अध्यात्म

गुरुवार व्रत कथा, जानिए बृहस्पतिवार का व्रत रखने की विधि और लाभ

Guruvar Vrat Katha : गुरुवार का व्रत भगवान बृहस्पतिदेव और विष्णु जी को समर्पित है। इस दिन व्रत को रखने और कथा को पढ़ने या सुनने से धनलाभ होता है। इसके साथ ही जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं। यह व्रत हर व्यक्ति के लिए शुभ माना जाता है। मान्यता है कि अगर कोई भी व्यक्ति इस व्रत को रखता है तो उसकी लाइफ में किसी भी प्रकार की परेशानी नहीं आती है और कर्मों के फल से जो आती भी हैं, वे तुरंत सॉल्व हो जाती हैं। आइए जानते हैं कि गुरुवार व्रत कथा क्या है?

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गुरुवार व्रत कैसे करें

Guruvar Vrat Katha : गुरुवार का व्रत भगवान बृहस्पतिदेव और श्रीहरिविष्णु जी को समर्पित सबसे शुभ व्रतों में से एक है। इसे रखने से कुंडली का गुरु बलवान होता है, धन-धान्य की वर्षा होती है, संतान सुख मिलता है, विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं और जीवन में हर तरह की समृद्धि आती है। लाखों लोग आज भी इस व्रत को पूरी श्रद्धा से रखते हैं और इसके चमत्कारिक फल देखते हैं।

कैसे रखे गुरुवार का व्रत

यह व्रत बहुत आसान है, बस मन साफ और श्रद्धा पूरी होनी चाहिए। सुबह सूर्योदय से पहले उठकर स्नान करें और पीले या केसरिया रंग के स्वच्छ वस्त्र पहनें। घर के पूजा स्थल पर भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की मूर्ति या फोटो रखें। अगर संभव हो तो केले का पौधा या उसकी जड़ पूजा में रखें क्योंकि केला गुरु का प्रिय वृक्ष है। पीली चीजों जैसे चने की दाल, हल्दी, बेसन के लड्डू, केला या कोई पीला फल भोग में चढ़ाएं। ‘ॐ बृं बृहस्पतये नमः’ या ‘ॐ ग्रां ग्रीं ग्रौं सः गुरवे नमः’ मंत्र का कम से कम 108 बार जप करें। दिन में एक बार ही पीला भोजन करें। केले, चने की दाल की खिचड़ी, बेसन की रोटी या हल्दी वाला दूध ले सकते हैं, लेकिन नमक बिल्कुल न खाएं। शाम को गुरुवार व्रत कथा जरूर पढ़ें या सुनें। रात में चंद्रमा को दूध-केसर मिलाकर अर्घ्य दें और व्रत पूरा करें।

बृहस्पतिवार के दिन पढ़ें ये व्रत कथा

भारतवर्ष में एक प्रतापी और दानी राजा राज्य करता था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सहायता करता था। यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी, वह न दान देती थी, न भगवान का पूजन करती थी और राजा को भी दान देने से मना किया करती थी।

एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे, तो रानी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु वेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा मांगी। रानी ने भिक्षा देने से इंकार किया और कहा, 'हे साधु महाराज! मैं तो दान-पुण्य से तंग आ गई हूं। मेरा पति सारा धन लुटाते रहते हैं। मेरी इच्छा है कि हमारा धन नष्ट हो जाए, फिर न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी।'

साधु ने कहा, 'देवी! तुम तो बड़ी विचित्र हो। धन-संतान तो सभी चाहते हैं। पुत्र और लक्ष्मी तो पापी के घर भी होने चाहिए। यदि तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखों को भोजन दो, प्यासों के लिए प्याऊ बनवाओ, मुसाफिरों के लिए धर्मशालाएं खुलवाओ। जो निर्धन अपनी कुंवारी कन्याओं का विवाह नहीं कर सकते, उनका विवाह करा दो। ऐसे और कई काम हैं जिन्हें करने से तुम्हारा यश लोक-परलोक में फैलेगा।'

