हिंदू धर्म में भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और शुभ कार्यों के प्रथम देवता के रूप में पूजा जाता है। वर्ष भर आने वाली संकष्टी चतुर्थी का अपना महत्व होता है, लेकिन विभुवन संकष्टी चतुर्थी का स्थान विशेष माना गया है। यह व्रत हर तीन वर्ष में आने वाले अधिकमास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर रखा जाता है, इसलिए इसकी दुर्लभता इसे और अधिक खास बना देती है।
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इस साल आज 3 जून को संकष्टी चतुर्थी का व्रत रखा जा रहा है। चतुर्थी को श्रद्धालु पूरे विधि-विधान से भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करेंगे और व्रत रखकर उनके आशीर्वाद की कामना करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से गणपति बप्पा का स्मरण करने से जीवन के संकट दूर होते हैं और रुके हुए कार्यों में सफलता प्राप्त होती है। यही कारण है कि भक्त इस अवसर का पूरे वर्ष इंतजार करते हैं और इसे श्रद्धा, विश्वास तथा भक्ति के साथ मनाते हैं। विभुवन संकष्टी चतुर्थी की पूजा से पहले सिद्ध कथा का पाठ करने का भी महत्व है। यहां पढ़ें विभुवन संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा, गणेश जी की कहानी।
Vibhuvana sankashti chaturthi vrat katha in Hindi
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के विवाह का शुभ अवसर आया, तब पूरे देवलोक में उत्सव का माहौल था। सभी देवी-देवताओं को विवाह समारोह में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया। हालांकि, किसी कारणवश भगवान गणेश को विशेष रूप से निमंत्रण नहीं भेजा गया।
विवाह के दिन जब भगवान विष्णु की बारात रवाना होने लगी, तब देवताओं के बीच चर्चा होने लगी कि गणेश जी समारोह में क्यों दिखाई नहीं दे रहे हैं। इस पर कुछ देवताओं ने भगवान विष्णु से इसका कारण पूछा। विष्णु जी ने कहा कि उन्होंने भगवान शिव को निमंत्रण भेजा था और यदि गणेश जी आना चाहते, तो अपने पिता के साथ आ सकते थे। उन्होंने यह भी मजाकिया अंदाज में कहा कि गणेश जी के भोजन की व्यवस्था करना आसान नहीं है।
उधर, जब गणेश जी को इस बात का पता चला कि उन्हें उचित सम्मान नहीं दिया गया, तो उन्होंने अपनी दिव्य शक्ति से एक लीला रची। जैसे ही बारात आगे बढ़ी, अचानक भगवान विष्णु का रथ रास्ते में अटक गया। रथ के पहिए इस तरह फंस गए कि उन्हें निकालने के लिए किए गए सभी प्रयास विफल साबित हुए।
बारात में मौजूद देवता और ऋषि इस समस्या का समाधान खोजने लगे। तभी नारद मुनि ने बताया कि यह विघ्न भगवान गणेश की अप्रसन्नता का परिणाम है। उन्होंने सभी को याद दिलाया कि किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत गणेश जी की पूजा के बिना पूर्ण नहीं मानी जाती।
अपनी भूल का एहसास होते ही भगवान विष्णु सहित सभी देवताओं ने गणेश जी से क्षमा याचना की और श्रद्धापूर्वक उनका स्मरण किया। गणेश जी का क्रोध शांत हुआ और उन्होंने अपना आशीर्वाद प्रदान किया। उनके आशीर्वाद मिलते ही रथ सहज रूप से आगे बढ़ने लगा और विवाह की सभी रस्में बिना किसी बाधा के संपन्न हो गईं। तभी से यह मान्यता प्रचलित हुई कि किसी भी शुभ कार्य से पहले भगवान गणेश की पूजा करने से सभी विघ्न दूर होते हैं और कार्य सफलतापूर्वक पूर्ण होता है।
