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गर्मी को डिग्री सेल्सियस में ही क्यों मापते हैं, फारेनहाइट या केल्विन में क्यों नहीं, तापमान बढ़ने पर क्यों बढ़ती है डिग्री?

मौसम की गर्मी को मापने के लिए 'डिग्री सेल्सियस' का इस्तेमाल इसलिए होता है क्योंकि यह पानी के जमने और उबलने के सरल सिद्धांत 0 डिग्री से 100 डिग्री पर आधारित है। तापमान बढ़ने पर हवा के कणों में हलचल तेज होती है, जिससे थर्मामीटर में डिग्री का आंकड़ा ऊपर बढ़ता है।

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Temperature

डिग्री सेल्सियस पैमाने का आविष्कार स्वीडन के महान वैज्ञानिक 'एंडरसन सेल्सियस' ने किया था। उन्होंने इस पैमाने को इस तरह डिजाइन किया कि यह पृथ्वी पर जीवन के सबसे महत्वपूर्ण आधार यानी 'पानी' से सीधा जुड़ा हुआ है। सेल्सियस स्केल में पानी के जमने के बिंदु (Freezing Point) को 0 डिग्री और पानी के उबलने के बिंदु (Boiling Point) को 100 डिग्री सेल्सियस माना गया है। 0 से 100 के बीच की गिनती को समझना, याद रखना और दैनिक जीवन में गणना करना इंसानी दिमाग के लिए बहुत आसान है, इसलिए दुनिया के अधिकांश देशों ने मौसम के तापमान को मापने के लिए सेल्सियस को ही अपना मानक (Standard) बना लिया। जब हम कहते हैं कि आज 40 डिग्री सेल्सियस तापमान है, तो हमारा दिमाग तुरंत समझ जाता है कि यह पानी के उबलने की स्थिति 100 डिग्री सेल्सियस की तरफ बढ़ रहा है, यानी गर्मी बहुत ज्यादा है।

फारेनहाइट और केल्विन का इस्तेमाल कहां होता है?

ऐसा नहीं है कि फारेनहाइट या केल्विन का इस्तेमाल नहीं होता, लेकिन उनके क्षेत्र अलग हैं। फारेनहाइट पैमाने का उपयोग मुख्य रूप से मानव शरीर के तापमान (जैसे बुखार) को मापने के लिए किया जाता है। जब डॉक्टर कहता है कि आपको 102 डिग्री बुखार है, तो वह फारेनहाइट होता है (अगर यह सेल्सियस होता, तो शरीर उबलने लगता)। अमेरिका जैसे कुछ गिने-चुने देशों में आज भी मौसम के लिए फारेनहाइट का इस्तेमाल होता है, लेकिन वैश्विक स्तर पर यह उतना लोकप्रिय नहीं है क्योंकि इसका गणित 32F पर पानी जमता है और 212 F पर उबलता है) थोड़ा पेचीदा है। वहीं दूसरी ओर, 'केल्विन' K एक वैज्ञानिक पैमाना है। विज्ञान की प्रयोगशालाओं और अंतरिक्ष अनुसंधान में केल्विन का उपयोग होता है क्योंकि यह 'परम शून्य' (Absolute Zero) यानी 273.15°C से शुरू होता है, जहाँ ब्रह्मांड की हर चीज पूरी तरह जम जाती है। आम जनता के लिए केल्विन में मौसम समझना बेहद मुश्किल हो जाएगा, क्योंकि 25°C की सुहावनी गर्मी को केल्विन में लगभग 298K कहा जाएगा।

तापमान बढ़ने पर क्यों बढ़ती है 'डिग्री'?

अब बात करते हैं कि गर्मी बढ़ने पर डिग्री का नंबर क्यों बढ़ता है। विज्ञान के नजरिए से देखें तो 'तापमान' कुछ और नहीं बल्कि किसी वस्तु या हवा में मौजूद कणों (Atoms and Molecules) की गतिज ऊर्जा (Kinetic Energy) की माप है। जब सूरज की तेज किरणें पृथ्वी की सतह और हवा को गर्म करती हैं, तो हवा में मौजूद गैसों के छोटे-छोटे कण बहुत तेजी से आपस में टकराने और कंपन (Vibrate) करने लगते हैं। कणों की यह हलचल जितनी तेज होगी, उतनी ही अधिक ऊष्मा (Heat) पैदा होगी। थर्मामीटर या तापमान मापने वाले यंत्र के अंदर मौजूद संवेदनशील तत्व (जैसे मरकरी या डिजिटल सेंसर) इस आणविक हलचल या गर्मी को भांप लेते हैं। चूंकि सेल्सियस स्केल को इस तरह बनाया गया है कि कम गर्मी पर पैमाना नीचे और अधिक गर्मी (कणों की तेज हलचल) पर पैमाना ऊपर की तरफ बढ़ता है, इसलिए जैसे-जैसे वातावरण में ऊष्मा बढ़ती है, थर्मामीटर में पारा ऊपर चढ़ता है और डिग्री का नंबर 30, 40 या 45 के पार पहुंच जाता है।

Richa Tripathi
रिचा त्रिपाठीauthor

रिचा त्रिपाठी टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में बिजनेस डेस्क पर सीनियर कॉपी एडिटर के रूप में कार्यरत हैं। मीडिया इंडस्ट्री में 7 वर्षों के अनुभव के साथ रिचा, पर्सनल फाइनेंस, स्टॉक मार्केट, टैक्स प्लानिंग और अर्थव्यवस्था से जुड़े विषयों पर मजबूत पकड़ रखती हैं। अब तक 8,000 से अधिक कंटेंट लिख चुकी रिचा की विशेषता है—जटिल वित्तीय जानकारियों को सरल, स्पष्ट और भरोसेमंद तरीके से पाठकों तक पहुंचाना। वह ऐसी स्टोरीज तैयार करती हैं जो न केवल जानकारीपूर्ण होती हैं, बल्कि आम पाठक की वित्तीय समझ को बेहतर बनाने में भी मदद करती हैं।

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