परंतु रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली, 'महाराज! आप मुझे कुछ न समझाएं। मैं ऐसा धन नहीं चाहती जो हर जगह बांटती फिरूं।'

साधु ने उत्तर दिया, 'यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो तथास्तु! तुम ऐसा करना कि बृहस्पतिवार को घर लीपकर पीली मिट्टी से अपना सिर धोकर स्नान करना, भट्टी चढ़ाकर कपड़े धोना। ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन नष्ट हो जाएगा।' इतना कहकर साधु महाराज वहां से अंतर्धान हो गए।

राजा बन गया लकड़हारा

साधु के अनुसार कही बातों को पूरा करते हुए रानी को केवल तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसकी समस्त धन-संपत्ति नष्ट हो गई। भोजन के लिए राजा का परिवार तरसने लगा। तब एक दिन राजा ने रानी से कहा, 'हे रानी! तुम यहीं रहो, मैं दूसरे देश को जाता हूं, क्योंकि यहां सभी लोग मुझे जानते हैं, इसलिए मैं कोई छोटा कार्य नहीं कर सकता।' ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया। वहां वह जंगल से लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेचता। इस तरह वह अपना जीवन व्यतीत करने लगा। इधर राजा के परदेश जाते ही रानी और दासी दुःखी रहने लगीं।

खाने को तरसने लगी रानी

एक बार जब रानी और दासी को सात दिन तक बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा, 'हे दासी! पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है। वह बड़ी धनवान है। तू उसके पास जा और कुछ ले आ, ताकि थोड़ी-बहुत गुजर-बसर हो जाए।' दासी रानी की बहन के पास गई।

उस दिन गुरुवार था और रानी की बहन उस समय बृहस्पतिवार व्रत की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बड़ी बहन ने कोई उत्तर नहीं दिया। जब दासी को रानी की बहन से कोई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुःखी हुई और उसे क्रोध भी आया। दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी। सुनकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा।

उधर रानी की बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आई थी, परंतु मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुःखी हुई होगी। कथा सुनकर और पूजन समाप्त करके वह अपनी बहन के घर आई और कहने लगी, 'हे बहन! मैं बृहस्पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी मेरे घर आई थी परंतु जब तक कथा होती है, तब तक न तो उठते हैं और न ही बोलते हैं, इसलिए मैं नहीं बोली। कहो, दासी क्यों गई थी?'

रानी बोली, 'बहन! तुमसे क्या छिपाऊं, हमारे घर में खाने तक को अनाज नहीं था।' ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आईं। उसने दासी समेत पिछले सात दिनों से भूखे रहने तक की बात अपनी बहन को विस्तारपूर्वक सुना दी। रानी की बहन बोली, 'देखो बहन! भगवान बृहस्पतिदेव सबकी मनोकामना को पूर्ण करते हैं। देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो।' पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ पर बहन के आग्रह करने पर उसने अपनी दासी को अंदर भेजा तो उसे सचमुच अनाज से भरा एक घड़ा मिल गया। यह देखकर दासी को बड़ी हैरानी हुई।

दासी रानी से कहने लगी, 'हे रानी! जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते हैं, इसलिए क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाए, ताकि हम भी व्रत कर सकें।' तब रानी ने अपनी बहन से बृहस्पतिवार व्रत के बारे में पूछा।

उसकी बहन ने बताया, 'बृहस्पतिवार के व्रत में चने की दाल और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं, व्रत कथा सुनें और पीला भोजन ही करें। व्रत की कथा इस प्रकार बताई कि प्राचीन काल में एक ब्राह्मण रहता था, वह बहुत निर्धन था। उसके कोई संतान नहीं थी। उसकी स्त्री बहुत मलीनता के साथ रहती थी। वह स्नान न करती, किसी देवता का पूजन न करती, इससे ब्राह्मण देवता बड़े दुःखी थे।

