Happy Father's Day: हर साल जून महीने के तीसरे संडे को फादर्स डे मनाया जाता है। इस साल 18 जून को फादर्स डे मनाया जा रहा है। इस दिन को लोग अलग-अलग तरीकों से मनाते हैं। इसी क्रम में हम आपको फादर्ड डे पर लिखा एक प्यारा पत्र आपको पढ़ा रहे हैं। इस पत्र को पढ़कर आपका दिल खुश हो जाएगा। यह पत्र जीएटी यूपी के सहायक आयुक्त ने अपने पिता के नाम लिखा है-
'मेरे पूज्य पिता जी,
आज मन किया कि आपके बारे में अपने मन के भाव लिखूं । ऐसा नहीं है कि इससे पहले कभी मन नहीं किया कि आपके बारे में कुछ लिखूं, लेकिन जब- जब भी आपके बारे में लिखने का प्रयास किया, शब्द या तो तिरोहित हो गए या भावों की सरिता के भंवर में उलझ कर रह गए । एक पिता के रूप में आपका मूल्यांकन कैसे करूं, क्योंकि जब आज पिता के रूप में उन कर्त्तव्यों का निर्वहन कर रहा हूं तो पाता हूं कि मैं कहीं से आपकी ठीक से छाया भी नहीं बन पा रहा हूं। कैसे कहूं कि आप कैसे थे? कभी लगा आपसे कठोर शायद ही कोई और हो और कभी लगा कि हां, आप सच में चिन्ता करते थे।
जब आप शाम को घर लौटते तो जैसे पूरे घर में एक पल को सन्नाटा सा छा जाता। धीरे- धीरे सांस सी लौटती। फिर सब आपका मूड भांपने की कोशिश करते। आज भी याद है कि जब भी स्कूल की किसी चीज़ की जरूरत पड़ती तो बड़ी हिम्मत करके आपसे कह पाते थे, और हर छोटी- बड़ी चीज़ का जब तक आप हिसाब ना ले लेते और सन्तुष्ट ना हो जाते, तब तक उस चीज का मिलना असम्भव सा ही होता । उस समय लगता था कि आपको हम बच्चों पर भरोसा क्यों नहीं? आज समझ आता है कि वो भरोसे की कमी के कारण नहीं था, बल्कि नसीहत होती थी कि किसी भी वस्तु का पूर्ण उपभोग करना चाहिए, ये नहीं कि बच्चे ने मांगा तो आपने झड़ी लगा दी।
रिश्तों को निभाने का हुनर सिखाते थे पिता
चूंकि बचपन में हर छोटी- बड़ी चीज पाने के लिए संघर्ष करते देखा तो जब खुद पिता बना तो सोचा अपने बच्चों को कभी किसी चीज को पाने के लिए संघर्ष नहीं करने देंगे और अब लगता है शायद यहीं चूक हो गई। बच्चों ने कोई भी मांग की तो दिल खोलकर एक के बदले दो या ज्यादा चीजें लाकर दीं और बस जाने-अनजाने हम बच्चों को वस्तुओं की, धन की कद्र कराना भूल गए। ये बात रिश्तों पर भी लागू है। आप जब भी कोई रिश्तेदार या अतिथि आता तो हमें एकदम रोबोट की तरह उनके पैर छूने से लेकर उनकी सेवा तक बिना मुंह खोले लगा देते। आज एहसास होता है कि रिश्तों को निभाते समय कैसे अपने भावों पर नियन्त्रण करते हुए उन्हें निभाया जाता है- ये आप सिखाते थे। हम अपने बच्चों को शायद ये सब सिखा नहीं पाए।
आज एहसास करता हूं कि पिता को समझना किसी अबूझ पहली से कम नहीं। मां तो हमेशा ही ममता, करुणा और प्रेम की मूरत के रूप में ही दिखती हैं लेकिन पिता? कभी लगा शायद दया नाम की चिड़िया से कभी आपका वास्ता नहीं पड़ा। एक बार जो आप फैसला ले लेते वो शायद ही कभी बदला हो। फिर चाहे हम लाख सिर पटक लेते। कभी- कभी लगता था कि वाकई क्या पिता इतने कठोर होते हैं? लेकिन मुझे याद है जब भी मैं बीमार पड़ता, आप बीमार क्यों पड़े, इस पर पहले खूब डांट पिलाते, फिर तमाम नसीहतें देते लेकिन इलाज में कोई कोर- कसर भी ना छोड़ते। कभी स्कूल जाने में देर हो जाती तो साईकिल पर बिठा कर छोड़ आते, हालांकि पूरे रास्ते डांट जरूर पिलाई जाती। याद नहीं कब आपने प्यार से गले लगाया हो? बस एक बार जब नौकरी पाई।
हालांकि फिर नसीहतें देते- देते एकाध बार कठोर भी बन गए। बहुत सारी नसीहतें आज भी याद हैं लेकिन आश्चर्य की बात है जब-जब भी मैं उन नसीहतों से भटका, नुकसान जरूर उठाया। आज लगता है- पिता शायद सबसे अच्छा भविष्यदृष्टा भी होता है। अपने बहुत सारे अनुभवों को वो नसीहतों रूपी करेले जैसे स्वाद में प्रस्तुत करता है लेकिन आज समझ आता है कि नुकसान मीठा करता है, करेला नहीं। ज्यादातर बेहतरीन औषधियां कड़वी ही तो होती हैं, तो पिता के लिए यदि कोई एक सबसे अच्छा शब्द समझ आता है तो वो है- औषधि। एक ऐसी औषधि जो जानता है कि बीमारी क्या है और उसका इलाज क्या है?
