Gupt Navratri 2026: आज गुप्त नवरात्रि का 6वां दिन, किस महाविद्या की छठवें दिन होती है पूजा, जानिए पूजा विधि और मंत्र और उत्पत्ति कथा
- Authored by: Mohit Tiwari
- Updated Jan 24, 2026, 09:17 AM IST
Gupt Navratri 2026: आज गुप्त नवरात्रि का छठा दिन है। आज के दिन मां त्रिपुर भैरवी का पूजन किया जाता है। मां दस महाविद्याओं में छठे नंबर की महाविद्या हैं। मां का स्वरूप उग्र और शक्तिशाली है। मां त्रिपुर भैरवी का पूजन हर प्रकार के भय और नकारात्मक शक्तियों का नाश करता है। आइए जानते हैं कि आज के दिन माता पूजन कैसे करें?
मां त्रिपुर सुंदरी की पूजा
Gupt Navratri 2026: आज 24 जनवरी को गुप्त नवरात्रि की षष्ठी तिथि है। गुप्त नवरात्रि के नौ दिनों में दस महाविद्याओं की साधना का विशेष महत्व माना जाता है। षष्ठी तिथि पर दस महाविद्याओं में से छठी महाविद्या मां त्रिपुर भैरवी की पूजा की जाती है। तांत्रिक साधना में मां त्रिपुर भैरवी को अत्यंत उग्र और शक्तिशाली देवी माना गया है। ऐसा माना जाता है कि इनकी पूजा से भय, बाधा, शत्रु और नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और साधक को आत्मबल तथा साहस की प्राप्ति होती है।
मां त्रिपुर भैरवी कौन हैं?
मां त्रिपुर भैरवी दस महाविद्याओं में छठे स्थान पर विराजमान हैं। इन्हें शक्ति का उग्र और तेजस्वी स्वरूप माना जाता है। शास्त्रों में मां त्रिपुर भैरवी को अग्नि तत्व से जुड़ी देवी कहा गया है, जो सृष्टि में परिवर्तन, संहार और शुद्धि का कार्य करती हैं। उनका स्वरूप प्रचंड तेज से युक्त है, आंखें लाल, शरीर से अग्नि के समान आभा निकलती हुई दिखाई देती है। वे लाल वस्त्र धारण करती हैं और उनके हाथों में त्रिशूल, पानपात्र और वर-मुद्रा होती है। मां त्रिपुर भैरवी को त्रिपुर सुंदरी का उग्र रूप भी माना जाता है, यानी जहां सौम्यता है, वहीं उग्रता भी संतुलन बनाकर विद्यमान है।
मां त्रिपुर भैरवी की पूजा के लिए शुभ मुहूर्त
24 जनवरी को मां त्रिपुर भैरवी की पूजा के लिए कई शुभ समय उपलब्ध हैं। इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 26 मिनट से 6 बजकर 20 मिनट तक रहेगा, जो साधना और मंत्र जप के लिए अत्यंत श्रेष्ठ माना जाता है। प्रातः संध्या का समय सुबह 5 बजकर 53 मिनट से 7 बजकर 13 मिनट तक है।
अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 12 मिनट से 12 बजकर 55 मिनट तक रहेगा, जो किसी भी देवी पूजा के लिए श्रेष्ठ समय माना जाता है। विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 20 मिनट से 3 बजकर 03 मिनट तक है। गोधूलि मुहूर्त शाम 5 बजकर 51 मिनट से 6 बजकर 18 मिनट तक रहेगा, जबकि सायाह्न संध्या शाम 5 बजकर 54 मिनट से 7 बजकर 14 मिनट तक मानी गई है।
अमृत काल सुबह 9 बजकर 31 मिनट से 11 बजकर 06 मिनट तक रहेगा। इसके अलावा निशिता मुहूर्त 25 जनवरी की रात 12 बजकर 07 मिनट से 1 बजकर 00 मिनट तक है। इस दिन रवि योग भी सुबह 7 बजकर 13 मिनट से 10 बजकर 56 मिनट तक रहेगा, जो पूजा को और अधिक फलदायी बनाता है।
मां त्रिपुर भैरवी की पूजा विधि
