Israel Election Results: इजरायल में हुए संसदीय चुनाव के नतीजों में किसी भी गठबंधन को साफ बहुमत मिलता नहीं दिख रहा। 85 फीसदी वोटिंग की गिनती के बाद प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके प्रमुख प्रतिद्वंद्वी गादी आइजेनकोट की पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलता नजर नहीं आ रहा। नेतन्याहू के नेतृत्व वाला दक्षिणपंथी और धार्मिक दलों का गठबंधन 53 सीटों पर आगे है, जबकि पूर्व सेना प्रमुख गादी आइजेनकोट के नेतृत्व वाले मुख्य विपक्षी गठबंधन को 48 सीटें मिलने का अनुमान है।
अरब दलों के खाते में 19 सीटें जाती दिख रही हैं। इजरायल की संसद में बहुमत के लिए 61 सीटें जरूरी हैं। ऐसे में सरकार बनाने के लिए अलग-अलग दलों के बीच गठबंधन की बातचीत अहम होगी। राष्ट्रपति इसाक हर्जोग ने भी सभी पक्षों से खुले मन से बातचीत करने की अपील की है।
इजरायली चुनाव का गणित
इजरायल में मतदाता सीधे प्रधानमंत्री नहीं चुनते, बल्कि संसद के लिए पार्टियों को वोट देते हैं। इसके बाद दल मिलकर गठबंधन बनाते हैं। सरकार चलाने के लिए आम तौर पर 120 में से कम से कम 61 सांसदों का समर्थन जरूरी होता है।
नेतन्याहू को झटका क्यों लगा?
बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से इजरायल की राजनीति के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल रहे हैं। लेकिन उनकी सरकार को कई मुद्दों पर आलोचनाओं का सामना करना पड़ा है।
7 अक्टूबर 2023 का हमला: हमास के हमले के दौरान इजरायल की सुरक्षा व्यवस्था में हुई चूक को लेकर सरकार की जवाबदेही का सवाल उठा।
गाजा युद्ध: युद्ध को लेकर सरकार की रणनीति और उसके संचालन पर सवाल उठे। इजरायल के नागरिकों में सरकार और सेना के प्रदर्शन को लेकर अलग-अलग राय रही।
न्यायपालिका में बदलाव: नेतन्याहू सरकार के न्यायिक सुधारों के प्रस्तावों के खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए।
धार्मिक और राजनीतिक मतभेद: अति-रूढ़िवादी यहूदी समुदाय को सैन्य सेवा से छूट देने जैसे मुद्दे भी चुनावी बहस का हिस्सा रहे।
इन मुद्दों का यह मतलब नहीं है कि सभी मतदाता नेतन्याहू की नीतियों के खिलाफ हैं। कई मतदाता सैन्य कार्रवाई का समर्थन करते हुए भी सरकार के नेतृत्व या कामकाज से असंतुष्ट हो सकते हैं। द इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में इसी अंतर को रेखांकित किया है।
कौन हैं गादी आइजेनकोट, जो नेतन्याहू को चुनौती दे रहे हैं?
गादी आइजेनकोट (Gadi Eisenkot) इजरायल के पूर्व सैन्य प्रमुख और विपक्ष के प्रमुख नेताओं में से एक हैं। वह नेतन्याहू की सत्ता को चुनौती देने वाले राजनीतिक खेमे का नेतृत्व कर रहे हैं। उनके नेतृत्व वाले खेमे की राजनीति में शासन व्यवस्था, लोकतांत्रिक संस्थाओं और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे अहम हैं।
हालांकि, यहां एक बात समझना जरूरी है: नेतन्याहू का विरोध करने वाले सभी दल विचारधारा के स्तर पर एक जैसे नहीं हैं। वे सरकार बदलने की मांग पर साथ आ सकते हैं, लेकिन सुरक्षा नीति, फलस्तीन और धार्मिक मामलों पर उनके मतभेद बने रह सकते हैं।
इजरायली विश्लेषक योनातन तौवल के मुताबिक, आइजेनकोट के नेतृत्व वाली सरकार प्रशासनिक कामकाज और लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के मामले में मौजूदा सरकार से अलग हो सकती है। यह विश्लेषक का आकलन है, कोई घोषित चुनावी नतीजा नहीं।
इजरायल में राइट विंग और लेफ्ट विंग का क्या मतलब है?
इजरायल की राजनीति में दक्षिणपंथ और वामपंथ का मतलब भारत की राजनीति जैसा बिल्कुल नहीं है। यहां राष्ट्रीय सुरक्षा, फलस्तीन का भविष्य, कब्जे वाले वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियां और धर्म की राज्य में भूमिका बड़े मुद्दे हैं।
दक्षिणपंथ (Right Wing)
- फलस्तीनी राज्य के गठन का आम तौर पर विरोध।
- वेस्ट बैंक में यहूदी बस्तियों के समर्थन की प्रवृत्ति।
- राष्ट्रीय सुरक्षा और सैन्य ताकत पर जोर।
- धर्म और राज्य के संबंधों पर अपेक्षाकृत रूढ़िवादी दृष्टिकोण।
विपक्ष के उदारवादी और वामपंथी धड़े
- लोकतांत्रिक संस्थाओं और शासन व्यवस्था में सुधार पर जोर।
- कुछ दल फलस्तीन के मुद्दे पर बातचीत और क्षेत्रीय समझौते के लिए अधिक खुले हैं।
- वेस्ट बैंक में बस्तियों के विस्तार और हिंसा को लेकर अलग रुख।
- हालांकि, सुरक्षा और फलस्तीन के सवाल पर पूरा विपक्ष एकमत नहीं है।
इसलिए नेतन्याहू के खिलाफ वोट पड़ने का मतलब यह जरूरी नहीं कि इजरायल के मतदाता फलस्तीन को स्वतंत्र देश बनाने के समर्थन में आ गए हैं।
अरब पार्टियां कैसे बन सकती हैं किंगमेकर?
आंशिक नतीजों और शुरुआती अनुमानों में अरब नेतृत्व वाली पार्टियों को भी अच्छी संख्या में सीटें मिलने के संकेत थे। चूंकि दोनों प्रमुख खेमे बहुमत के आंकड़े से पीछे दिख रहे थे, इसलिए इन पार्टियों का समर्थन सरकार बनाने की कोशिशों में अहम हो सकता है।
लेकिन इसमें राजनीतिक मुश्किल भी है। नेतन्याहू और आइजेनकोट, दोनों ने पहले अरब पार्टियों के साथ गठबंधन करने को लेकर आपत्तियां जताई हैं। ऐसे में सवाल है कि क्या कोई खेमा अपने रुख में बदलाव करेगा या छोटे दलों के साथ दूसरे विकल्प तलाशेगा।
