अध्यात्म

Lalita Saptami 2025: अगस्त में ललिता सप्तमी कब है? जानें राधा रानी से क्या हैं ललिता देवी का संबंध, कैसे की जाती है पूजा, पढ़ें पौराणिक कथा

Lalita Saptami 2025: राधाष्टमी से 1 दिन पहले और जन्माष्टमी के 14 दिन बाद ललिता सप्तमी का त्योहार मनाया जाता है। इस साल ललिता सप्तमी कब है और इसे कैसे मनाया जाता है, ये आप यहां से जान सकते हैं। यहां पर ललिता सप्तमी की पूजा विधि के साथ व्रत कथा भी मौजूद है।

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ललिता सप्तमी 2025 तिथि, मुहूर्त, पूजा विधि और व्रत कथा (photo source: AI)

Lalita Saptami 2025: हर साल ललिता सप्तमी का त्योहार आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को मनाया जाता है। ललिता सप्तमी का त्योहार हिंदू धर्म में खास महत्व रखता है। ये त्योहार श्री ललिता देवी के सम्मान में मनाया जाता है। ललिता देवी, श्री कृष्ण और राधा रानी की खास सखी थीं। कहत हैं कि ललिता सप्तमी का व्रत और पूजा करने से सुख और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। मान्‍यता है क‍ि इस व्रत को करने से नवविवाहित जोड़ों को स्वस्थ और सुंदर संतान प्राप्ति का आशीर्वाद मिलता है। इसके अलावा यह व्रत संतान की अच्‍छी सेहत और लंबी उम्र के ल‍िए भी रखा जाता है।

ललिता सप्तमी 2025 डेट और मुहूर्त (Lalita Saptami 2025 Date And Muhurat)-

साल 2025 में ललित सप्तमी का त्योहार 30 अगस्त, दिन शनिवार को मनाया जाएगा।

ललिता / संतान सप्तमी की पूजा दोपहर में करने का विधान है।

शुभ मुहूर्त-

सप्तमी तिथि 29 अगस्त 2025, शुक्रवार को रात 08 बजकर 21 मिनट पर आरंभ होगी।

सप्तमी तिथि का समापन 30 अगस्त 2025, शनिवार को रात 10 बजकर 46 मिनट पर होगा।

ललिता सप्तमी पूजा विधि (Lalita Saptami Puja Vidhi)-

  • सुबह स्नान के बाद गणेश जी का ध्यान करना चाहिए।
  • फिर दिन में गणेश जी, देवी ललिता देवी, देवी पार्वती, देवी षष्ठी, कारिक, शिव और शालिग्राम की पूजा की जाती है।
  • नारियल, चावल, हल्दी, चंदन, गुलाल, फूल और दूध देवताओं को प्रसाद के रूप में दिया जाता है।
  • पूजा क्षेत्र में लाल धागा या मौली रखी जाती है। प्रार्थना के बाद इसे दाहिने हाथ में पहना जाता है।
  • उपवास सूर्योदय से अगले दिन सूर्योदय तक होता है।
  • दिन में एक बार ही भोजन किया जाता है।
  • कामकाजी महिलाओं, पढ़ाई करने वालों और चिकित्सा समस्याओं वाले लोगों को उपवास नहीं करना चाहिए। उन्हें केवल प्रार्थना करनी चाहिए।
  • अगले दिन सुबह प्रार्थना करने के बाद उपवास तोड़ा जाता है। देवताओं को चढ़ाया गया फल प्रसाद के रूप में वितरित किया जाता है।

