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Kokila Vrat Katha: कोकिला व्रत आज, पढ़ें ये व्रत कथा, मनचाहा वर और दांपत्य जीवन में आएगी खुशहाली

Kokila Vrat 2025 Katha (कोकिला व्रत की संपूर्ण कथा): आज से कोकिला व्रत की शुरुआत हो रही है। आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी से सावन पूर्णिमा तक किए जाने वाले इस व्रत में आदिशक्ति मां भगवती के कोयल रूप की पूजा होती है। यहां से आप कोकिला व्रत की कथा पढ़ सकते हैं।

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कोकिला व्रत कथा 2025 (Photo Source: Canva)

Kokila Vrat Katha In Hindi: ज्यादातर व्रत महिलाओं द्वारा अपने पति की दीर्घायु, सुखद दांपत्य और खुशहाल जीवन के लिए व्रत रखती हैं। वहीं, कुंवारी लड़कियों भी मनचाहा पति पाने की इच्छा मन में रखकर व्रत करती हैं। ऐसा ही एक व्रत कोकिला के नाम से भी जाना जाता है। आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि से लेकर सावन मास की पूर्णिमा तक इस व्रत को करने का विधान होता है। कोकिला व्रत के दिन माता सती और भगवान शिव की पूजा की जाती है। सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु के लिए किया जाता है। कोकिला व्रत सुहागिन महिलाओं के द्वारा पति लंबी आयु के लिए किया जाता है। इस दिन व्रत कथा का पाठ करने से अखंड सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कहा जाता है कि कोकिला देवी सती का रूप है और इसकी पूजा करना फलदायक है। कोकिला व्रत का फल कथा सुनने के पश्चात ही पूरा मिलता है इसीलिए इस दिन कथा का पाठ करें।

कोकिला व्रत कथा-

इस व्रत कथा का वर्णन शिव पुराण में देखने को मिलता है। मान्यता है कि माता सती ने भगवान शिव को प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी। तब उनका शिवजी जीवनसाथी के रूप में मिले थे। यह कथा इस प्रकार है कि राजा दक्ष की बेटी के रुप में देवी सती का जन्म होता है। राजा दक्ष विष्णु भगवान के भक्त थे और शिवजी से द्वेष रखते थे। जब सती के विवाह के बारे में बात होती है, तब दक्ष भगवान शिव के साथ कभी भी सती को नहीं जोड़ना चाहते हैं। राजा दक्ष के मना करने पर भी सती शिवजी से विवाह कर लेती हैं। इससे दक्ष क्रोधित हो जाते हैं और पुत्री सती से अपने सभी संबंध तोड़ लेते हैं। कुछ समय के बाद राजा दक्ष भगवान शिव को अपमानित करने हेतु महायज्ञ का आयोजन करते हैं। इसमें वह ब्रह्मा, विष्णु व सभी देवी देवताओं को आमंत्रित करते हैं। लेकिन भगवान शिव को आमंत्रण नहीं भेजते हैं।

जब देवी सती को इस बात का पता चलता है तो वह भगवान शिव से पिता दक्ष के यज्ञ में जाने की आज्ञा मांगती हैं। इस पर शिवजी समझाते हैं कि बिना बुलाए जाना उचित नहीं होगा, फिर चाहें वह उनके पिता का घर ही क्यों न हो। सती शिव की बात से सहमति नहीं दिखाती हैं और अपने पिता के यज्ञ में पहुंच जाती हैं। सती यज्ञ पर जाकर जब अपने पति का स्थान नहीं पातीं तो अपने पिता से इस बारे में प्रश्न पूछती हैं। पुत्री सती और शिव का अपमान करते हैं। शिवजी के बारे में अपमान जनक शब्दों को सुनकर वह क्रोधित हो जाती हैं और यज्ञ के हवन कुंड में ही अपने देह का त्याग कर देती हैं।

भगवान शिव को जब इस बारे में पता चलता है, तो वह यज्ञ को नष्ट कर, दक्ष के अहंकार का नाश करते हैं। शिव सती के वियोग को सहन नहीं कर पाते हैं और उनकी इच्छा के विरुद्ध यज्ञ में जाकर प्राणों को त्यागने पर शिवजी सती को हजार वर्षों तक कोयल बनने का श्राप दे देते हैं।