बेचारे बहुत कुछ कहते थे किंतु उसका कुछ परिणाम न निकला। भगवान की कृपा से ब्राह्मण की स्त्री के कन्या रूपी रत्न पैदा हुआ। कन्या बड़ी होने पर प्रातः स्नान करके विष्णु भगवान का जाप व बृहस्पतिवार का व्रत करने लगी। अपने पूजन-पाठ को समाप्त करके विद्यालय जाती तो अपनी मुट्ठी में जौ भरके ले जाती और पाठशाला के मार्ग में डालती जाती। तब ये जौ स्वर्ण के हो जाते। लौटते समय उनको बीनकर घर ले आती थी।

सोने का मिला सूप

एक दिन वह बालिका सूप में उस सोने के जौ को फटककर साफ कर रही थी कि उसके पिता ने देख लिया और कहा, 'हे बेटी! सोने के जौ के लिए सोने का सूप होना चाहिए।' दूसरे दिन बृहस्पतिवार था, इस कन्या ने व्रत रखा और बृहस्पतिदेव से प्रार्थना करके कहा, 'मैंने आपकी पूजा सच्चे मन से की हो तो मेरे लिए सोने का सूप दे दो।' बृहस्पतिदेव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। रोजाना की तरह वह कन्या जौ फैलाती हुई जाने लगी। जब लौटकर जौ बीन रही थी तो बृहस्पतिदेव की कृपा से सोने का सूप मिला। उसे वह घर ले आई और उसमें जौ साफ करने लगी। परंतु उसकी मां का वही ढंग रहा।

राजकुमार से हो गई निर्धन कन्या की शादी

एक दिन की बात है कि वह कन्या सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी। उस समय उस शहर का राजपुत्र वहां से होकर निकला। इस कन्या के रूप और कार्य को देखकर मोहित हो गया तथा अपने घर आकर भोजन तथा जल त्याग कर उदास होकर लेट गया। राजा को इस बात का पता लगा तो अपने प्रधानमंत्री के साथ उसके पास गए और बोले, 'हे बेटा! तुम्हें किस बात का कष्ट है? किसी ने अपमान किया है अथवा और कारण हो, सो कहो, मैं वही कार्य करूंगा जिससे तुम्हें प्रसन्नता हो।'

अपने पिता की बातें सुनकर राजकुमार ने कहा, 'मुझे आपकी कृपा से किसी बात का दुःख नहीं है, किसी ने मेरा अपमान नहीं किया है परंतु मैं उस लड़की से विवाह करना चाहता हूं जो सोने के सूप में जौ साफ कर रही थी।' यह सुनकर राजा आश्चर्य में पड़ गए और बोले, 'हे बेटा! इस तरह की कन्या का पता तुम्हीं लगाओ। मैं उसके साथ तेरा विवाह अवश्य ही करवा दूंगा।' राजकुमार ने उस लड़की के घर का पता बतलाया। तब मंत्री उस लड़की के घर गए और ब्राह्मण देवता को सभी हाल बतलाया। ब्राह्मण देवता राजकुमार के साथ अपनी कन्या का विवाह करने के लिए तैयार हो गए तथा विधि-विधान के अनुसार ब्राह्मण की कन्या का विवाह राजकुमार के साथ हो गया।

कन्या के घर से जाते ही पहले की भांति उस ब्राह्मण देवता के घर में गरीबी का निवास हो गया। अब भोजन के लिए भी अन्न बड़ी मुश्किल से मिलता था। एक दिन दुःखी होकर ब्राह्मण देवता अपनी पुत्री के पास गए। बेटी ने पिता की दुःखी अवस्था को देखा और अपनी मां का हाल पूछा। तब ब्राह्मण ने सभी हाल कहा। कन्या ने बहुत सा धन देकर अपने पिता को विदा कर दिया। इस तरह ब्राह्मण का कुछ समय सुखपूर्वक व्यतीत हुआ। कुछ दिन बाद फिर वही हाल हो गया। ब्राह्मण फिर अपनी कन्या के यहां गया और सारा हाल कहा तो लड़की बोली, 'हे पिताजी! आप माताजी को यहां लिवा लाओ। मैं उसे विधि बता दूंगी जिससे गरीबी दूर हो जाए।'

