Sawan Shivratri 2026 Vrat Katha: शिव भक्तों के लिए सावन शिवरात्रि का दिन बेहद खास होता है, जो हर साल श्रावण (सावन) महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ता है। द्रिक पंचांग के अनुसार, इस बार सावन शिवरात्रि का महापर्व आज 11 अगस्त 2026, वार मंगलवार को मनाया जा रहा है। आज के दिन व्रत रखने के साथ-साथ शिव जी और माता पार्वती की पूजा की जाती है। साथ ही शिवलिंग पर जल चढ़ाने का विधान है। आज शिवलिंग पर गंगाजल चढ़ाने के बाद कांवड़ियों की कठिन कांवड़ यात्रा भी पूरी हो जाती है। मान्यता है कि सावन शिवरात्रि के दिन सच्चे मन से पूजा-पाठ करने से पापों का नाश होता है और जीवन में खुशियों का वास होता है।
अगर आपने भी आज सावन शिवरात्रि का उपवास रखा है तो शिव जी की पूजा के दौरान व्रत कथा जरूर पढ़ें, जिसके पश्चात ही इस उपवास को पूर्ण माना जाता है। चलिए अब जानें सावन शिवरात्रि की कथा/कहानी के बारे में।
सावन शिवरात्रि व्रत की कथा
शिकारी को बना लिया बंदी
पौराणिक कथाओं के अनुसार, प्राचीन काल में चित्रभानु नामक एक शिकारी था, जो जानवरों का शिकार करके अपने परिवार वालों का पालन-पोषण करता था। शिकारी ने एक साहूकार से काफी पैसे उधार ले रखे थे, जिसे वो लंबे समय से चुका नहीं पा रहा था। कर्ज न चुका पाने के कारण साहूकार ने एक दिन उस शिकारी को बंदी बना लिया।
शिकारी को इस शर्त पर छोड़ दिया गया
साहूकार ने शिकारी को जिस जगह पर बंद किया था, वहां पास ही शिव जी का एक मंदिर था। संयोगवश उस दिन शिवरात्रि थी। सुबह से ही मंदिर में शिव जी की पूजा, भजन और आरती की जा रही थी। शिकारी ने बंदी बने-बने शिव जी की पूजा देखी, भजन किया और शिवरात्रि व्रत की कथा भी सुनी। शाम को साहूकार ने उसे कुछ दिनों का ओर समय दिया और जल्द कर्ज चुकाने की शर्त पर छोड़ दिया।
अनजाने में हुई शिवरात्रि की पूजा
शिकारी को कर्ज चुकाने की टेंशन थी, जिसके कारण वो बिना कुछ खाए-पिए जंगल में शिकार करने के लिए निकल पड़ा। काफी देर तक शिकारी जंगल में घूमा, लेकिन उसे कुछ भी नहीं मिला। फिर वो एक पेड़ के ऊपर मचान बनाकर बैठ गया। इस बीच उसके हाथ से बेलपत्र की कुछ पत्तियां नीचे स्थापित शिवलिंग पर गिर गईं। इस तरह अनजाने में उससे शिवरात्रि की पूजा हो गई।
शिकारी को दिखा अपना पहला शिकार
रात में एक गर्भवती मृगी तालाब पर पानी पीने के लिए पहुंची, जिसे मारने के लिए शिकारी ने अपना धनुष उठाया। इस दौरान अनजाने में उससे बेलपत्र और पानी की कुछ बूंदें शिवलिंग पर गिर गईं। ऐसे में शिवरात्रि के प्रथम प्रहर की पूजा भी उससे हो गई। शिकारी मृगी का शिकार करने ही वाला था कि उसने कहा 'वो गर्भवती है और एक बच्चे को जन्म देने वाली है।' इसी के आगे उसने कहा, 'जब बच्चा हो जाएगा तो उसके बाद मैं वापस आ जाऊंगी। शिकारी को मृगी पर दया आ गई और उसने उसे जाने दिया।
पूरी हुई तीसरे प्रहर की पूजा
इसके बाद दूसरी मृगी तालाब में पानी पीने आई, जिसने अपने पति से मिलने के बाद वापस लौटने का वादा दिया। शिकारी ने इस मृगी को भी जाने दिया। कुछ देर बाद तीसरी मृगी भी अपने बच्चों के साथ वहां पर आई, जिसने अपने बच्चों को उनके पिता के पास छोड़कर वापस आने का वचन दिया। शिकारी ने इस मृगी और उसके बच्चों को भी जाने दिया। इस दौरान शिकारी का हाथ बेलपत्र पर लगा और वो टूटकर शिवलिंग पर गिर गया। ऐसे में शिकारी की तीसरे प्रहर की पूजा भी संपन्न हो गई।
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इस बार आया एक मृग
इसके बाद एक मृग तालाब में आया, जिसने शिकारी को बताया कि वो उन तीनों मृगियों का पति है। मृग ने शिकारी से कहा 'यदि वो उसकी पत्नियों को मारता है तो उसे भी मारना होगा, लेकिन उन्हें जीवनदान देता है तो उसे भी जाने देना होगा।' अपनी बात कहकर मृग वहां से चला गया और अगले दिन सुबह अपनी पत्नियों-बच्चों के साथ आया।
पूर्ण हुआ शिवरात्रि का व्रत
शिकारी को मृग और उसकी पत्नियों पर दया आ गई। साथ ही उसे अपने कर्मों का पश्चाताप होने लगा। उसने मृग के परिवार वालों को जीवनदान दे दिया और जीव हत्या न करने का संकल्प लिया। इस दौरान सूर्योदय हो गया था और शिकारी का शिवरात्रि का व्रत भी पूर्ण हुआ। कहा जाता है ये शिवरात्रि व्रत और शिव जी की कृपा ही थी कि शिकारी को अपने कर्मों का अहसास हुआ और उसने शिकार न करने का फैसला किया।
सावन शिवरात्रि व्रत की कथा से क्या सीख मिलती है?
सावन शिवरात्रि व्रत की कथा से ये सीख मिलती है कि यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन और ईमानदारी से शिव जी की पूजा करता है तो उसका जीवन बदल सकता है। वो सही रास्ते पर आ सकता है। साथ ही ये कथा दया, करुणा, प्रेम, सत्य और अहिंसा का संदेश देती है।
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