Skanda Sashti Vrat Katha (स्कंद षष्ठी व्रत कथा): पौराणिक कथा के अनुसार, दैत्य तारकासुर अत्यंत शक्तिशाली हो गया था। उसने घोर तपस्या करके ब्रह्मा जी से यह वरदान प्राप्त कर लिया कि उसका वध केवल भगवान शिव के पुत्र द्वारा ही हो सकेगा। तारकासुर जानता था कि माता सती के देह-त्याग के बाद शिवजी जगत से विरक्त होकर समाधि में लीन हो चुके हैं तो उनके पुत्र होने की संभावना बहुत कम है। इस अहंकार में भरकर उसने तीनों लोकों में आतंक मचा दिया। देवता अत्यंत दुखी होकर ब्रह्मा और फिर भगवान विष्णु के पास गए। तब भगवान विष्णु ने कहा कि सृष्टि की रक्षा हेतु शिव को पुनः गृहस्थ जीवन की ओर लाया जाए।
देवताओं ने कामदेव को शिवजी की समाधि भंग करने हेतु भेजा। कामदेव ने शिवजी पर पुष्पबाण चलाए। शिवजी क्रोधित हो उठे और अपनी तीसरी आंख खोलकर कामदेव को भस्म कर दिया। बाद में माता पार्वती के तप से प्रसन्न होकर शिवजी ने उनसे विवाह किया। कुछ समय बाद उनके तेज से छः मुखों और बारह भुजाओं वाले कुमार कार्तिकेय का जन्म हुआ। उन्हें देवताओं का सेनापति बनाकर तारकासुर के युद्ध के लिए भेजा गया।
भगवान कार्तिकेय ने षष्ठी तिथि पर युद्ध आरम्भ किया और छः दिनों तक प्रचंड संग्राम हुआ। तब जाकर सातवें दिन कार्तिकेय जी ने अपने दिव्य वलय (शक्ति भाला वेल) से तारकासुर का वध किया। इसके बाद देव लोक में आनंद छा गया और सभी देवताओं ने कार्तिकेय की स्तुति की। हर साल इसी विजय के उपलक्ष्य में स्कंद षष्ठी का पर्व मनाया जाता है।