ललिता सप्तमी व्रत कथा (Lalita Saptami Vrat Katha)-

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान कृष्ण की आठ सखियाम थीं और उनके नाम थे श्री राधा, श्री ललिता, श्री विशाखा, श्री चित्रा, श्री इंदुलेखा, श्री चंपकलता, श्री रंग देवी, श्री सुदेवी और श्री तुंगविद्या। माना जाता है कि इन सभी मित्रों में से नंदलाल श्री राधा जी और ललिता जी से सबसे अधिक प्रेम करते थे। ललिता सप्तमी का व्रत भी श्री कृष्ण की प्रिय सखी ललिता जी को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस दिन श्री कृष्ण और राधा रानी के साथ श्री ललिता जी की पूजा करने से भक्त श्री कृष्ण के प्रेम में पड़ जाते हैं। हम सभी जानते हैं कि सृष्टि के रचयिता भगवान श्री कृष्ण जिसकी परवाह करते हैं उसकी झोली दुनिया की सारी खुशियों से भर देते हैं। शास्त्र यह भी कहते हैं कि ललिता सप्तमी की पूजा करने से संतान सुख की भी प्राप्ति होती है।

दूसरी कथा-

पौराण‍िक ग्रंथों में ऋषि लोमेश के मुख से लल‍िता सप्‍तमी ज‍िसे संतान सप्‍तमी भी कहा जाता है वह सुनने को म‍िली है। कथा म‍िलती है क‍ि अयोध्या के राजा नहुष की पत्नी चंद्रमुखी की एक सहेली थी। ज‍िसका नाम रूपमती था। वह नगर के ब्राह्मण की पत्नी थी। दोनों ही सखियों में बहुत प्रेम था। एक बार वे दोनों सरयू नदी के तट पर स्नान करने गयी, वहां बहुत सी स्त्रियां संतान सप्तमी का व्रत कर रही थी। उसकी कथा सुनकर इन दोनों सखियों ने भी पुत्र प्रप्ति के लिए इस व्रत को करने का निश्चय किया, लेकिन घर आकर वे दोनों भूल गईं। कुछ समय बाद दोनों की मृत्यु हो गई और दोनों ने पशु योनी में जन्म लिया। कई जन्मों के बाद दोनों ने मनुष्य योनी में जन्म लिया, इस जन्म में चंद्रमुखी का नाम ईश्वरी और रूपमती का नाम भूषणा था। ईश्वरी राजा की पत्नी एवं भूषणा ब्राह्मण की पत्नी थी, इस जन्म में भी दोनों में बहुत प्रेम था। इस जन्म में भूषणा को पूर्व जन्म की कथा याद थी इसलिए उसने संतान सप्तमी का व्रत किया, जिसके प्रताप से उसे आठ पुत्र प्राप्त हुए लेकिन ईश्वरी ने इस व्रत का पालन नहीं किया, इसलिए उसकी कोई संतान नहीं थी। इस कारण उसे भूषणा ने ईर्ष्‍या होने लगी थी। उसने कई प्रकार से भूषणा के पुत्रों को मारने की कोशिश की, लेकिन उसके भूषणा के व्रत के प्रभाव से उसके पुत्रों को कोई क्षति ना पहुंची। थक-हारकर ईश्वरी ने अपनी ईर्ष्‍या एवं अपने कृत्य के बारे में भूषणा से कहा और क्षमा भी मांगी। तब भूषणा ने उसे पूर्वजन्म की बात याद दिलाई और संतान सप्तमी के व्रत को करने की सलाह दी। ईश्वरी ने पूरे व‍िधि-विधान के साथ व्रत किया और उसे एक सुंदर पुत्र की प्राप्ति हुई। मान्‍यता है जो भी दंपत्ति इस कथा को पढ़ते व सुनते हैं उन्‍हें कुल का मान बढ़ाने वाली संतान की प्राप्ति होती है।

Srishti
सृष्टिauthor

सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि है। यही वजह है कि उनके लेखों में परंपरा, आस्था और जीवनशैली की सहज समझ खूबसूरती से दिखाई देती है। वह धार्मिक कथाओं, ग्रंथों से जुड़े विषयों, आध्यात्मिक ट्रेंड्स और समकालीन जीवनशैली पर 5,000 से अधिक लेख लिख चुकी हैं। मॉडर्न लाइफस्टाइल और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाते हुए वह ऐसे कंटेंट गढ़ती हैं, जो प्रेरक होने के साथ-साथ जानकारीपूर्ण भी होता है।

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