दरिद्र स्त्री भी रखने लगी व्रत

वह ब्राह्मण देवता अपनी स्त्री को साथ लेकर पहुंचे तो अपनी मां को समझाने लगी, 'हे मां! तुम प्रातःकाल प्रथम स्नानादि करके विष्णु भगवान का पूजन करो तो सब दरिद्रता दूर हो जाएगी।' परंतु उसकी मां ने एक भी बात नहीं मानी और प्रातःकाल उठकर अपनी पुत्री के बच्चों की जूठन को खा लिया। इससे उसकी पुत्री को भी बहुत गुस्सा आया और एक रात को कोठरी से सभी सामान निकाल दिया और अपनी मां को उसमें बंद कर दिया। प्रातःकाल उसे निकाला तथा स्नानादि कराके पाठ करवाया तो उसकी मां की बुद्धि ठीक हो गई और फिर प्रत्येक बृहस्पतिवार को व्रत रखने लगी। इस व्रत के प्रभाव से उसके मां-बाप बहुत ही धनवान और पुत्रवान हो गए और बृहस्पतिजी के प्रभाव से इस लोक के सुख भोगकर स्वर्ग को प्राप्त हुए।

रानी को पूजा विधि बताकर घर लौट आई बहन

रानी की बहन ने कहा कि इससे बृहस्पतिदेव प्रसन्न होते हैं।' व्रत और पूजन विधि बताकर रानी की बहन अपने घर को लौट गई।

सात दिन के बाद जब गुरुवार आया, तो रानी और दासी ने व्रत रखा। घुड़साल में जाकर चना और गुड़ लेकर आईं। फिर उससे केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया। अब पीला भोजन कहां से आए, इस बात को लेकर दोनों बहुत दुःखी थे। चूंकि उन्होंने व्रत रखा था, इसलिए बृहस्पतिदेव उनसे प्रसन्न थे। इसलिए वे एक साधारण व्यक्ति का रूप धारण कर दो थालों में सुंदर पीला भोजन दासी को दे गए। भोजन पाकर दासी प्रसन्न हुई और फिर रानी के साथ मिलकर भोजन ग्रहण किया।

फिर से अमीर हो गई रानी

उसके बाद वे सभी गुरुवार को व्रत और पूजन करने लगीं। बृहस्पति भगवान की कृपा से उनके पास फिर से धन-संपत्ति आ गई, परंतु रानी फिर से पहले की तरह आलस्य करने लगी। इस पर दासी बोली, 'देखो रानी! तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया और अब जब भगवान बृहस्पति की कृपा से धन मिला है तो तुम्हें फिर से आलस्य होता है।'

रानी को समझाते हुए दासी कहती है कि बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिए हमें दान-पुण्य करना चाहिए, भूखे मनुष्यों को भोजन कराना चाहिए और धन को शुभ कार्यों में खर्च करना चाहिए, जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़ेगा, स्वर्ग की प्राप्ति होगी और पितर प्रसन्न होंगे। दासी की बात मानकर रानी अपना धन शुभ कार्यों में खर्च करने लगी, जिससे पूरे नगर में उसका यश फैलने लगा। बृहस्पतिवार व्रत कथा के बाद श्रद्धा के साथ आरती की जानी चाहिए। इसके बाद प्रसाद बांटकर उसे ग्रहण करना चाहिए।

