टेक एंड गैजेट्स

टेक्नोलॉजी और AI का कमाल: इंजीनियर ने एआई की मदद से बनाया कैंसर वैक्सीन, कुत्ते को मिली नई जिंदगी

ऑस्ट्रेलिया के टेक विशेषज्ञ पॉल कोनिंघम ने दावा किया है कि उन्होंने ChatGPT और गूगल डीपमाइंड के AlphaFold की मदद से अपने कुत्ते के लिए एक कस्टम mRNA कैंसर वैक्सीन तैयार किया, जिससे उसके ट्यूमर को कम करने में मदद मिली।

Image

AI Engineer creates cancer vaccine with the help of AI tries to save dog's life/photo- LinkedIn

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल अब केवल कोड लिखने या ऑटोमेशन तक सीमित नहीं रहा है। यह गंभीर बीमारियों के इलाज में भी मददगार साबित हो सकता है। ऑस्ट्रेलिया के टेक एक्सपर्ट पॉल कोनिंघम ने दावा किया है कि उन्होंने ChatGPT और गूगल डीपमाइंड के AlphaFold की मदद से अपने कुत्ते के लिए एक कस्टम mRNA कैंसर वैक्सीन तैयार किया, जिससे उसके ट्यूमर को कम करने में मदद मिली।

कुत्ते को कैंसर होने के बाद लिया बड़ा फैसला

पॉल कोनिंघम ने 2019 में एक एनिमल शेल्टर से स्टैफी-शारपेई नस्ल के कुत्ते ‘रोजी’ को गोद लिया था। करीब पांच साल बाद रोज़ी को कैंसर होने का पता चला। पारंपरिक इलाज जैसे कीमोथेरेपी पर हजारों डॉलर खर्च करने के बावजूद ट्यूमर में कोई खास कमी नहीं आई। इसके बाद पॉल ने AI की मदद से खुद समाधान तलाशने का फैसला किया।

DNA सीक्वेंसिंग से खोजी बीमारी की वजह

कैंसर के कारण को समझने के लिए पॉल ने रोजी के डीएनए की सीक्वेंसिंग कराने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स के रामाचिओटी सेंटर फॉर जीनोमिक्स से संपर्क किया, जहां लगभग 3000 ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (करीब 2 लाख रुपये) में जीनोमिक सीक्वेंसिंग की गई।

इसके बाद पॉल ने रोजी के स्वस्थ डीएनए और ट्यूमर वाले डीएनए की तुलना कर यह पता लगाने की कोशिश की कि बीमारी किस वजह से हो रही है। उन्होंने बताया कि यह वैसा ही है जैसे किसी कार के नए इंजन और लंबे समय तक चले इंजन की तुलना करके उसमें आई खराबी को ढूंढना।

AlphaFold से समझा प्रोटीन का व्यवहार

इसके बाद पॉल ने गूगल डीपमाइंड के AI सिस्टम AlphaFold का उपयोग किया, जो प्रोटीन की संरचना और उसके कार्य को समझने में मदद करता है। इस तकनीक की मदद से उन्होंने जीन में हुए म्यूटेशन की पहचान की और यह समझा कि ट्यूमर के इलाज के लिए कौन सी दवाएं उपयुक्त हो सकती हैं।

रोजी को दिया गया mRNA वैक्सीन

इन जानकारियों के आधार पर पॉल और यूनिवर्सिटी ऑफ न्यू साउथ वेल्स की टीम ने मिलकर रोज़ी के लिए कस्टम mRNA वैक्सीन तैयार किया। mRNA वैक्सीन शरीर की कोशिकाओं को निर्देश देता है कि वे एक सुरक्षित प्रोटीन बनाएं, जिससे इम्यून सिस्टम सक्रिय होकर बीमारी से लड़ सके। रोजी को दिसंबर में इस वैक्सीन का पहला इंजेक्शन दिया गया और उसके बाद बूस्टर डोज भी दी गईं। रिपोर्ट के अनुसार वैक्सीन लेने के बाद ट्यूमर का आकार काफी कम हो गया, हालांकि बीमारी पहले से ही उन्नत अवस्था में थी।

नैतिक मंजूरी पाने में लगी लंबी प्रक्रिया

हालांकि इस प्रयोग को करने के लिए पॉल को कई नियमों और मंजूरियों से गुजरना पड़ा। उन्होंने बताया कि रोज़ी पर दवा परीक्षण की अनुमति पाने में करीब तीन महीने का समय लगा और इसके लिए उन्हें हर रात कई घंटों तक काम करके लगभग 100 पन्नों का दस्तावेज तैयार करना पड़ा।

इलाज से मिला अतिरिक्त समय और बेहतर जीवन

पॉल कोनिंघम का कहना है कि वह यह दावा नहीं कर रहे कि यह कैंसर का पूर्ण इलाज है, लेकिन इस उपचार से रोजी को अधिक समय और बेहतर जीवन मिल सकता है। फिलहाल वह दूसरे ट्यूमर के इलाज के लिए एक और वैक्सीन पर काम कर रहे हैं।

डिस्क्लेमर: Times Now Navbharat इस तरह के किसी भी प्रयोग को प्रोत्साहित नहीं करता है और ना ही एआई से पूछकर किसी बिमारी के इलाज की सलाह देता है। यह खबर सिर्फ सूचना के लिए है।

Pradeep Pandey
प्रदीप पाण्डेयauthor

प्रदीप पाण्डेय टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में टेक और ऑटो बीट पर कंटेंट तैयार करते हैं। डिजिटल मीडिया में 10 वर्षों के अनुभव के साथ प्रदीप तकनीक की दुनिया को समझने और उसे आम पाठकों तक सरल व उपयोगी रूप में पहुंचाने के लिए जाने जाते हैं। प्रदीप अब तक 11,000 से अधिक आर्टिकल्स लिख चुके हैं। वह गैजेट रिव्यू, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, टेक टिप्स और नवीनतम टेक इनोवेशन पर लगातार काम करते हैं। एआई टूल्स पर एक्सपेरिमेंट करना, नए ऐप्स टेस्ट करना और टेक से जुड़े प्रैक्टिकल सॉल्यूशंस खोजने में उनकी खास रुचि है।

और पढ़ें
End of Article