Asha Dashami Vrat: जीवन में कई बार ऐसा समय आता है, जब पूरी कोशिश के बाद भी कोई काम नहीं बनता। मन निराश होने लगता है और आगे का रास्ता भी साफ दिखाई नहीं देता। धार्मिक मान्यताओं में ऐसे कठिन समय के लिए आशा दशमी व्रत का उल्लेख मिलता है। यह व्रत मनुष्य को उम्मीद बनाए रखने और अपनी मनोकामना के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने की प्रेरणा देता है।
आशा दशमी पर दसों दिशाओं की अधिष्ठात्री देवियों की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इनकी कृपा से जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता मिलता है, संकट कम होते हैं और मनोकामनाएं पूरी होती हैं।
आशा दशमी व्रत क्या होता है
‘आशा’ शब्द का अर्थ केवल उम्मीद या इच्छा नहीं है। धार्मिक ग्रंथों में इसका एक अर्थ ‘दिशा’ भी बताया गया है। यही कारण है कि आशा दशमी के दिन दस दिशाओं की अधिष्ठात्री शक्तियों की पूजा होती है। इन्हें आशा देवी या दिशा देवी कहा जाता है।
ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज बताते हैं, ‘आशा दशमी हमें समझाती है कि जीवन में कोई भी रास्ता हमेशा के लिए बंद नहीं होता। दस दिशाओं की पूजा का भाव यही है कि ईश्वर किसी न किसी दिशा से समाधान का मार्ग जरूर खोलते हैं।’
यह व्रत उन लोगों के लिए विशेष माना गया है, जो किसी संकट से गुजर रहे हों, लंबे समय से किसी काम के पूरा होने की प्रतीक्षा कर रहे हों या परिवार में सुख-शांति की कामना रखते हों। आरोग्य की इच्छा से भी आशा दशमी का व्रत किया जाता है।
किस तिथि पर किया जाता है आशा दशमी व्रत
आशा दशमी साल में केवल एक बार किया जाने वाला व्रत नहीं है। इसे किसी भी महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि से शुरू किया जा सकता है। हालांकि आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को इसका विशेष महत्व दिया जाता है। कुछ क्षेत्रीय परंपराओं में श्रावण शुक्ल दशमी को भी आशा दशमी के रूप में मनाया जाता है।
अब सवाल उठता है कि यदि दशमी तिथि दो दिन पड़ रही हो तो व्रत कब करें? सामान्य रूप से जिस दिन सूर्योदय के समय दशमी तिथि हो, उसी दिन व्रत करना उचित माना जाता है। कुछ परंपराओं में पूर्वाह्न के समय दशमी तिथि का होना भी देखा जाता है। तिथि के क्षय या वृद्धि की स्थिति में स्थानीय पंचांग या किसी विद्वान की सलाह लेना बेहतर रहता है।
कितने समय तक रखा जाता है यह व्रत
आशा दशमी का व्रत अलग-अलग संकल्प के साथ किया जा सकता है। व्रतराज में एक वर्ष तक प्रत्येक महीने की शुक्ल दशमी को व्रत करने और फिर उद्यापन करने का उल्लेख मिलता है। भविष्य पुराण से जुड़ी मान्यता के अनुसार, मनोकामना पूरी होने तक हर महीने यह व्रत किया जा सकता है।
कुछ परंपराओं में छह महीने, एक वर्ष या दो वर्ष तक व्रत करने का नियम भी बताया गया है। व्रत कितने समय तक करना है, यह संकल्प लेते समय ही तय कर लेना चाहिए।
ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज के अनुसार, ‘यदि कोई व्यक्ति किसी खास इच्छा के लिए व्रत शुरू कर रहा है तो उसे अपनी क्षमता के अनुसार अवधि तय करनी चाहिए। ऐसा संकल्प नहीं लेना चाहिए, जिसे बाद में निभाना मुश्किल हो जाए।’
नल और दमयंती की कथा से जुड़ा है आशा दशमी व्रत
आशा दशमी की पौराणिक कथा राजा नल और दमयंती से जुड़ी है। कथा के अनुसार, राजा नल अपना राज्य और वैभव खो बैठे थे। कठिन परिस्थितियों में उन्हें दमयंती के साथ वन में भटकना पड़ा। बाद में दोनों एक-दूसरे से बिछड़ गए।