मां त्रिपुर भैरवी की पूजा में शुद्धता और एकाग्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। पूजा से पहले स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को गंगाजल से शुद्ध करें। मां त्रिपुर भैरवी की प्रतिमा या चित्र को लाल वस्त्र पर स्थापित करें। उन्हें लाल पुष्प, सिंदूर, कुमकुम, धूप और दीप अर्पित करें। पूजा के समय लाल रंग का विशेष महत्व माना जाता है। इसके बाद मां का ध्यान करते हुए मंत्र जप करें और अंत में मां से भय, बाधा और नकारात्मकता के नाश की प्रार्थना करें। माना जाता है कि गुप्त नवरात्रि में की गई यह पूजा साधक को विशेष शक्ति प्रदान करती है।
मां त्रिपुर भैरवी के मंत्र
मां त्रिपुर भैरवी की कृपा प्राप्त करने के लिए उनके मंत्रों का जप किया जाता है। मां का ध्यान मंत्र 'हस्त्रां ह्स्क्ल्रिं हस्त्रौं' है। साधना में 'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं त्रिपुर भैरव्यै नमः' मंत्र को विशेष प्रभावी माना गया है। माता का बीज मंत्र बीज मंत्र 'हसैं हसकरीं हसैं' है। मूल मंत्र 'ॐ ह्रीं भैरवी कलौं ह्रीं स्वाहा' है। मंत्र का जप भी किया जाता है। माना जाता है कि इन मंत्रों का श्रद्धा और नियमपूर्वक जप करने से साधक के भीतर साहस, आत्मविश्वास और मानसिक शक्ति का विकास होता है। हालांकि मां का पूजन गुरु की आज्ञा से ही करें।
मां त्रिपुर भैरवी की उत्पत्ति कथा
शास्त्रों के अनुसार, जब सृष्टि में असुर प्रवृत्ति अत्यधिक बढ़ने लगी और देवताओं का अस्तित्व संकट में पड़ गया, तब आदिशक्ति ने अपने उग्र स्वरूप को प्रकट किया। कहा जाता है कि त्रिपुर नामक तीन लोकों या तीन दुर्गों में रहने वाले असुर अत्यंत शक्तिशाली हो गए थे। इन असुरों को वरदान प्राप्त था कि कोई भी देव, दानव या मानव उनका संहार नहीं कर सकता है। अपने इसी अहंकार के कारण वे देवताओं, ऋषियों और ब्राह्मणों पर अत्याचार करने लगे।
देवताओं ने जब भगवान शिव और माता पार्वती की शरण ली, तब आदिशक्ति ने यह समझाया कि इन असुरों का अंत केवल शक्ति के उग्र स्वरूप से ही संभव है। इसके बाद माता पार्वती ने भैरवी स्वरूप धारण किया। यह स्वरूप अग्नि, तेज और प्रचंड ऊर्जा से युक्त था। इसी उग्र शक्ति को मां त्रिपुर भैरवी कहा गया।
मां त्रिपुर भैरवी ने अपने तेज से तीनों लोकों में व्याप्त असुरी शक्तियों का नाश किया। उनका यह स्वरूप केवल विनाश का नहीं, बल्कि चेतना और अनुशासन का प्रतीक भी माना जाता है। शास्त्रों में कहा गया है कि मां त्रिपुर भैरवी व्यक्ति के भीतर छिपे अज्ञान, भय और अहंकार का भी संहार करती हैं। इसी कारण उन्हें त्रिगुणात्मक संसार—स्थूल, सूक्ष्म और कारण—पर शासन करने वाली देवी माना गया है।
तांत्रिक परंपरा में मां त्रिपुर भैरवी को साधना की देवी माना गया है। वे साधक को कठिन तप, संयम और आत्मबल के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं
मां त्रिपुर भैरवी की पूजा के लाभ
मां त्रिपुर भैरवी की पूजा से व्यक्ति के जीवन में साहस और आत्मबल बढ़ता है। माना जाता है कि उनकी साधना से भय, नकारात्मक ऊर्जा और शत्रु बाधाएं दूर होती हैं। जो लोग मानसिक तनाव, असुरक्षा या आत्मविश्वास की कमी से जूझ रहे होते हैं, उन्हें मां त्रिपुर भैरवी की पूजा से विशेष लाभ मिलता है। तांत्रिक साधना में यह भी माना जाता है कि मां की कृपा से साधक को निर्णय लेने की शक्ति और जीवन में स्थिरता प्राप्त होती है।
डिसक्लेमर: यहां दी गई जानकारी शास्त्रों पर आधारित है तथा केवल सूचना के लिए दी जा रही है। Times Now Navbharat इसकी पुष्टि नहीं करता है।