Shabari Jayanti Katha: शबरी जयंती आज, करें इस पौराणिक कथा का पाठ तो माता शबरी जैसे मोक्ष पाएंगे आप
- Authored by: Srishti
- Updated Feb 8, 2026, 07:02 AM IST
Shabari Jayanti Katha (शबरी जयंती की कथा): हिंदू धर्म में शबरी जयंती का विशेष महत्व है। इस दिन भगवान श्री राम की असीम कृपा पाकर माता शबरी मोक्ष गति को प्राप्त हुई थी। शास्त्रों के अनुसार यदि कोई व्यक्ति फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को भगवान राम की भक्ति श्रद्धा पूर्वक करें, तो उसे भी मोक्ष की प्राप्त होती है। साथ ही आज के दिन शबरी माता की कथा जरूर पढ़नी चाहिए।
शबरी जयंती की कथा (AI Generated)
Shabari Jayanti Katha (शबरी जयंती की कथा): पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता शबरी का जन्म भील समुदाय की शबर जाति में हुआ था। उनके पिता का नाम अज था, जो भील समुदाय के मुखिया थे, जबकि माता का नाम इन्दुमति था। बचपन में शबरी का नाम श्रमणा था। वे सरल स्वभाव और करुणामयी हृदय की थीं। समय के साथ वे अपनी जाति के नाम से पहचानी जाने लगीं और उनका नाम शबरी पड़ गया।
जब शबरी युवावस्था में पहुंचीं तो उनके विवाह की तैयारियां शुरू हुईं। उनके पिता ने भील समाज की परंपरा के अनुसार विवाह तय किया। विवाह भोज के लिए बड़ी संख्या में पशु और पक्षी कबीले में लाए गए। जब शबरी ने इसके पीछे का कारण जाना और उन्हें बताया गया कि इन्हीं पशु-पक्षियों से विवाह का भोजन बनेगा, तो उनका हृदय व्यथित हो उठा। वे इस हिंसक परंपरा से बेहद दुखी हो गईं। उन्हें निर्दोष जीवों की हत्या स्वीकार नहीं थी। उसी क्षण उन्होंने विवाह न करने का संकल्प लिया।
रात के अंधेरे में शबरी ने साहस दिखाते हुए सभी पशु और पक्षियों को मुक्त कर दिया। हालांकि किसी ने उन्हें यह करते देख लिया, जिससे भयभीत होकर वे विवाह से एक दिन पहले ही घर छोड़कर दंडकारण्य वन की ओर निकल पड़ीं। यह वही वन था, जहां अनेक ऋषि-मुनि तपस्या किया करते थे।
दंडकारण्य में महर्षि मतंग का आश्रम था। शबरी उनकी सेवा करना चाहती थीं, लेकिन अपनी जाति के कारण उन्हें संकोच था कि कहीं उन्हें स्वीकार न किया जाए। फिर भी वे निस्वार्थ भाव से सेवा में जुट गईं। हर सुबह ऋषियों के जागने से पहले वे आश्रम से नदी तक का रास्ता साफ करतीं, कांटे चुनतीं और बालू बिछा देतीं। यह सब वे इस तरह करती थीं कि किसी को इसका आभास भी न हो।
धीरे-धीरे शबरी ने आश्रम की साफ-सफाई, झाड़ू लगाने और लकड़ियां लाने का कार्य संभाल लिया। जब ऋषियों को उनके कार्यों का पता चला तो उन्होंने उनसे परिचय पूछा। महर्षि मतंग ने शबरी को पुत्री समान स्वीकार किया और उन्हें भगवान श्रीराम के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि एक दिन स्वयं श्रीराम उनसे मिलने आएंगे और तब तक उन्हें प्रतीक्षा करनी होगी।
गुरु के वचन को शबरी ने जीवन का लक्ष्य बना लिया। मतंग ऋषि के देहांत के बाद भी वे पूरे समर्पण के साथ श्रीराम की प्रतीक्षा करती रहीं। वे प्रतिदिन मीठे बेर तोड़कर लातीं और एक-एक बेर चखकर सुनिश्चित करतीं कि कोई फल खट्टा या कीड़ों वाला न हो।
अंततः वनवास के दौरान भगवान श्रीराम लक्ष्मण सहित शबरी के आश्रम पहुंचे। शबरी ने अत्यंत प्रेम और श्रद्धा से उन्हें वे बेर अर्पित किए। भगवान राम ने उन्हें सहर्ष स्वीकार किया और खाया। लक्ष्मण को एक भीलनी के जूठे बेर खाने में संकोच हो रहा था। बड़े भाई और अपने आराध्य का श्रीराम का मन रखने के लिए उन्होंने बेर उठा तो लिए लेकिन खाए नहीं। इसका परिणाम यह हुआ कि राम-रावण युद्ध में जब शक्ति बाण का प्रयोग किया गया तो वे मूर्छित हो गए थे, तब इन्हीं बेर की बनी हुई संजीवनी बूटी उनके काम आयी थी। यह कथा शबरी की निष्काम भक्ति, प्रेम और समर्पण का अनुपम उदाहरण मानी जाती है।