देवी सती हजारों वर्षों तक कोयल बनकर भगवान शिव को पुन: प्राप्त करने के लिए तपस्या करती हैं। इसके फल में उन्हें पार्वती के रूप में भगवान शिव की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि इस व्रत को कोकिला व्रत के नाम से जाना जाता है और कुंवारी कन्याओं द्वारा भी इस व्रत को रखना बहुत फलदायी माना गया है।

कोकिला व्रत की शुरुआत होने की कथा-

यमुना तट पर मथुरा नामक एक सुन्दर नगरी में रामचन्द्रजी ने अपने भाई शत्रुघ्न को राजा के पद पर प्रतिष्ठित किया था, जिनकी पत्नी का नाम किर्तिमाला था। वह बहुत पतिव्रता थीं। ऐसे में एक दिन उन्होंने अपने गुरु वशिष्ठ जी से पूछा कि आप मुझे कोई ऐसा व्रत बताइए, जिससे सौभाग्य, पुत्र और सुख-समृद्धि प्राप्त हो। इस पर गुरु वशिष्ठ ने बताया कि आषाढ़ मास की पूर्णिमा को संकल्प करें कि श्रावण महीने में पूरे माह मैं नित्य स्नान , तारों की छांव में भोजन, भूमि पर शयन,ब्रह्मचर्यं का पालन और प्राणियों पर दया करूंगी। नदी या तीर्थ स्थान पर (तिल का उबटन) उबटन लगाकर आठ दिन स्नान करुंगी। साथ ही, सर्वोषधियो का उबटन लगाकर आठ दिन स्नान भी करना होगा। शेष दिनों में जौ के आटे , हल्दी का उबटन लगाकर स्नान कर सूर्य भगवान का ध्यान करनी होगी।

गुरु वशिष्ठ ने कहा कि तिल को पीसकर कोकिला पक्षी की मूर्ति बनाकर लाल पुष्प , लाल चन्दन , अगरबत्ती ,तिल , चावल और दूर्वा से 'तिलसहे तिलसौख्ये तिलवर्ण तिलप्रिये, सौभाग्यद्रव्यपुत्रास्रच देहि में कोकिले नम:' यह मंत्र बोलकर पूजा करें।

आपको तिल अत्यंत प्रिय हैं और आप आप तिल के समान श्याम वर्ण की हैं। आप मुझे सौभाग्य, संपत्ति और संतान प्रदान करें। आपके चरणों में मैं बारम्बार नमस्कार करती हूं। इस प्रकार पूजा करने के पश्चात भोजन ग्रहण करें। इस विधि से एक महीने तक व्रत पूजन के बर्तन में कोकिला पक्षी को रख वस्त्र दक्षिणा शिन ब्राह्मण को दान करे। विधि-विधान से जो स्त्री कोकिला व्रत रखती है उसे जन्म जन्म तक अंखड सौभाग्य प्राप्त होता है। वशिष्ठ जी से व्रत का विधान जानने के बाद किर्तिमाला ने इस व्रत को किया था और उन्हें अखण्ड सौभाग्य उत्तम संतान, सुख-समृद्धि व शत्रुघ्न जी का साथ मिला था।

Srishti
सृष्टिauthor

सृष्टि टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल की फीचर डेस्क से जुड़ी कंटेंट राइटर हैं, जो मुख्य रूप से धर्म और लाइफस्टाइल सेक्शन के लिए लिखती हैं। सृष्टि को आध्यात्म, भारतीय संस्कृति और साहित्य में गहरी रुचि है। यही वजह है कि उनके लेखों में परंपरा, आस्था और जीवनशैली की सहज समझ खूबसूरती से दिखाई देती है। वह धार्मिक कथाओं, ग्रंथों से जुड़े विषयों, आध्यात्मिक ट्रेंड्स और समकालीन जीवनशैली पर 5,000 से अधिक लेख लिख चुकी हैं। मॉडर्न लाइफस्टाइल और पारंपरिक मूल्यों के बीच संतुलन बनाते हुए वह ऐसे कंटेंट गढ़ती हैं, जो प्रेरक होने के साथ-साथ जानकारीपूर्ण भी होता है।

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