Vat Savitri Vrat Par Kitne Phere Lagane Chahiye : आज 16 मई 2026 को ज्येष्ठ अमावस्या के दिन वट सावित्री व्रत रखा जा रहा है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना से वट वृक्ष यानी बरगद के पेड़ की पूजा करती हैं। वट सावित्री व्रत में सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक वट वृक्ष की परिक्रमा करना माना जाता है। लेकिन कई महिलाओं के मन में यह सवाल रहता है कि आखिर बरगद के पेड़ के कितने फेरे लगाने चाहिए? क्या 7 परिक्रमा करनी चाहिए, 11 करनी चाहिए या 108? आइए जानते हैं धार्मिक मान्यताओं और पूजा परंपरा के अनुसार वट सावित्री व्रत पर कितनी परिक्रमा करना शुभ माना जाता है।
वट वृक्ष के कितने फेरे लगाने चाहिए
धार्मिक परंपराओं के अनुसार वट सावित्री व्रत में आमतौर पर 7 परिक्रमा करना सबसे ज्यादा प्रचलित माना जाता है। कई जगहों पर महिलाएं 11 या 21 परिक्रमा भी करती हैं। कुछ महिलाएं अपनी श्रद्धा और क्षमता के अनुसार 108 बार धागा लपेटकर भी परिक्रमा करती हैं। हालांकि ज्यादातर पंडित और धार्मिक मान्यताएं 7 फेरे को शुभ मानती हैं। इसका संबंध विवाह के सात फेरों और सात जन्मों के बंधन से भी जोड़ा जाता है।
परिक्रमा करते समय क्या करना चाहिए
वट वृक्ष की पूजा करने के बाद महिलाएं कच्चा सूत या धागा लेकर पेड़ के चारों ओर लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। परिक्रमा करते समय माता सावित्री और सत्यवान का स्मरण किया जाता है। व्रती महिलाएं इस दौरान व्रत कथा पढ़ती या सुनती हैं। बरगद की पूजा करते समय 'वट सिंचामि ते मूलं सलिलैरमृतोपमै:। यथा शाखाप्रशाखाभिर्वृद्धोअसि त्वं महीतले। तथा पुत्रैश्च पौत्रैश्च संपन्नं कुरु मां सदा।।' मंत्र का जाप करें। ध्यान रखें कि परिक्रमा श्रद्धा और शांत मन से करनी चाहिए। जल्दबाजी या दिखावे की भावना से पूजा करने से बचना चाहिए।
वट वृक्ष की पूजा विधि (Vat Savitri Vrat Mein Bargad Ke Ped Ki Puja Vidhi)
वट सावित्री व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ-सुथरे वस्त्र पहनें। सुहागिन महिलाएं श्रृंगार करके निर्जला या फलाहार व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा की थाली तैयार करें, जिसमें रोली, हल्दी, अक्षत, मौली, फूल, धूप, दीपक, फल, मिठाई, भीगा चना, सत्तू, जल, दूध और गंगाजल रखें। पूजा के लिए बरगद यानी वट वृक्ष के पास जाएं और वहां की जगह को साफ करके हल्दी या रंगोली से चौक बनाएं।
इसके बाद वट वृक्ष की जड़ में जल, दूध और गंगाजल अर्पित करें। फिर रोली, हल्दी और अक्षत चढ़ाकर वृक्ष का पूजन करें। धूप और दीपक जलाएं तथा फूल और मिठाई अर्पित करें। अब मौली या कच्चा सूत लेकर वट वृक्ष के चारों ओर 7, 11 या 21 परिक्रमा करें। हर फेरे के साथ मौली को पेड़ पर लपेटते जाएं और पति की लंबी उम्र, सुखी वैवाहिक जीवन और अच्छे स्वास्थ्य की कामना करें।
परिक्रमा पूरी होने के बाद सावित्री-सत्यवान की कथा पढ़ें या सुनें। कथा के बाद हाथ जोड़कर प्रार्थना करें कि जैसे माता सावित्री ने अपने तप और श्रद्धा से सत्यवान के प्राण वापस पाए थे, वैसे ही परिवार पर हमेशा सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य बना रहे। इसके बाद वट वृक्ष को सत्तू, चना, फल और मिठाई का भोग लगाएं। अंत में पूजा का प्रसाद ग्रहण करें और परिवार के लोगों में भी बांटें।
मान्यता है कि वट वृक्ष में ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव तीनों का वास होता है। इसलिए इस दिन श्रद्धा और नियम से की गई पूजा वैवाहिक जीवन में सुख, सौभाग्य और लंबी आयु का आशीर्वाद देती है।
क्या ज्यादा परिक्रमा करना जरूरी है
धार्मिक दृष्टि से परिक्रमा की संख्या से ज्यादा महत्वपूर्ण श्रद्धा और भक्ति को माना गया है। अगर कोई स्वास्थ्य कारणों या उम्र की वजह से ज्यादा परिक्रमा नहीं कर पाता है, तो वह कम फेरे लगाकर भी पूजा कर सकता है। मान्यता है कि सच्चे मन और विश्वास से की गई पूजा ही सबसे ज्यादा फलदायी होती है।
वट सावित्री व्रत में परिक्रमा का क्या महत्व है
हिंदू धर्म में वट वृक्ष को बेहद पवित्र माना गया है। धार्मिक मान्यता के अनुसार वट वृक्ष में भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव का वास माना जाता है। वट वृक्ष दीर्घायु, स्थिरता और अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि वट सावित्री व्रत में इसकी पूजा और परिक्रमा का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि श्रद्धा और नियम से वट वृक्ष की परिक्रमा करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति बनी रहती है और पति की आयु में वृद्धि होती है।
वट सावित्री व्रत कथा
वट सावित्री व्रत की कथा माता सावित्री और सत्यवान से जुड़ी है। कहा जाता है कि सावित्री ने अपने तप, प्रेम और दृढ़ निश्चय से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस ले लिए थे। तभी से यह व्रत अखंड सौभाग्य और पति की लंबी उम्र का प्रतीक माना जाता है। वट वृक्ष को उसी अमर प्रेम और दीर्घायु का प्रतीक माना जाता है।
वट वृक्ष की परिक्रमा के बाद करें ये काम
परिक्रमा पूरी होने के बाद वट वृक्ष को जल अर्पित करें और रोली, अक्षत, फूल तथा मिठाई चढ़ाएं। इसके बाद व्रत कथा सुनें और परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। आज के दिन हनुमान जी और शनि देव की पूजा करना भी शुभ माना जाता है, क्योंकि इस बार वट सावित्री व्रत के साथ शनि जयंती भी पड़ रही है।
