नेपाल में अचानक आई बाढ़ ने भारी तबाही मचाई है, जिसमें लगभग 500 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है और करीब 1,500 लोग अभी भी लापता हैं। नेपाल की उत्तरी सीमा पर इस भयानक बाढ़ के आने से कई महीने पहले ही रिसर्च में चेतावनी दी गई थी कि हिमालय के ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने से अचानक ग्लेशियर झील के फटने का खतरा बढ़ रहा है।
काठमांडू स्थित 'इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट' (ICIMOD) ने ग्लेशियरों पर ग्लोबल वार्मिंग के असर को उजागर किया। ICIMOD की दो रिपोर्टों में संस्थान ने ग्लेशियरों के तेजी से खत्म होने की बात कही है, जिसमें बताया गया है कि 2000 के बाद से ज़्यादातर जगहों पर यह दर दोगुनी हो गई है।
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ग्लेशियर की बर्फ की मोटाई में लगभग 27 मीटर की कमी
यह भी पता चला कि 1975 से ग्लेशियर की बर्फ की मोटाई में लगभग 27 मीटर की कमी आई है। ICIMOD एक अंतर-सरकारी ज्ञान और सीखने का केंद्र है और इसके क्षेत्रीय भागीदारों में भारत, नेपाल, भूटान और चीन शामिल हैं।नेपाल में आ ई आपदा के बाद, वैज्ञानिक और शोधकर्ता अचानक आई इस बाढ़ के कारणों की जांच कर रहे हैं। ICIMOD की दो रिपोर्टों - '1990 से 2020 तक हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियरों की बदलती गतिशीलता' और 'HKH ग्लेशियर आउटलुक 2026: हिमालयी ग्लेशियर की 50 वर्षों की निगरानी से मिली जानकारी' - में 2020 के बाद से ग्लेशियरों के तेज़ी से पिघलने की चेतावनी दी गई थी।
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हिंदू कुश हिमालय के 38 ग्लेशियरों के डेटा का विश्लेषण
रिपोर्टों में से एक, ICIMOD की 'HKH ग्लेशियर आउटलुक 2026' में हिंदू कुश हिमालय के 38 ग्लेशियरों के डेटा का विश्लेषण किया गया और पाया गया कि ग्लेशियरों के खत्म होने की दर 2000 के बाद दर्ज की गई दर से दोगुनी हो गई है। इसमें चेतावनी दी गई है कि हिमालयी क्रायोस्फीयर (बर्फ वाले क्षेत्र) के कुछ हिस्से खतरनाक मोड़ (टिपिंग पॉइंट) के करीब पहुंच सकते हैं, जिसके बाद ग्लेशियरों का पीछे हटना (पिघलकर कम होना) ऐसा हो सकता है जिसे बदला न जा सके। इस बात पर भी जोर दिया गया कि 38 में से सिर्फ़ सात ग्लेशियर ही 'वर्ल्ड ग्लेशियर मॉनिटरिंग सर्विस' (WGMS) के ग्लोबल स्टैंडर्ड्स को पूरा करते हैं।
खास बात यह है कि काराकोरम, सिक्किम, ज़ंस्कार और भूटान जैसे ग्लेशियर वाले इलाकों की ठीक से निगरानी नहीं हो पाती है, जिससे डेटा में बड़ी कमियां रह जाती हैं और ग्लेशियर में होने वाले बदलावों की रफ़्तार और पैमाने को समझने में मुश्किल होती है।
नेपाल में बाढ़ की वजह क्या थी?
नेपाल की तिब्बत सीमा के पास बर्फ़ और चट्टानों के बड़े हिमस्खलन (avalanche) के कारण अचानक बाढ़ (flash flood) आई। इससे पानी, मलबे और बड़ी चट्टानों का तेज़ बहाव नदी के रास्तों से गुज़रा और बताया जा रहा है कि आधे घंटे के अंदर ही पानी का स्तर नौ मीटर तक बढ़ गया।बाढ़ का पानी आगे बढ़ने से पहले ही सैकड़ों लोगों की आबादी वाला एक बड़ा हिस्सा बह गया। स्थानीय स्तर पर बारिश न होने के कारण लोगों को पहले से कोई चेतावनी नहीं मिल पाई और वे अपने रोज़मर्रा के कामों में लगे हुए थे, तभी अचानक यह घटना हो गई।
नेपाल में अचानक बाढ़ की दूसरी लहर का खतरा
नेपाल में अचानक बाढ़ की दूसरी लहर का खतरा मंडरा रहा है। अधिकारियों ने शुक्रवार को एक नई चेतावनी जारी की, क्योंकि तिब्बत के साथ देश की सीमा पर हिमस्खलन से बनी एक झील का जलस्तर बढ़ गया था।नेशनल डिज़ास्टर रिस्क रिडक्शन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (NDRRMA) ने कहा कि जिस जगह पर इस हफ़्ते की शुरुआत में भयानक अचानक बाढ़ आई थी, वहां जलस्तर बढ़ने से इलाके में एक और बाढ़ का खतरा पैदा हो गया है।यह चेतावनी बुधवार को रसुवा और मध्य नेपाल के अन्य हिस्सों में आई ज़बरदस्त अचानक बाढ़ के बाद जारी की गई है। इस बाढ़ में सैकड़ों लोगों की मौत हुई और बस्तियों, सड़कों, पुलों और पनबिजली के बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचा।
NDRRMA ने एक नए नोटिस में कहा, 'उसी जगह पर, जहां बुधवार को अचानक बाढ़ आई थी, कीचड़ मिश्रित पानी का स्तर बढ़ गया है और इलाके में और बाढ़ आने का खतरा है।' NDRRMA ने खोज और बचाव कार्यों में लगे लोगों के साथ-साथ विभिन्न कारणों से भोटेकोशी और त्रिशूली इलाकों में रह रहे लोगों से अपील की है कि वे बहुत सतर्क रहें और किसी भी तरह का खतरा महसूस होने पर तुरंत सुरक्षित स्थानों पर चले जाएं।
