Kalpi Ganesh Mandir: काल्पी का नाम 1857 की आजादी की लड़ाई से गहराई से जुड़ा है, लेकिन इसकी पहचान इससे भी पुरानी है। यहां बना ऐतिहासिक गणेश मंदिर आज भी भक्तों की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर का निर्माण छत्रपति शिवाजी महाराज के गुरु समर्थ रामदास ने 1569 में अपने देशव्यापी भ्रमण के दौरान करवाया था। लाल बलुआ पत्थर और चूने से बने इस मंदिर का गर्भगृह, विशाल आंगन और चारों ओर बना परिक्रमा मार्ग इसकी विशेषता है।
मंदिर में दो गणपति एक साथ
इस मंदिर की खासियत यह है कि यहां एक ही गर्भगृह में दो गणपति विराजमान हैं। सफेद संगमरमर से बनी पहली मूर्ति "आदि गणेश" की है, जिसकी प्राण प्रतिष्ठा 1749 में पेशवा बाजीराव प्रथम ने करवाई थी। दूसरी मूर्ति "सिद्धि गणपति" के रूप में जानी जाती है, जिसकी प्राण प्रतिष्ठा रानी लक्ष्मीबाई ने करवाई थी। मंदिर में आकर भक्त अपनी मनोकामनाएं पूर्ण मानते हैं।
बाजीराव और छत्रसाल की विजय से जुड़ा प्रसंग
इतिहास में यह मंदिर उस समय खास चर्चा में आया जब बुंदेलखंड के राजा छत्रसाल ने औरंगजेब के सेनापति वंगश खा से युद्ध के लिए बाजीराव प्रथम को सहायता के लिए बुलाया। युद्ध से पहले बाजीराव ने इस मंदिर में पूजा-अर्चना की और "आदि गणेश" का आशीर्वाद लिया। कहते हैं इसी आशीर्वाद की शक्ति से बाजीराव ने दुश्मनों की चार गुनी सेना को हराकर विजय प्राप्त की।
रानी लक्ष्मीबाई का संबंध
19वीं शताब्दी में अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध के समय झांसी की रानी लक्ष्मीबाई ने भी इस मंदिर में पूजा की और गणेश जी के समीप एक और मूर्ति स्थापित की, जो "सिद्धि गणपति" कहलाती है। यही वजह है कि काल्पी का गणेश मंदिर न सिर्फ धार्मिक, बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है।
मंदिर की परंपरा
मंदिर की स्थापना से ही महाराष्ट्र के ब्राह्मण परिवार महंत की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। अब तक सात पीढ़ियां इस परंपरा को आगे बढ़ा चुकी हैं। मंदिर के महंत मोहन कौंधारे बताते हैं कि यहां छत्रपति शिवाजी महाराज भी दर्शन के लिए आए थे।
आस्था और मान्यता
स्थानीय लोगों का मानना है कि गणपति जी के दर्शन मात्र से सभी विघ्न दूर हो जाते हैं। यही कारण है कि बड़े-बड़े नेता और अधिकारी भी इस मंदिर में मत्था टेकने आते रहते हैं। हालांकि एक बार बिजली गिरने से मंदिर की दीवारें क्षतिग्रस्त हो गईं, जिससे उन पर बनी मराठा चित्रकारी अब साफ दिखाई नहीं देती।
