Shivling Parikrama kaise kare (How to do Parikrama of Shivling): मंदिरों में पूजा के दौरान परिक्रमा का भी विधान है। लेकिन क्या यही नियम शिव मंदिर में भी लागू होता है। क्या शिवलिंग की पूरी परिक्रमा की जा सकती है। बता दें कि शिवलिंग की प्रक्रिमा का नियम दूसरे देवी-देवताओं से थोड़ा अलग होता है। यहां शिवलिंग के चारों ओर पूरा चक्कर लगाने के बजाय जलाधारी से निकलने वाली जलधारा तक जाकर वापस लौट आया जाता है। इसे शिवलिंग की आधी या चंद्राकार परिक्रमा कहा जाता है। हालांकि 'आधी' शब्द से यह न समझें कि आपकी परिक्रमा या पूजा अधूरी रह गई। जलाधारी को लांघे बिना दोनों ओर से की गई यह परिक्रमा अपने आप में पूर्ण मानी जाती है।
अब सवाल उठता है कि शिवलिंग की परिक्रमा कहां से शुरू करें, किस स्थान पर रुकें और जलाधारी को लांघने की मनाही क्यों है? आइए इसकी सही विधि आसान भाषा में समझते हैं।
सबसे पहले जलाधारी को पहचानें
शिवलिंग जिस आधार पर स्थापित होता है, उसे जलाधारी कहा जाता है। पूजा के समय शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल, दूध और दूसरे अभिषेक द्रव्य इसी में एकत्र होते हैं। इसके आगे निकले हुए हिस्से से अभिषेक का जल बाहर निकलता है।
जल बाहर निकलने के इस मार्ग को सोमसूत्र, निर्मली, प्रणाल या गोमुखी भी कहा जाता है। परिक्रमा करते समय इसी स्थान को पार नहीं किया जाता। इसलिए परिक्रमा शुरू करने से पहले यह देख लें कि अभिषेक का जल किस ओर से बाहर जा रहा है और उसी आधार पर चंद्राकार परिक्रमा की जाती है।
शिवलिंग की परिक्रमा कहां से शुरू करें
शिवलिंग के सामने खड़े होकर पहले हाथ जोड़ें और भगवान शिव का ध्यान करें। इसके बाद परिक्रमा शुरू करें। ध्यान रखें कि मंदिरों में परिक्रमा आरंभ करते हुए जहां आराध्य को अपने दाहिने रखा जाता है, वहीं शिवलिंग की परिक्रमा मंदिर की बनावट और जलाधारी की दिशा को ध्यान में रखकर की जाती है।
परिक्रमा करते हुए जलाधारी के निकास यानी सोमसूत्र के एक किनारे तक पहुंचें। अब उसी रास्ते से वापस लौटें। इसके बाद दूसरी दिशा में चलते हुए सोमसूत्र के दूसरे किनारे तक पहुंचें। वहां प्रणाम करें और फिर अपने प्रारंभिक स्थान पर लौट आएं। इस तरह सोमसूत्र को लांघे बिना दोनों ओर जाकर की गई परिक्रमा पूरी हो जाती है। याद रखें कि जलधारा के ऊपर से पैर रखकर दूसरी तरफ नहीं जाया जाता है।
शिवलिंग के आसपास इस तरह चलने से बनने वाला रास्ता अर्धचंद्र जैसा दिखाई देता है। इसीलिए इसे शिवलिंग के आसपास की जाने वाली परिक्रमा को 'चंद्राकार परिक्रमा' कहा गया है।
शिवलिंग की चंद्राकार परिक्रमा कैसे करें
- शिवलिंग के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम करें।
- जलाधारी और उससे निकलने वाली जलधारा को पहचानें।
- एक ओर से परिक्रमा शुरू करें।
- सोमसूत्र के एक किनारे तक पहुंचकर रुक जाएं।
- उसे लांघने के बजाय उसी रास्ते से वापस आएं।
- अब दूसरी ओर से चलते हुए सोमसूत्र के दूसरे किनारे तक जाएं।
- वहां से लौटकर शिवलिंग के सामने प्रणाम करें।
परिक्रमा करते समय जल्दी न करें। शांत मन से ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते हुए चल सकते हैं।
