और यह मौका अमर उजाला (डिजिटल) ने दिया। अखबारों की रिपोर्टिंग से निकलकर डिजिटल पत्रकारिता के अनुभव से मैं पहली बार रूबरू हो रहा था। यहां पर मुझे मेन डेस्क पर जिम्मेदारी मिली। जहां सबसे आगे रहते हुए सबसे सटीक खबरें आप तक पहुंचाना चुनौती भरा काम था, लेकिन पत्रकारिता की शुरुआत में मिले अनुभवों ने मेरा काम आसान बना दिया। यहां भी करीब दो वर्षों के बाद 2023 में मुझे टाइम्स ग्रुप से दोबारा जुड़ने का मौका मिला और टाइम्स नाउ नवभारत की मेन डेस्क पर मेरा सफर अब तक जारी है।</p>

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