Vaishakh Purnima Vrat Katha: वैशाख पूर्णिमा, जिसे बुद्ध पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, सनातन धर्म में बेहद पवित्र और विशेष महत्व रखने वाला पर्व है। इस दिन भगवान विष्णु के साथ-साथ भगवान गौतम बुद्ध की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, वैशाख मास की पूर्णिमा तिथि पर ही भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था, इसलिए यह दिन और भी खास बन जाता है। भारत में यह पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। मान्यता है कि भगवान गौतम बुद्ध, भगवान नारायण के अवतार माने जाते हैं। इस दिन भक्त उपवास रखकर भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। साथ ही पवित्र नदियों में स्नान और दान-पुण्य करने की परंपरा भी है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और शांति आती है।
यही कारण है कि वैशाख पूर्णिमा (Vaishakh Purnima 2026) की व्रत कथा सुनना और पढ़ना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है, जो व्यक्ति को धर्म, करुणा और सदाचार का मार्ग दिखाती है। आगे पढ़ें वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा (Vaishakh Purnima Vrat Katha)
Vaishakh Purnima Vrat Katha (वैशाख पूर्णिमा व्रत कथा)
वैशाख पूर्णिमा का व्रत केवल आस्था ही नहीं, बल्कि जीवन में सुख, समृद्धि और संतति की कामना से जुड़ा एक अत्यंत फलदायी पर्व माना जाता है। इसकी कथा द्वापर युग से जुड़ी है, जब माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण से एक ऐसा उपाय पूछा, जिससे स्त्रियों को वैधव्य और निसंतानता का दुख न झेलना पड़े। तब श्रीकृष्ण ने उन्हें वैशाख पूर्णिमा व्रत का महत्व बताया। एक ऐसा व्रत जो सौभाग्य और संतान सुख की रक्षा करता है।
पैराणिक कथा के अनुसार, कांतिका नगर में चंद्रहास्य नामक राजा के राज्य में धनेश्वर नाम के ब्राह्मण अपनी पत्नी सुशीला के साथ रहते थे। घर में धन-धान्य की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान न होने का दुख उन्हें भीतर ही भीतर तोड़ रहा था। एक दिन नगर में आए एक साधु ने उनके घर से भिक्षा लेने से इनकार कर दिया और कारण निःसंतान होना बताया। यह बात सुनकर दंपत्ति व्यथित हो उठे और समाधान की तलाश में साधु से उपाय पूछा। साधु ने उन्हें सोलह दिनों तक मां चंडी की उपासना करने की सलाह दी। दंपत्ति ने पूरे श्रद्धा भाव से यह व्रत किया, जिससे प्रसन्न होकर मां काली प्रकट हुईं और सुशीला को संतान प्राप्ति का वरदान दिया। साथ ही उन्होंने पूर्णिमा व्रत की विशेष विधि भी बताई। जिसके अनुसार, हर पूर्णिमा को दीपक जलाना और उनकी संख्या बढ़ाते जाना, जब तक 32 दीपक पूरे न हो जाएं।
माता के आशीर्वाद से सुशीला ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम देवदास रखा गया। समय बीतने पर देवदास को शिक्षा के लिए काशी भेजा गया, जहां उसके जीवन में एक विचित्र घटना घटी। उसका अनजाने में विवाह हो गया, लेकिन उसकी अल्पायु होने के बावजूद, जब काल उसके प्राण लेने आया, तो वह असफल रहा। इसका कारण जानने स्वयं यमराज देवताओं के पास पहुंचे। तब माता पार्वती ने बताया कि यह सब उस पूर्णिमा व्रत का प्रभाव है, जो देवदास के माता-पिता ने किया था। इसी व्रत की शक्ति से देवदास को मृत्यु से भी सुरक्षा मिली।
यही कारण है कि वैशाख पूर्णिमा व्रत को अत्यंत चमत्कारी माना जाता है। मान्यता है कि इस व्रत को करने से न केवल संतान सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है, बल्कि व्यक्ति अकाल मृत्यु के भय से भी मुक्त रहता है और उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