शिविलंग की जलाधारी को क्यों नहीं लांघना चाहिए
शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल भगवान शिव का अभिषेक करके बाहर आता है। धार्मिक दृष्टि से इसे सामान्य पानी नहीं, बल्कि पवित्र निर्माल्य माना जाता है। इसमें भक्तों की श्रद्धा, प्रार्थना और शिव पूजन का भाव जुड़ा होता है।
यही कारण है कि उसके प्रवाह के ऊपर से पैर रखना उचित नहीं माना गया। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं कि जिस तरह पूजा की थाली, प्रसाद, अग्नि और मंदिर की चौखट को पैरों से नहीं लांघा जाता, उसी तरह शिवलिंग की जलधारा को भी पार नहीं किया जाता।
परिक्रमा के दौरान सोमसूत्र के सामने रुकना पवित्रता और मर्यादा के सम्मान का प्रतीक है।
क्या शिवलिंग की आधी परिक्रमा करने से पूजा अधूरी रहती है
नहीं, शिवलिंग की आधी परिक्रमा अधूरी पूजा नहीं मानी जाती। यहां परिक्रमा की पूर्णता पूरे गोल चक्कर से तय नहीं होती। उसकी पूर्णता इस बात में है कि भक्त ने शिवलिंग के दोनों ओर जाकर सोमसूत्र की मर्यादा बनाए रखी।
इसलिए इसे केवल ‘आधी परिक्रमा’ कहने के बजाय ‘चंद्राकार परिक्रमा’ कहना अधिक सही है। इसमें भक्त का रास्ता भले ही पूरा वृत्त न बनाए, लेकिन उसकी प्रदक्षिणा पूरी मानी जाती है।
क्या हर शिव मंदिर में यही विधि अपनानी चाहिए
हर मंदिर की बनावट एक जैसी नहीं होती। कई मंदिरों में शिवलिंग गर्भगृह के भीतर स्थापित होता है और श्रद्धालुओं को उसके चारों ओर घूमने की अनुमति नहीं होती। ऐसे मंदिर में बाहर बने प्रदक्षिणा पथ से पूरे गर्भगृह या मंदिर की परिक्रमा की जा सकती है।
कुछ स्थानों पर सोमसूत्र ढका हुआ होता है या अभिषेक का जल सीधे भूमि के भीतर चला जाता है। कहीं मंदिर की अपनी स्थानीय पूजा परंपरा भी होती है। ऐसी स्थिति में मंदिर के पुजारी द्वारा बताई गई विधि का पालन करना ठीक रहता है।
आधी परिक्रमा का नियम मुख्य रूप से उस शिवलिंग के लिए है, जिसमें जलाधारी और अभिषेक जल के निकास का मार्ग साफ दिखाई देता हो।
शिव प्रतिमा की पूरी परिक्रमा कर सकते हैं
यदि मंदिर में भगवान शिव की मूर्ति स्थापित है और उसके साथ जलाधारी या सोमसूत्र नहीं है तो उसकी पूरी परिक्रमा की जा सकती है। इसी तरह पूरे शिव मंदिर, गर्भगृह या मंदिर परिसर की बाहरी परिक्रमा भी पूर्ण की जा सकती है।
याद रखें कि चंद्राकार परिक्रमा का नियम शिव के चारों ओर घूमने की मनाही का नहीं, बल्कि शिवलिंग के सोमसूत्र को न लांघने का है।
परिक्रमा करते समय इन बातों का ध्यान रखें
परिक्रमा हमेशा शांत भाव से करें। जलाधारी पर पैर न रखें और उससे निकलने वाले जल को लांघने का प्रयास न करें। भीड़ होने पर दूसरे श्रद्धालुओं को धक्का देते हुए परिक्रमा न करें। मंदिर में परिक्रमा के लिए जगह न हो तो वहीं खड़े होकर भगवान शिव को सच्चे दिल से प्रणाम करना भी पर्याप्त होता है।
पूजा में भाव सबसे महत्वपूर्ण है। यदि जानकारी न होने के कारण कभी विधि में गलती हो जाए तो भयभीत होने की जरूरत नहीं। भगवान शिव को भोलेनाथ कहा जाता है। साफ मन में क्षमा मांगें, सही विधि समझें और आगे से उसका ध्यान रखें।
ते हैं।
