अध्यात्म

कौन हैं सबरीमाला मंदिर के भगवान अयप्पा? जानिए क्यों है यह मंदिर इतना खास और चमत्कारी

Sabarimala Temple: केरल में स्थित सबरीमाला मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा तीर्थस्थल है। सबरीमाला में प्रभु के दर्शन करने मात्र से सभी पाप नष्ट हो जाते हैं। यहां प्रभु को इरुमुदिकट्टू का प्रसाद अर्पित किया जाता है। आइए जानते हैं कि भगवान अयप्पा कौन हैं और इनकी पूजा से क्या लाभ मिलते हैं।

सबरीमाला मंदिर (1)

Sabarimala Temple: केरल की घनी हरियाली और पहाड़ों के बीच बसा सबरीमाला मंदिर भारत के सबसे बड़े तीर्थ स्थलों में से एक है। यह मंदिर भगवान अयप्पा को समर्पित है। हर साल 5-6 करोड़ भक्त यहां 'स्वामी शरणम् अयप्पा' का जयकारा लगाते हुए आते हैं। इसके साथ उनके दर्शन करते हैं और उन्हें इरुमुदिकट्टू अर्पित कर आशीर्वाद पाते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि भगवान अयप्पा कौन हैं? अगर नहीं तो आइए जानते हैं कि कौन हैं भगवान अयप्पा।

कौन हैं भगवान अयप्पा

भगवान अयप्पा भगवान शिव और विष्णु के पुत्र हैं। इनको हरिहर पुत्र कहा जाता है। इसमें हरि मतलब भगवान श्रीहरि विष्णु और हर का मतलब शिव है।पौराणिक कथा के अनुसार, जब देवता और असुर मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे, तब अमृत निकलते ही पहले पान करने के लिए देवताओं और असुरों में युद्ध हो गया। इसके लिए भगवान विष्णु ने मोहिनी रूप रखा। प्रभु का यह स्वरूप बेहद मंत्रमुग्ध कर देने वाला था। इस रूप को देखभर भगवान शिव उनपर मोहित होकर स्खलित हो गए। इस संयोग एक बालक का जन्म हुआ, जिन्हें 'शास्ता' या 'अयप्पा' नाम मिला।

राजा राजशेखर पंडलम ने जंगल में रोते हुए इस दिव्य बालक को पाया और उन्हें अपना पुत्र बनाकर पाला। इसके बाद में जब रानी के अपने पुत्र का जन्म हुआ तो कुछ दरबारियों ने अयप्पा को मारने की साजिश रची। इसके बाद अयप्पा ने अपना असली स्वरूप दिखाया और कहा कि 'मैं यहां एक विशेष कार्य के लिए आया हूं।' इसके बाद वे तीर चलाकर सबरीमाला पहाड़ी पर पहुंचे और वहां समाधि ले ली। उसी स्थान पर आज सबरीमाला मंदिर है।

'महिषी हंता' भी है नाम

दक्षिण भारत की एक और प्रसिद्ध कथा है कि राक्षसी महिषी को वरदान था कि उसे न विष्णु मार सकते हैं, न शिव मार सकते हैं। केवल शिव-विष्णु के संयोग से जन्मा पुत्र ही उसका वध कर सकता है। भगवान अयप्पा ने महिषी का वध किया और उसी समय एक दिव्य स्त्री (मालिकपुरथम्मा) प्रकट हुईं। उन्होंने अयप्पा से विवाह की इच्छा जताई, लेकिन अयप्पा ने कहा 'मैं निष्काम ब्रह्मचारी हूं। जब तक यहां कन्नि-स्वामी (पहली बार आने वाले भक्त) आएंगे, तब तक मैं ब्रह्मचर्य का पालन करूंगा।' मान्यता है कि आज भी सबरीमाला में नए भक्त आते हैं, इसलिए अयप्पा ब्रह्मचारी हैं।

इरुमुदिकट्टू किया जाता है प्रभु को अर्पित

सबरीमाला मंदिर में भगवान अयप्पा को इरुमुदिकट्टू अर्पित किया जाता है। यहां पर सोने की 18 पवित्र सीढ़ियां हैं। भगवान अयप्पा के दर्शन के लिए भक्त अपने सिर पर इरुमुदिकट्टू पहनते हैं। यह एक थैला मात्र नहीं है। यह प्रभु के लिए किए जाने वाले अनष्ठानों में से एक है। इसको भक्त के 41 दिनों के व्रत और समर्पण का प्रतीक माना जाता है।

इरुमुदिकट्टू में होते हैं ये सामान

इरुमुदिकट्टू के एक भाग में घी से भरा नारियल और भगवान को अर्पित किया जाने वाला प्रसान और सूखे चावल होते हैं। इसके साथ ही अन्य पूजा की सामग्री जैसे कपूर, रेशम, अवल, फूल, पान आदि भी होता है। वहीं, पिनमुड़ी का यूज भक्त यात्रा के दौरान पड़ने वाली आवश्यकताओं के लिए करते हैं।

वहीं, कुछ जगहों पर नादुमुदी नाम की प्रथा भी चलती है, इसमें चढ़ावे के रूप में दिए जाने वाले सिक्के, चढ़ावे की रसीदें आदि को एक पोटली में बांधकर कुछ जगहों पर रखा जाता है।

यह मंदिर क्यों है इतना खास?

हिन्दू धर्म का अनोखा संगम यहां शिव और विष्णु के पुत्र की पूजा होती है। मंदिर में वैष्णव और शैव दोनों परंपराएं एक साथ चलती हैं। सबरीमाला जाने वाले भक्त 41 दिन का कठोर व्रत रखते हैं । इस दौरान काला या नीला कपड़ा पहनते हैं, जमीन पर सोते हैं, ब्रह्मचर्य पालन करते हैं और रोज दो बार पूजा करते हैं। इस व्रत को 'मंडल व्रत' कहते हैं।

मंदिर तक पहुंचने के लिए 18 सोने की सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। ये 5 इन्द्रियां, 8 राग, 3 गुण, 1 अहंकार और 1 माया का प्रतीक हैं। इनसे ऊपर उठकर ही अयप्पा के दर्शन होते हैं। इसके साथ ही मकर ज्योति एक आकाश में प्रकट होने वाली दिव्य रोशनी है, जो हर साल 14 जनवरी को मकर संक्रांति के दिन पंपा घाटी में दूर पहाड़ी पर तीन बार प्रकट होती है। लाखों भक्त इसे अयप्पा का दर्शन मानते हैं।

मंदिर में है समानता

यहां अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का कोई भेद नहीं है। सब एक जैसे काले कपड़े पहनकर 'स्वामीये शरणम् अयप्पा' बोलते हैं। प्राचीन काल से ही 10 साल तक की लड़कियों और 50 साल से ऊपर की महिलाओं को छोड़कर अन्य महिलाओं का प्रवेश वर्जित था, क्योंकि अयप्पा निष्काम ब्रह्मचारी हैं। 2018 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब सभी आयु की महिलाएं जा सकती हैं पर अधिकांश महिला भक्त अभी भी परंपरा का सम्मान करती हैं।

पापों से मिलती है मुक्ति

मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से 41 दिन व्रत रखकर सबरीमाला पहुंचता है, उसके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं और मोक्ष का मार्ग खुल जाता है। यहां दर्शन मात्र से मन को ऐसी शांति मिलती है जो कहीं और नहीं मिलती है। हर साल नवंबर-दिसंबर में दो महीने के लिए मंदिर खुलता है और मकर ज्योति के साथ बंद हो जाता है।

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Mohit Tiwari
Mohit Tiwari Author

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ... और देखें

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