Maa Chandraghanta Vrat Katha: शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026 से हो गई है। आज नवरात्रि के तीसरे दिन मां दुर्गा के स्वरूप मां चंद्रघंटा का पूजन किया जाता है। मां चंद्रघंटा का स्वरूप शांति और शक्ति, दोनों का प्रतीक माना जाता है। उनके माथे पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र दिखाई देता है, इसी वजह से उन्हें चंद्रघंटा नाम दिया गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, यह मां पार्वती का विवाह के बाद का स्वरूप है। माता का यह रूप बुराई का सामना करने और धर्म की रक्षा करने वाली शक्ति को दर्शाता है। मां चंद्रघंटा की दस भुजाएं हैं और उनके हाथों में अलग-अलग अस्त्र-शस्त्र सुशोभित हैं। माता सिंह पर सवार होकर अन्याय और दुष्ट शक्तियों का मुकाबला करती हैं। उनके माथे पर सजा अर्धचंद्र मन की शांति का संदेश देता है, जबकि हाथों में मौजूद अस्त्र-शस्त्र साहस और पराक्रम की पहचान माने जाते हैं।
मां चंद्रघंटा की कथा: कैसे हुआ देवी का अवतरण और महिषासुर का वध?
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, महिषासुर नाम का एक शक्तिशाली दैत्य था। उसने अपनी ताकत के दम पर तीनों लोकों में आतंक मचा रखा था। उसकी शक्ति लगातार बढ़ती जा रही थी और वह देवताओं को भी परेशान करने लगा था। महिषासुर की नजर देवराज इंद्र के सिंहासन पर थी। वह स्वर्ग लोक पर अधिकार करके तीनों लोकों पर अपना शासन चलाना चाहता था। जब महिषासुर के अत्याचार बढ़ने लगे, तो देवताओं की चिंता भी बढ़ गई। महिषासुर और देवताओं के बीच भयंकर युद्ध होने लगा। इस युद्ध में महिषासुर की ताकत के सामने देवताओं को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा था। ऐसे में सभी देवता अपनी समस्या लेकर भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु और भगवान शिव के पास पहुंचे। उन्होंने त्रिदेवों को महिषासुर के अत्याचारों के बारे में बताया और उससे मुक्ति दिलाने की प्रार्थना की।
त्रिदेवों के क्रोध से हुआ मां चंद्रघंटा का अवतार
महिषासुर की हरकतों के बारे में जानकर त्रिदेवों को बहुत क्रोध आया। मान्यता है कि उनके क्रोध से दिव्य ऊर्जा निकली। धीरे-धीरे अन्य देवताओं की शक्तियां भी इस ऊर्जा में मिलती गईं। इसी दिव्य शक्ति से मां दुर्गा का प्राकट्य हुआ, जिन्हें मां चंद्रघंटा के स्वरूप में भी पूजा जाता है। माता के प्रकट होने के बाद सभी देवताओं ने उन्हें अपनी-अपनी शक्तियां प्रदान कीं। भगवान शिव ने माता को त्रिशूल दिया, जबकि भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र सौंपा। देवराज इंद्र ने उन्हें घंटा दिया और सूर्य देव ने अपना तेज प्रदान किया। इस तरह माता चंद्रघंटा दिव्य शक्तियों और अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित हो गईं।
मां चंद्रघंटा ने किया महिषासुर का वध
देवताओं की शक्तियां प्राप्त करने के बाद माता ने महिषासुर का सामना किया। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। माता चंद्रघंटा ने अपनी शक्ति और पराक्रम से महिषासुर को पराजित कर उसका वध कर दिया। इस तरह उन्होंने देवताओं को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई और स्वर्ग लोक की रक्षा की। मां चंद्रघंटा को साहस, शक्ति और अन्याय के विरुद्ध लड़ने का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि के तीसरे दिन भक्त माता के इस स्वरूप की पूजा करते हैं। मान्यता है कि सच्चे मन से माता की आराधना करने से भय दूर होता है और जीवन में साहस व आत्मविश्वास बढ़ता है। माता का यह स्वरूप भक्तों को सिखाता है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, सत्य और धर्म की शक्ति से उसका सामना किया जा सकता है।
