Hartalika Teej: हरितालिका तीज केवल व्रत और श्रृंगार का पर्व नहीं, बल्कि माता पार्वती के अटूट संकल्प, तपस्या और भगवान शिव को पति रूप में पाने की उनकी साधना की याद दिलाने वाला त्योहार भी है। इस दिन पूजा में बालू या मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा (Shiva Parvati Idol) बनाने की परंपरा कई क्षेत्रों में विशेष रूप से निभाई जाती है। आखिर इस परंपरा के पीछे क्या कहानी है और क्यों इसे इतना महत्वपूर्ण माना जाता है? आइए जानते हैं।
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है कहानी
धार्मिक मान्यता के अनुसार, माता पार्वती बचपन से ही भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने की इच्छा रखती थीं। इसके लिए उन्होंने कठोर तपस्या की। मान्यता है कि तपस्या के दौरान उन्होंने अपने हाथों से मिट्टी या बालू से शिवलिंग और शिव स्वरूप तैयार किया और पूरी श्रद्धा के साथ उनकी आराधना की। उनकी इसी अटूट भक्ति और तप से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार करने का वर दिया। यही वजह है कि हरितालिका तीज पर बालू या मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाकर पूजा करने की परंपरा को माता पार्वती की उस साधना की स्मृति से जोड़ा जाता है।
बालू और मिट्टी का महत्व
इस परंपरा में एक गहरा आध्यात्मिक संदेश भी छिपा माना जाता है। बालू या मिट्टी से प्रतिमा बनाना यह दर्शाता है कि ईश्वर की आराधना में महंगी या भव्य वस्तुओं से ज्यादा महत्व श्रद्धा, भावना और संकल्प का है। मिट्टी धरती का प्रतीक है और प्रतिमा का बनना तथा बाद में उसका प्रकृति में विलीन हो जाना जीवन के उस सत्य की ओर भी संकेत करता है कि संसार की हर भौतिक वस्तु परिवर्तनशील है। इसलिए हरितालिका तीज की पूजा में स्वयं हाथों से प्रतिमा बनाना केवल एक रस्म नहीं, बल्कि भक्ति को अपने कर्म से जोड़ने का माध्यम माना जाता है।
‘हरतालिका’ तीज नाम का महत्व
इस पर्व का नाम भी माता पार्वती की इसी कथा से जुड़ा माना जाता है। प्रचलित मान्यता के अनुसार, जब माता पार्वती के पिता उनका विवाह भगवान विष्णु से करना चाहते थे, तब उनकी सखी उन्हें वहां से वन में ले गईं ताकि पार्वती अपनी इच्छा के अनुसार भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए तपस्या कर सकें। ‘हरतालिका’ शब्द को परंपरागत रूप से ‘हरत’ और ‘आलिका’ से जोड़ा जाता है। यहां ‘आलिका’ का अर्थ सखी और ‘हरत’ का संबंध हरण या अपने साथ ले जाने से माना जाता है। इसी प्रसंग के कारण यह व्रत हरतालिका तीज के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
प्रतिमा बनाना क्यों माना जाता है खास?
हरितालिका तीज की पूजा में बालू से शिव-पार्वती की प्रतिमा बनाना व्रती के लिए माता पार्वती के संकल्प को आत्मसात करने जैसा माना जाता है। जब कोई महिला अपने हाथों से प्रतिमा तैयार करती है तो वह प्रतीकात्मक रूप से पार्वती की तपस्या, धैर्य और दृढ़ इच्छा को याद करती है। इसीलिए कुछ परंपराओं में बाजार से लाई गई तैयार प्रतिमा की जगह स्वयं मिट्टी या बालू से शिव-पार्वती की आकृति बनाने को विशेष महत्व दिया जाता है। हालांकि पूजा की परंपराएं क्षेत्र और परिवार के अनुसार अलग-अलग हो सकती हैं।
दांपत्य का खास संदेश
हरितालिका तीज का केंद्र शिव और पार्वती का संबंध है। भगवान शिव और माता पार्वती को आदर्श दांपत्य, प्रेम, समर्पण और एक-दूसरे के प्रति सम्मान का प्रतीक माना जाता है। इसलिए सुहागिन महिलाएं इस दिन सुखी वैवाहिक जीवन और पति की दीर्घायु की कामना से व्रत रखती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएं मनचाहे जीवनसाथी की कामना से पूजा करती हैं। इस नजरिए से देखें तो बालू की छोटी-सी प्रतिमा केवल पूजा की वस्तु नहीं है। वह उस विश्वास की तस्वीर है, जिसमें सच्ची इच्छा के साथ किया गया संकल्प, धैर्य और भक्ति जीवन की दिशा बदल सकती है।
