Falgun Purnima Vrat Katha In Hindi (होलिका दहन की कथा): होली और होलिका दहन हिंदू धर्म के प्रमुख पर्वों में से एक माने जाते हैं, जो हर साल फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाए जाते हैं। इन त्योहारों का धार्मिक और लोक मान्यता के अनुसार विशेष महत्व है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, होलिका दहन की परंपरा भक्तराज प्रह्लाद से जुड़ी हुई है। लोक मान्यताओं के अनुसार, होलिका दहन से नकारात्मक ऊर्जा, बुरी शक्तियों और रोग-दोषों का नाश होता है। विभिन्न क्षेत्रों में इस दिन विशेष रीति-रिवाज और परंपराएं निभाई जाती हैं जिसके ठीक अगले दिन होली का उत्सव मनाया जाता है, जिसे रंगों का त्योहार भी कहा जाता है। होलिका दहन का पर्व भक्ति, धर्म और सद्भाव का प्रतीक माना जाता है। होलिका दहन का ये उत्सव न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण होता है, जो जीवन में उल्लास और सकारात्मकता का संदेश देता है। ऐसे में चलिए जानते हैं होलिका दहन की कथा को।
Falgun Purnima Vrat Katha In Hindi (होलिका दहन की कथा)
पौराणिक कथाओं के अनुसार, सतयुग में हिरण्यकश्यप नामक एक दैत्य राजा था। हिरण्यकश्यप के भाई हिरण्याक्ष का भगवान विष्णु ने वराह अवतार लेकर वध किया था। इस कारण हिरण्यकश्यप उन्हें दुश्मन मानता था। हिरण्यकश्यप का विवाह कयाधु से हुआ, जिससे उसे प्रह्लाद नामक पुत्र की प्राप्ति हुई। हिरण्यकश्यप ने मनचाहे वरदान के लिए भगवान ब्रह्मा की तपस्या शुरू की। इस दौरान देवताओं ने उसकी नगरी पर आक्रमण कर दिया और वहां अपना शासन स्थापित कर लिया। उस समय देवर्षि नारद मुनि ने कयाधु की रक्षा की और अपने आश्रम में स्थान दिया। वहीं पर हिरण्यकश्यप के पुत्र प्रह्लाद का जन्म हुआ।
देवर्षि नारद मुनि की संगत में रहने के कारण प्रह्लाद भगवान विष्णु का भक्त बन गया। उधर, कई वर्षों तक तपस्या के बाद हिरण्यकश्यप को भगवान ब्रह्मा ने दर्शन दिए। हिरण्यकश्यप ने वरदान मांगा कि मेरी मृत्यु मनुष्य या पशु के हाथों न हो, न किसी अस्त्र-शस्त्र से, ना दिन व रात में, ना भवन के बाहर और ना ही अंदर, न भूमि ना आकाश में हो मेरी मृत्यु हो। कुल मिलाकर, अपनी समझ में उसने अमरता का वरदान मांगा। भगवान ब्रह्मा ने उसे ये वरदान दे दिया। किंतु, इसके बाद वो निरंकुश हो गया। वो ऋषि-मुनियों की हत्या करवाने लगा और स्वयं को भगवान घोषित कर दिया। किंतु, स्वयं उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु भक्ति में लीन रहता। ये बात हिरण्यकश्यप को पता चली तो वो गुस्से से फट पड़ा।
बार-बार समझाने के बाद भी प्रह्लाद ने जिद नहीं छोड़ी तो उसने उसे मारने का फैसला कर लिया। हिरण्यकश्यप की एक बहन थी होलिका। होलिका को भी भगवान ब्रह्मा से एक वरदान मिला था कि उसे अग्नि नहीं जला सकती। हिरण्यकश्यप ने होलिका को कहा कि वो प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर अग्नि में बैठ जाए, ताकि प्रह्लाद भाग न सके और वह उसी अग्नि में जलकर ख़ाक हो जाए। होलिका ने किया तो ऐसा ही, किंतु वह खुद भस्म हो गई और प्रह्लाद बच गया। कहा जाता है कि होलिका के एक वस्त्र में न जलने की शक्तियां समाहित थीं, किंतु भगवान विष्णु की कृपा से चली तेज आंधी से वो वस्त्र होलिका से हटकर, प्रह्लाद के शरीर से लिपट गया था। होलिका के जलने और प्रह्लाद के बच जाने पर नगरवासियों ने उत्सव मनाया, जिसे छोटी होली के रूप में भी जानते हैं।
इसके बाद जब ये बात फैली तो विष्णु भक्तों ने अगले दिन और भी भव्य तरीके से उत्सव मनाया। होलिका से जुड़ा होने के कारण आगे इस उत्सव का नाम ही होली पड़ गया। उधर, हिरण्यकश्यप ने प्रह्लाद को मारने के लिए उसे एक खंभे में बांध दिया। वो प्रह्लाद को मारने ही वाला था कि भगवान विष्णु खंभा फाड़कर नरसिंह अवतार में प्रकट हुए। उन्होंने हिरण्यकश्यप को उसके भवन की चौखट पर ले जाकर, संध्या के समय, अपने गोद में रखकर नाखूनों की सहायता से उसका वध कर दिया। इस तरह भगवान ब्रह्मा का वरदान भी नहीं टूटा और आततायी का अंत हो गया। भगवान को भक्त प्रह्लाद को उसका उत्तराधिकारी बना दिया।