एक सर्जन की तरह होता है पिता, बस देखने में उसका मिजाज थोड़ा निर्मम और कठोर होता है। आज जब पिता की भूमिका में हूं तो देख रहा हूं कि बहुत सारी बातें जो हमें उनसे जीवन में उतारनी चाहिए थीं, नहीं उतारीं। बच्चों को स्वतंत्रता और उनको कोई कष्ट ना हो, उसके लिए जो संसाधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध कराये हैं, उनसे बच्चे सुधरने या कुछ बनने के स्थान पर बिगड़ ही अधिक रहे हैं। अब समझ नहीं आता कि आप वाला कठोर रूप ही धारण करूं या बच्चों के मन को कोई ठेस न पहुंचे- इस विचारधारा पर अमल करुं। ये बात मैं इसलिए कह रहा हूं कि कुदरत कोई रहम नहीं करती। जीवन की प्रयोगशाला में आपको संघर्षों की भट्टी में तपाया तो जाएगा ही, लेकिन उनको संघर्ष करने की तो हमने आदत ही नहीं डाली।
अब समझ आता है कि यौवन काल में आगे बढ़ने की जद्दोजहद, तमाम असफलताओं से जूझने और ना बिखरने की आदत तो आप बचपन में अनजाने ही डाल चुके थे। हां, सच कहता हूं, उस समय आपसे बुरा इंसान शायद ही कोई लगा हो, जो सिर्फ तानाशाही पूर्वक आदेश देने और उन्हें मनवाने के लिए बना हो, लेकिन आज समझ आया कि वो तानाशाही नहीं थी, बल्कि जीवन में आगे आने वाली कठोर परीक्षाओं से लड़ने, एक अच्छे प्रशासक के रूप में ढालने की प्रक्रिया थी। आज लगता है काश आपने थोड़ी और कठोरता दिखाई होती, तो ज्ञान और अनुशासन की कुछ और बूंदें झोली में गिर जातीं तो आज जहां हूं, उससे शायद कहीं और ऊपर होता। आज जैसे- जैसे जीवन की सांझ नजदीक आ रही है, वैसे- वैसे लगता है मेरे पिता सच में सही थे और शायद दुनिया के सबसे अच्छे पिता भी।'
(लेखक डॉ. श्याम अनन्त सहायक आयुक्त, जी.एस.टी. उत्तर प्रदेश के पद पर कार्यरत हैं। वह लेखन के अलावा कविता, प्रेरण व्याख्यान, कैरियर व लाइफ कोच तथा ज्योतिष में रुचि रखते हैं।)
गौरतलब है कि फादर्स डे को मनाने की शुरुआत संयुक्त राज्य अमेरिका में हुई थी। दरअसल 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में सोनोरा स्मार्ट डोड ने मदर्स डे की तर्ज पर पिता को सम्मानित करने के लिए कोई एक खास दिन रखने पर जोर दिया था। फादर्स को पहली बार 19 जून 1910 को वाशिंगटन के स्पोकेन में मनाया गया था। राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने 1972 में जून में तीसरे रविवार को फादर्स डे मनाना तय किया था।