बृहस्पतिदेव ने दिए राजा को दर्शन

एक दिन राजा दुःखी होकर जंगल में एक पेड़ के नीचे आसन जमाकर बैठ गया। वह अपनी दशा को याद करके व्याकुल होने लगा। बृहस्पतिवार का दिन था। एकाएक उसने देखा कि निर्जन वन में एक साधु प्रकट हुए। वह साधु वेष में स्वयं बृहस्पति देवता थे। लकड़हारे के सामने आकर बोले, 'हे लकड़हारे! इस सुनसान जंगल में तू चिंता मग्न क्यों बैठा है?' लकड़हारे ने दोनों हाथ जोड़कर प्रणाम किया और उत्तर दिया, 'महात्मा जी! आप सब कुछ जानते हैं, मैं क्या कहूं।' यह कहकर रोने लगा और साधु को अपनी आत्मकथा सुनाई।

महात्मा जी ने कहा, 'तुम्हारी स्त्री ने बृहस्पति के दिन बृहस्पति भगवान का निरादर किया है, जिसके कारण रुष्ट होकर उन्होंने तुम्हारी यह दशा कर दी। अब तुम चिंता को दूर करके मेरे कहने पर चलो तो तुम्हारे सब कष्ट दूर हो जाएंगे और भगवान पहले से भी अधिक संपत्ति देंगे। तुम बृहस्पति के दिन कथा किया करो। दो पैसे के चने-मुनक्का लाकर उसका प्रसाद बनाओ और शुद्ध जल से लोटे में शक्कर मिलाकर अमृत तैयार करो। कथा के पश्चात अपने सारे परिवार और सुनने वाले प्रेमियों में अमृत व प्रसाद बांटकर आप भी ग्रहण करो। ऐसा करने से भगवान तुम्हारी सब मनोकामनाएं पूरी करेंगे।'

साधु के ऐसे वचन सुनकर लकड़हारा बोला, 'हे प्रभो! मुझे लकड़ी बेचकर इतना पैसा नहीं मिलता, जिससे भोजन के उपरांत कुछ बचा सकूं। मैंने रात्रि में अपनी स्त्री को व्याकुल देखा है। मेरे पास कुछ भी नहीं जिससे मैं उसकी खबर मंगा सकूं।' साधु ने कहा, 'हे लकड़हारे! तुम किसी बात की चिंता मत करो। बृहस्पति के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियां लेकर शहर को जाओ। तुमको रोज से दुगुना धन प्राप्त होगा, जिससे तुम भली-भांति भोजन कर लोगे तथा बृहस्पतिदेव की पूजा का सामान भी आ जाएगा।'

इतना कहकर साधु अंतर्धान हो गए। धीरे-धीरे समय व्यतीत होने पर फिर वही बृहस्पतिवार का दिन आया। लकड़हारा जंगल से लकड़ी काटकर किसी शहर में बेचने गया, उसे उस दिन और दिनों से अधिक पैसा मिला। राजा ने चना-गुड़ आदि लाकर गुरुवार का व्रत किया। उस दिन से उसके सभी क्लेश दूर हुए, परंतु जब दुबारा गुरुवार का दिन आया तो बृहस्पतिवार का व्रत करना भूल गया। इस कारण बृहस्पति भगवान नाराज हो गए।

राजा पर लग गया चोरी का इल्जाम

उस दिन उस नगर के राजा ने विशाल यज्ञ का आयोजन किया तथा शहर में यह घोषणा करा दी कि कोई भी मनुष्य अपने घर में भोजन न बनावे न आग जलावे, समस्त जनता मेरे यहां भोजन करने आवे। इस आज्ञा को जो न मानेगा उसे फांसी की सजा दी जाएगी। इस तरह की घोषणा संपूर्ण नगर में करवा दी गई।

राजा की आज्ञानुसार शहर के सभी लोग भोजन करने गए, लेकिन लकड़हारा कुछ देर से पहुंचा इसलिए राजा उसे अपने साथ घर लिवा ले गए और ले जाकर भोजन करा रहे थे तो रानी की दृष्टि उस खूंटी पर पड़ी जिस पर उसका हार लटका हुआ था। वह वहां पर दिखाई नहीं दिया। रानी ने निश्चय किया कि मेरा हार इस मनुष्य ने चुरा लिया है। उसी समय सिपाहियों को बुलाकर उसे कारागार में डलवा दिया।

