China on Iran: अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने दुनिया भर में ईरान के वित्तीय संपर्कों के खिलाफ जिस आर्थिक हमले की घोषणा की है, उसमें एक बड़ी चुनौती सामने आ सकती है, और वह चुनौती चीन है। चीन ने इसके संकेत भी दे दिए हैं। चीन का कहना है कि वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट द्वारा ईरान के वैश्विक वित्तीय संबंधों पर घोषित आर्थिक हमले में एक बड़ी खामी हो सकती है।
बीजिंग ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और उसका मुख्य तेल खरीदार है। एक तरफ अमेरिका इस्लामिक गणराज्य ईरान को उसके आर्थिक साझेदारों से अलग-थलग करने का प्रयास कर रहा है, वहीं दूसरी ओर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगले महीने चीनी नेता शी जिनपिंग की मेजबानी करने की तैयारी में हैं ताकि दोनों देशों के बीच कायम नाजुक व्यापारिक संधि को बनाए रखा जा सके।
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा ईरान को पूरी तरह से आर्थिक रूप से अलग-थलग करने के लिए शुरू किए गए 'ऑपरेशन इकोनॉमिक आउटकास्ट' की सफलता पर अब सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि चीन ईरान का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार और उसके कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है।
ट्रंप-शी जिनपिंग शिखर सम्मेलन का दबाव
अमेरिकी विदेश नीति विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ईरान पर दबाव बनाने और चीन के साथ अपने नाजुक व्यापारिक संबंधों को बचाए रखने के बीच फंसा हुआ है। अगले महीने डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। सीएसआईएस (CSIS) के वरिष्ठ सलाहकार एडगार्ड कागन के अनुसार, अमेरिकी वित्त मंत्री ने अपने बयानों में चीन को सीधे तौर पर निशाना बनाने से परहेज किया है ताकि इस हाई-प्रोफाइल समिट में कोई बाधा न आए।
चीन का रुख: अवैध एकतरफा प्रतिबंधों का विरोध
ट्रंप प्रशासन के कड़े बयानों के जवाब में बीजिंग ने स्पष्ट किया है कि ईरान के साथ उसका सहयोग अंतरराष्ट्रीय कानूनों के दायरे में है। चीन ईरान के कुल तेल निर्यात का 80% से अधिक हिस्सा खरीदता है।
चीनी विदेश मंत्रालय की प्रतिक्रिया
चीनी प्रवक्ता लिन जियान ने कहा कि चीन-ईरान सहयोग को बाधित नहीं किया जाना चाहिए और चीन अपने हितों की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाएगा। चीन ने अमेरिका के एकतरफा प्रतिबंधों को अवैध बताया है।
चीन क्या कदम उठाएगा?
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन अमेरिका से सीधे टकराव से बचेगा, लेकिन वह अमेरिकी प्रतिबंधों की भावना का पूरी तरह पालन भी नहीं करेगा। स्टिमसन सेंटर की विशेषज्ञ सन यून के अनुसार, अगर अमेरिका का उद्देश्य ईरान की सरकार को गिराना है, तो चीन इसका समर्थन नहीं करेगा। लेकिन अगर उद्देश्य लाल सागर/हॉर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव कम करना है, तो चीन अपने तेल आयात में थोड़ी कटौती करके अमेरिका को सहयोग का संकेत दे सकता है।
आगामी ट्रंप-शी जिनपिंग बैठक को देखते हुए न तो वाशिंगटन और न ही बीजिंग इस मुद्दे पर बड़ा द्विपक्षीय तनाव चाहता है। अमेरिका को यह स्वीकार करना होगा कि चीन उसकी सभी मांगों को नहीं मानेगा, वहीं चीन को भी अमेरिका को शांत रखने के लिए तेल आयात में कुछ हद तक ढील देनी पड़ सकती है।
