US Iran Talk: अमेरिका-ईरान के बीच होने वाली दूसरे दौर की वार्ता को लेकर हलचल काफी तेज हो चुकी हैं। ईरान से बातचीत के लिए अमेरिका की तरफ से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और दामाद जेरेड कुशनर शनिवार को पाकिस्तान जाएंगे। दोनों नेता ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से बातचीत करेंगे।
गौरतलब है कि दूसरे दौरे को वार्ता में अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस शामिल नहीं हो सकते हैं। हालांकि अगर वार्ता में प्रगति होती है तो जेडी वेंस इस्लामाबाद जाने के लिए तैयार रहेंगे।
ओमान और रूस का दौरा भी करेंगे अराघची
बता दें कि ईरानी विदेश मंत्री पाकिस्तान पहुंच गए हैं। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए घोषणा की है कि वो पाकिस्तान, ओमान और रूस के दौरे पर निकल रहे हैं।
एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा, 'इस्लामाबाद, मस्कट और मॉस्को के दौरे पर रवाना हो रहा हूं। मेरी इन यात्राओं का मकसद द्विपक्षीय मुद्दों पर अपने साझेदारों के साथ करीबी समन्वय करना और क्षेत्रीय घटनाक्रमों पर विचार-विमर्श करना है। हमारे पड़ोसी हमारी प्राथमिकता हैं।' गौरतलब है कि अराघची ओमान की राजधानी मस्कट का भी दौरा करेंगे। पाकिस्तान के साथ ओमान भी ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ है।
रूस क्यों जा रहे अराघची
हालांकि, सबसे बड़ा सवाल है कि आखिर ईरान के विदेश मंत्री इन दो देशों के अलावा रूस का भी दौरा करेंगे। आखिर वो रूस क्यों जा रहे हैं, इसकी आधिकारिक जानकारी अभी तक सामने नहीं आई है। बताते चलें कि रूस ने कई बार ईरान के संवर्धित यूरेनियम को अपने पास रखने की पेशकश कर चुका है। वहीं, अमेरिका ने युद्ध खत्म करने के लिए जो शर्तें रखी हैं, उनमें ईरान का संवर्धित यूरेनियम सौंपना भी है। अमेरिका कभी इस बात को स्वीकार नहीं करेगा कि ईरान अपना यूरेनियम रूस को सौंपे।
रूस ने क्या दिया है प्रस्ताव?
रूस का मानना है कि यदि ईरान अपने पास मौजूद अतिरिक्त संवर्धित यूरेनियम उसे सौंप देता है, तो इससे परमाणु हथियारों की दौड़ को लेकर चिंताएं कम होंगी और क्षेत्रीय तनाव घटाने में भी मदद मिलेगी। मॉस्को की योजना केवल यूरेनियम को अपने कब्जे में लेने की नहीं है, बल्कि उसे एक सुरक्षित और उपयोगी परमाणु चक्र में शामिल करने की है।रूस कई बार यह प्रस्ताव दे चुका है कि ईरान तय सीमा से अधिक संवर्धित यूरेनियम उसे निर्यात करे। इसके बाद रूस अपनी उन्नत तकनीक की मदद से उसे प्रोसेस करेगा और फिर उसे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में इस्तेमाल के लिए ‘परमाणु ईंधन’ के रूप में वापस ईरान को सौंप देगा।