जब लकड़हारा कारागार में पड़ गया और बहुत दुःखी होकर विचार करने लगा कि न जाने कौन से पूर्व जन्म के कर्म से मुझे यह दुःख प्राप्त हुआ है, और उसी साधु को याद करने लगा।

उसी समय तत्काल बृहस्पतिदेव साधु के रूप में प्रकट हुए और उसकी दशा को देखकर कहने लगे, 'अरे मूर्ख! तूने बृहस्पतिदेव की कथा नहीं करी, इस कारण तुझे दुःख प्राप्त हुआ है। अब चिंता मत कर, बृहस्पतिवार के दिन कारागार के दरवाजे पर चार पैसे पड़े मिलेंगे। उनसे तू बृहस्पतिदेव की पूजा करना, तेरे सभी कष्ट दूर हो जाएंगे।' बृहस्पति के दिन उसे चार पैसे मिले। लकड़हारे ने कथा कही। उसी रात्रि को बृहस्पतिदेव ने उस नगर के राजा को स्वप्न में कहा, 'हे राजा! तुमने जिस आदमी को कारागार में बंद कर दिया है वह निर्दोष है। वह राजा है, उसे छोड़ देना। रानी का हार उसी खूंटी पर लटका है। अगर तू ऐसा नहीं करेगा तो मैं तेरे राज्य को नष्ट कर दूंगा।'

इस तरह रात्रि के स्वप्न को देखकर राजा प्रातःकाल उठा और खूंटी पर हार देखकर लकड़हारे को बुलाकर क्षमा मांगी तथा लकड़हारे को योग्य सुंदर वस्त्र-आभूषण देकर विदा कर दिया। बृहस्पतिदेव की आज्ञानुसार लकड़हारा अपने नगर को चल दिया।

राजा वापस आया अपने राज्य

राजा जब अपने नगर के निकट पहुंचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। नगर में पहले से अधिक बाग, तालाब, कुएं तथा बहुत सी धर्मशाला-मंदिर आदि बन गई हैं। राजा ने पूछा यह किसका बाग और धर्मशाला हैं, तब नगर के सब लोग कहने लगे यह सब रानी और बांदी के हैं। तो राजा को आश्चर्य हुआ और गुस्सा भी आया।

जब रानी ने यह खबर सुनी कि राजा आ रहे हैं, तो उन्होंने बांदी से कहा, 'हे दासी! देख, राजा हमको कितनी बुरी हालत में छोड़ गए थे। हमारी ऐसी हालत देखकर वह लौट न जाएं, इसलिए तू दरवाजे पर खड़ी हो जा।' आज्ञानुसार दासी दरवाजे पर खड़ी हो गई। राजा आए तो उन्हें अपने साथ लिवा लाई। तब राजा ने क्रोध करके अपनी रानी से पूछा कि यह धन तुम्हें कैसे प्राप्त हुआ है, तब उन्होंने कहा, 'हमें यह सब धन बृहस्पतिदेव के इस व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है।'

दिन में तीन बार कथा पढ़ने लगा राजा

राजा ने निश्चय किया कि सात रोज बाद तो सभी बृहस्पतिदेव का पूजन करते हैं परंतु मैं प्रतिदिन दिन में तीन बार कथा तथा रोज व्रत किया करूंगा। अब हर समय राजा के दुपट्टे में चने की दाल बंधी रहती तथा दिन में तीन बार कथा कहता।

एक रोज राजा ने विचार किया कि चलो अपनी बहन के यहां हो आवें। इस तरह निश्चय कर राजा घोड़े पर सवार हो अपनी बहन के यहां को चलने लगा। मार्ग में उसने देखा कि कुछ आदमी एक मुर्दे को लिए जा रहे हैं, उन्हें रोककर राजा कहने लगा, 'अरे भाइयों! मेरी बृहस्पतिदेव की कथा सुन लो।'

