Khamenei Funeral India Delegation: ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के राजकीय अंतिम संस्कार (State Funeral) को लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के गलियारों में एक बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। ईरान ने इस ऐतिहासिक अंत्येष्टि कार्यक्रम में आधिकारिक रूप से शामिल होने और संवेदना व्यक्त करने के लिए भारत सरकार और भारतीय प्रतिनिधिमंडल का सार्वजनिक रूप से आभार व्यक्त किया है।
ईरान की ओर से भारत को दिया गया यह धन्यवाद ऐसे समय में आया है, जब ईरानी मीडिया में यह दावा किया जा रहा है कि अमेरिका के कड़े राजनयिक दबाव (Diplomatic Pressure) के चलते दुनिया के कम से कम 13 देशों ने या तो इस कार्यक्रम से दूरी बना ली या फिर अपनी भागीदारी को बेहद सीमित कर दिया।
मार्को रुबियो पर 'दबाव' बनाने का आरोप
ईरान की अर्ध-आधिकारिक समाचार एजेंसी 'तस्नीम'की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अयातुल्ला खामेनेई का अंतिम संस्कार हाल के इतिहास के सबसे बड़े और सबसे करीब से देखे जाने वाले राजनयिक आयोजनों में से एक था। इसे लेकर पर्दे के पीछे भारी कूटनीतिक खींचतान चल रही थी।
व्यक्तिगत संपर्क का दावा: रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने खुद कम से कम पांच अरब देशों की सरकारों से व्यक्तिगत संपर्क किया था और उनसे तेहरान में होने वाले अंतिम संस्कार में शामिल न होने का आग्रह किया था।
'गैर-दोस्ताना कृत्य' की चेतावनी: इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) से जुड़ी इस एजेंसी ने बताया कि अमेरिकी दूतावासों ने कई सरकारों को स्पष्ट चेतावनी दी थी कि खामेनेई के अंतिम संस्कार में शामिल होने को वाशिंगटन के प्रति एक "गैर-दोस्ताना कृत्य" (Unfriendly Act) के रूप में देखा जाएगा, जिसका असर उनके द्विपक्षीय संबंधों पर पड़ सकता है।
सहायता रोकने की धमकी: कुछ अफ्रीकी देशों को कथित तौर पर चेतावनी दी गई थी कि यदि वे तेहरान प्रतिनिधिमंडल भेजते हैं, तो अमेरिका से मिलने वाली विकास सहायता (Development Aid) में कटौती की जा सकती है। इसके चलते 3 पूर्वी यूरोपीय, 5 अफ्रीकी, 2 खाड़ी देशों और 2 बड़े पूर्वी एशियाई देशों सहित कुल 13 देशों ने अपने कदम पीछे खींच लिए।
ईरानी दूतावास ने कहा- भारत के इस कदम को कभी नहीं भूलेगा ईरान'
इन तमाम वैश्विक दबावों के बीच, भारत ने ईरान के साथ अपने ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों को प्राथमिकता दी। नई दिल्ली में स्थित ईरानी दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'X' पर एक भावुक और आधिकारिक पोस्ट साझा कर भारत का धन्यवाद किया।
ईरानी दूतावास का आधिकारिक संदेश, 'इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान का दूतावास भारत की मित्र सरकार, वहां की जनता और विशेष रूप से सरकार की ओर से आए आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल के प्रति हार्दिक आभार और सच्ची सराहना व्यक्त करता है। भारत की यह उपस्थिति दोनों देशों के बीच दीर्घकालिक और स्थायी संबंधों की पुष्टि करती है। ईरान के लोग दोस्ती, करुणा और सच्चे सम्मान के इस भाव को कभी नहीं भूलेंगे।'
भारत की तरफ से कौन-कौन हुआ शामिल?
ईरान में आयोजित इस राजकीय अंतिम संस्कार में भारत सरकार का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक उच्च-स्तरीय आधिकारिक दल तेहरान गया था। इसमें शामिल थे:
-पवित्र मार्गेरिटा (केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री)
-लेफ्टिनेंट जनरल सैयद अता हसनैन (रिटायर्ड) (बिहार के राज्यपाल)
इस सरकारी प्रतिनिधिमंडल के साथ भारत के कई अन्य प्रमुख राजनीतिक और धार्मिक नेता भी एकजुटता दिखाने पहुंचे थे, जिनमें जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती, पूर्व विदेश मंत्री सलमान खुर्शीद और भारत के विभिन्न धार्मिक संप्रदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख धर्मगुरु शामिल थे।
भारत की 'संतुलित' विदेश नीति का एक और उदाहरण
राजनयिक विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और उसके सहयोगियों के दबाव के बावजूद भारत का इस अंतिम संस्कार में शामिल होने का निर्णय नई दिल्ली की 'रणनीतिक स्वायत्तता' और संतुलित विदेश नीति को दर्शाता है।
भारत जहां एक ओर अमेरिका, इजरायल और प्रमुख अरब देशों (जैसे यूएई और सऊदी अरब) के साथ बेहद मजबूत रणनीतिक और आर्थिक संबंध साझा करता है, वहीं दूसरी ओर वह ईरान के साथ भी अपने पुराने सांस्कृतिक संबंधों और चाबहार बंदरगाह जैसे रणनीतिक हितों को बरकरार रखता है। मध्य पूर्व के विशेषज्ञों के मुताबिक, सऊदी अरब, कतर और ओमान ने भी इस कार्यक्रम में अपने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजे थे, जबकि यूएई, कुवैत और बहरीन इससे दूर रहे।
खामेनेई के पार्थिव शरीर को मध्य तेहरान में विशाल जनसमूह के बीच अंतिम विदाई देने के बाद, आगे की रस्मों के लिए धार्मिक शहर कौम (Qom) और फिर इराक के पवित्र शहरों नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा, जिसके बाद अंत में उन्हें ईरान के मश्हाद (Mashhad) में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा।