पति से अलग होने के बाद दमयंती बेहद दुखी रहने लगीं। उन्होंने एक विद्वान ब्राह्मण से ऐसा उपाय पूछा, जिससे उनका नल से दोबारा मिलन हो सके। ब्राह्मण ने उन्हें आशा दशमी व्रत करने की सलाह दी। दमयंती ने श्रद्धा से व्रत किया और आखिरकार उन्हें अपने पति नल फिर से मिल गए।
इस कथा के कारण पुराने समय में पति के लंबी यात्रा से सुरक्षित लौटने, बिछड़े प्रियजन से मिलने और परिवार में सुख वापस आने की कामना से यह व्रत किया जाता था। हालांकि इसका महत्व केवल वैवाहिक जीवन तक सीमित नहीं माना गया है।
किन दस आशा देवियों की होती है पूजा
आशा दशमी पर ऐन्द्री, आग्नेयी, याम्या, नैर्ऋति, वारुणी, वायव्या, सौम्या, ईशानी, अधः और ब्राह्मी देवी की पूजा की जाती है। ये सभी दस दिशाओं और उनसे जुड़ी दिव्य शक्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं।
ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज बताते हैं, ‘दिशा देवियों की पूजा का अर्थ केवल पूर्व, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण की आराधना करना नहीं है। इसका वास्तविक भाव अपने विचारों, कर्मों और जीवन की दिशा को सही बनाना है।’
कैसे करें आशा दशमी की पूजा
- आशा दशमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद माता पार्वती या आशा देवी का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें।
- परंपरागत पूजा में घर के आंगन में जौ या आटे से दस दिशाओं के प्रतीक बनाए जाते हैं। यदि ऐसा करना संभव न हो तो पूजा की चौकी पर दस छोटे दीपक रखकर भी दस दिशाओं का पूजन किया जा सकता है।
- हर दिशा के लिए अलग घी का दीपक जलाएं। देवी को चंदन, कुमकुम, अक्षत, फूल, फल और मिठाई अर्पित करें। इसके बाद अपनी मनोकामना माता के सामने रखें और प्रार्थना करें - ‘हे आशा देवियों, मेरी आशाएं शुभ हों, मेरे मनोरथ पूरे हों और आपकी कृपा से मेरा कल्याण हो।’
- व्रती अपनी क्षमता के अनुसार निराहार या फलाहार व्रत रख सकते हैं। यदि स्वास्थ्य साथ न दे तो सात्विक भोजन लेकर भी श्रद्धापूर्वक पूजा की जा सकती है। इस दिन क्रोध करने, किसी का अपमान करने और कटु शब्द बोलने से बचना चाहिए।
किन कामनाओं के लिए किया जाता है आशा दशमी व्रत
आशा दशमी को अक्सर महिलाओं का व्रत समझ लिया जाता है, लेकिन इसे कोई भी व्यक्ति कर सकता है। अविवाहित कन्याएं अच्छे जीवनसाथी की कामना से, विवाहित महिलाएं दांपत्य सुख के लिए और माता-पिता संतान की सेहत के लिए यह व्रत करते हैं।
विद्यार्थी पढ़ाई में सफलता, व्यापारी कारोबार में प्रगति और परिवार के सदस्य संकट से मुक्ति की कामना से भी आशा दशमी का व्रत रख सकते हैं। धार्मिक मान्यताओं में रोग से राहत और लंबे समय से अटके कार्य को पूरा करने के लिए भी इसे फलदायी बताया गया है।
आशा के साथ प्रयास भी है जरूरी
आशा दशमी का अर्थ केवल किसी चमत्कार की प्रतीक्षा करना नहीं है। यह व्रत मनुष्य को निराशा से बाहर निकलने, मन को शांत रखने और दोबारा प्रयास शुरू करने की प्रेरणा देता है।
ज्योतिषाचार्य सुजीत महाराज कहते हैं, ‘व्रत का फल केवल भोजन छोड़ने से नहीं मिलता। जब प्रार्थना के साथ सही कर्म और ईमानदार प्रयास जुड़ते हैं, तभी जीवन में वास्तविक बदलाव दिखाई देता है।’
आशा दशमी का सबसे सुंदर संदेश भी यही है। परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, उम्मीद का दीपक बुझना नहीं चाहिए। कई बार मन में जागी यही छोटी-सी आशा जीवन को नई दिशा दे देती है।