जिंदा हो गया मुर्दा

वे बोले, 'लो! हमारा तो आदमी मर गया है, इसको अपनी कथा की पड़ी है।' परंतु कुछ आदमी बोले, 'अच्छा कहो, हम तुम्हारी कथा भी सुनेंगे।' राजा ने दाल निकाली और जब कथा आधी हुई थी कि मुर्दा हिलने लग गया और जब कथा समाप्त हो गई तो राम-राम करके मनुष्य उठकर खड़ा हो गया।

आगे मार्ग में उसे एक किसान खेत में हल चलाता मिला। राजा ने उसे देख और उससे बोले, 'अरे भईया! तुम मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन लो।' किसान बोला, 'जब तक मैं तेरी कथा सुनूंगा तब तक चार हरैया जोत लूंगा। जा अपनी कथा किसी और को सुनाना।' इस तरह राजा आगे चलने लगा। राजा के हटते ही बैल पछाड़ खाकर गिर गए तथा किसान के पेट में बड़ी जोर का दर्द होने लगा।

उस समय उसकी मां रोटी लेकर आई, उसने जब यह देखा तो अपने पुत्र से सब हाल पूछा और बेटे ने सभी हाल कह दिया तो बुढ़िया दौड़ी-दौड़ी उस घुड़सवार के पास गई और उससे बोली कि मैं तेरी कथा सुनूंगी, तू अपनी कथा मेरे खेत पर चलकर ही कहना। राजा ने बुढ़िया के खेत पर जाकर कथा कही, जिसके सुनते ही वह बैल उठ खड़े हुए तथा किसान के पेट का दर्द भी बंद हो गया।

राजा अपनी बहन के घर पहुंचा। बहन ने भाई की खूब मेहमानी की। दूसरे रोज प्रातःकाल राजा जगा तो वह देखने लगा कि सब लोग भोजन कर रहे हैं।

राजा ने अपनी बहन से कहा, 'ऐसा कोई मनुष्य है जिसने भोजन नहीं किया हो, मेरी बृहस्पतिवार की कथा सुन ले।' बहन बोली, 'हे भैया! यह देश ऐसा ही है कि पहले यहां लोग भोजन करते हैं, बाद में अन्य काम करते हैं। अगर कोई पड़ोस में हो तो देख आऊं।'

वह ऐसा कहकर देखने चली गई परंतु उसे कोई ऐसा व्यक्ति नहीं मिला जिसने भोजन न किया हो। अतः वह एक कुम्हार के घर गई जिसका लड़का बीमार था। उसे मालूम हुआ कि उनके यहां तीन रोज से किसी ने भोजन नहीं किया है। रानी ने अपने भाई की कथा सुनने के लिए कुम्हार से कहा, वह तैयार हो गया। राजा ने जाकर बृहस्पतिवार की कथा कही जिसको सुनकर उसका लड़का ठीक हो गया, अब तो राजा की प्रशंसा होने लगी।

राजा के हुई संतान

एक रोज राजा ने अपनी बहन से कहा, 'हे बहन! हम अपने घर को जाएंगे। तुम भी तैयार हो जाओ।' राजा की बहन ने अपनी सास से कहा। सास ने कहा हां चली जा, परंतु अपने लड़कों को मत ले जाना क्योंकि तेरे भाई के कोई औलाद नहीं है। बहन ने अपने भईया से कहा, 'हे भईया! मैं तो चलूंगी पर कोई बालक नहीं जाएगा।' राजा बोला, 'जब कोई बालक नहीं चलेगा, तब तुम ही क्या करोगी।' बड़े दुःखी मन से राजा अपने नगर को लौट आया।

