Vishwakarma Puja 20236Vrat Katha in Hindi: हिंदू पंचांग के अनुसार, हर साल कन्या संक्रांति के अवसर पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है। यह दिन शिल्प, निर्माण और तकनीकी कार्यों से जुड़े लोगों के लिए विशेष माना जाता है। मान्यता है कि भगवान विश्वकर्मा देवताओं के दिव्य शिल्पकार हैं और उन्होंने अपनी कला व ज्ञान से कई अद्भुत रचनाओं का निर्माण किया। इसलिए विश्वकर्मा पूजा के दिन मशीनों, औजारों और काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों की भी पूजा करने की परंपरा है। विश्वकर्मा पूजा के दिन भगवान विश्वकर्मा के पूजन के साथ विश्वकर्मा भगवान से जुड़ी कथा का पाठ भी किया जाता है। यहां पढ़ें विश्वकर्मा पूजा कथा, विश्वकर्मा जयंती व्रत कथा इन हिंदी।
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Vishwakarma Puja Katha in Hindi
पहली कथा: ऐसे हुआ भगवान विश्वकर्मा का प्राकट्य
पौराणिक मान्यताओं में सृष्टि के आरंभ का वर्णन करते हुए बताया जाता है कि चारों ओर जल ही जल था। उसी समय भगवान विष्णु क्षीरसागर में शेषनाग की शय्या पर विराजमान थे। उनके नाभिकमल से भगवान ब्रह्मा का प्राकट्य हुआ और आगे सृष्टि के विस्तार का क्रम शुरू हुआ।
मान्यता के अनुसार, ब्रह्मा जी के वंश में धर्म और फिर वासुदेव का जन्म हुआ। वासुदेव की पत्नी अंगिरसी थीं। इन्हीं से भगवान विश्वकर्मा के प्रकट होने की कथा जुड़ी है।
आगे चलकर विश्वकर्मा जी ने शिल्प, वास्तु और निर्माण कला में अद्वितीय ज्ञान प्राप्त किया। इसी वजह से उन्हें दिव्य निर्माण कला का आचार्य माना गया। धार्मिक मान्यताओं में देवताओं के भव्य भवनों और अद्भुत रचनाओं के निर्माण का श्रेय भी भगवान विश्वकर्मा को दिया जाता है।
यही कारण है कि विश्वकर्मा पूजा के दिन निर्माण, शिल्प और तकनीकी काम से जुड़े औजारों का सम्मान किया जाता है।
दूसरी कथा: रथकार दंपती की पूरी हुई मनोकामना
विश्वकर्मा पूजा से जुड़ी एक दूसरी लोकप्रिय कथा काशी नगरी की बताई जाती है। यहां एक रथकार अपनी पत्नी के साथ रहता था। वह अपने काम में मेहनत करता था और पूरी ईमानदारी से रथ बनाता था, लेकिन उसकी आमदनी इतनी नहीं थी कि परिवार की सभी परेशानियां आसानी से दूर हो सकें।
सबसे बड़ा दुख यह था कि उसके घर संतान नहीं थी। पति-पत्नी इस इच्छा को लेकर कई बार साधु-संतों से मार्गदर्शन लेते थे। काफी समय बीतने के बाद भी उनकी मनोकामना पूरी नहीं हुई।
एक दिन उनके पड़ोसी ब्राह्मण ने उन्हें भगवान विश्वकर्मा की श्रद्धापूर्वक पूजा करने की सलाह दी। रथकार और उसकी पत्नी ने इस बात को विश्वास के साथ अपनाया। दोनों ने पूरी श्रद्धा से भगवान विश्वकर्मा की पूजा की और अपनी मनोकामना उनके सामने रखी।
कथा के अनुसार, उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विश्वकर्मा ने उन्हें संतान का आशीर्वाद दिया। कुछ समय बाद उनके घर पुत्र का जन्म हुआ। इसके बाद उनके जीवन में खुशियां लौट आईं और दोनों अपने परिवार के साथ सुखपूर्वक रहने लगे।