राजा ने अपनी रानी से कहा, 'हम निरवंशी हैं। हमारा मुंह देखने का धर्म नहीं है और कुछ भोजन आदि नहीं किया।' रानी बोली, 'हे प्रभो! बृहस्पतिदेव ने हमें सब कुछ दिया है, वह हमें औलाद अवश्य देंगे।' उसी रात को बृहस्पतिदेव ने राजा से स्वप्न में कहा, 'हे राजा उठ। सभी सोच त्याग दे, तेरी रानी गर्भ से है।' राजा की यह बात सुनकर बड़ी खुशी हुई। नवें महीने में उसके गर्भ से एक सुंदर पुत्र पैदा हुआ। तब राजा बोला, 'हे रानी! स्त्री बिना भोजन के रह सकती है, पर बिना कहे नहीं रह सकती। जब मेरी बहन आवे तुम उससे कुछ कहना मत।' रानी ने सुनकर हां कर दिया।

जब राजा की बहन ने यह शुभ समाचार सुना तो वह बहुत खुश हुई तथा बधाई लेकर अपने भाई के यहां आई। तभी रानी ने कहा, 'घोड़ा चढ़कर तो नहीं आई, गधा चढ़ी आई।' राजा की बहन बोली, 'भाभी! मैं इस प्रकार न कहती तो तुम्हें औलाद कैसे मिलती।'

मनोकामना पूरी करते हैं बृहस्पतिदेव

बृहस्पतिदेव ऐसे ही हैं, जैसी जिसके मन में कामनाएं हैं, सभी को पूर्ण करते हैं। जो सदभावनापूर्वक बृहस्पतिवार का व्रत करता है एवं कथा पढ़ता है, अथवा सुनता है, दूसरों को सुनाता है, बृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामना पूर्ण करते हैं।

भगवान बृहस्पतिदेव उसकी सदैव रक्षा करते हैं। संसार में जो मनुष्य सदभावना से भगवान जी का पूजन-व्रत सच्चे हृदय से करते हैं, तो उनकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। जैसी सच्ची भावना से रानी और राजा ने उनकी कथा का गुणगान किया तो उनकी सभी इच्छाएं बृहस्पतिदेव जी ने पूर्ण की थीं। इसलिए पूर्ण कथा सुनने के बाद प्रसाद लेकर जाना चाहिए। हृदय से उसका मनन करते हुए जयकारा बोलना चाहिए।

॥ बोलो बृहस्पतिदेव की जय। भगवान विष्णु की जय ॥

गुरुवार व्रत से मिलते हैं ये लाभ

यह व्रत जिस किसी ने भी श्रद्धा से किया, उसके जीवन में सुख-समृद्धि की बरसात हो गई। कुंडली में अगर गुरु कमजोर, नीच या पीड़ित है तो यह व्रत उसे बलवान बना देता है। नौकरी और व्यापार में लगातार उन्नति होती है, रुका हुआ धन वापस आता है, संतान की प्राप्ति होती है और जिनका विवाह नहीं हो रहा, उनका विवाह शीघ्र और अच्छे घर में होता है। घर में कलह-क्लेश दूर होते हैं, सुख-शांति बढ़ती है, पितृदोष और गुरु से जुड़े सारे दोष मिट जाते हैं। सबसे बड़ा लाभ यह है कि अंत में वैकुंठ या गोलोक धाम की प्राप्ति होती है।

किन लोगों को यह व्रत जरूर रखना चाहिए?

जिन लोगों की कुंडली में गुरु कमजोर है, व्यापार नहीं चल रहा, संतान नहीं हो रही, विवाह में बार-बार रुकावट आ रही है या घर में हमेशा कलह और धन की कमी रहती है, उन्हें यह व्रत अवश्य रखना चाहिए। बस 11, 16 या 21 गुरुवार लगातार करें। फिर देखिए कैसे जीवन में एक के बाद एक चमत्कार होने लगते हैं।

आज से ही संकल्प लीजिए।

डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी शास्त्रों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।

Mohit Tiwari
मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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