अध्यात्म

बेअसर हो जाएगी साढ़ेसाती, ढैय्या और महादशा , हर शनिवार को कर लें शनिदेव के इस स्तोत्र का पाठ

Dashrath Krit Shani Stotra: शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या में व्यक्ति का कई प्रकार की परेशानियों का सामना करना पड़ता है। माना जाता है यह समय काफी कठिन होता है। ऐसे में लोग कई प्रकार के ज्योतिष उपायों को अपनाते हैं। इन्हीं में से एक बेहद ही शक्तिशाली उपाय प्रचलित है, जिसको करने से साढ़ेसाती और ढैय्या बिल्कुल कम हो जाता है। आइए जानते है कि वह उपाय क्या है?

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दशरथकृत शनि स्तोत्र के लाभ

Dashrath Krit Shani Stotra: ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं में शनि देव को कर्मफल देने वाला माना जाता है। कहा जाता है कि शनि व्यक्ति को उसके कर्मों के अनुसार फल देते हैं, वे न्यायाधीश हैं। इस कारण लोगों को शनि की ढैय्या, महादशा और साढ़ेसाती में परेशानी का सामना करना पड़ता है।

इन सभी परेशानियों के लिए लोग कई प्रकार के उपाय करते हैं, लेकिन शास्त्रों के अनुसार अगर व्यक्ति दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ कर लें तो शनिदेव उसको पीड़ा नहीं देते हैं। मान्यता है कि इस स्तोत्र की रचना अयोध्या के राजा और भगवान राम के पिता महाराज दशरथ ने की थी। इस स्तोत्र का पाठ करने से शनि से जुड़ी परेशानियों में कमी आती है और जीवन में स्थिरता और राहत मिलती है।

कैसे हुई इस स्तोत्र की रचना

पौराणिक कथाओं के अनुसार एक समय शनि देव की दृष्टि रोहिणी नक्षत्र पर पड़ने वाली थी। ज्योतिष में इसे बहुत अशुभ माना जाता है, क्योंकि ऐसा होने पर धरती पर अकाल, संकट और भारी कष्ट आने की आशंका होती है। जब यह जानकारी अयोध्या के राजा दशरथ को हुई तो उन्होंने अपने राज्य और पूरी मानव जाति की रक्षा के लिए शनि देव से प्रार्थना करने का निर्णय लिया।

कथा के अनुसार राजा दशरथ अपने रथ पर बैठकर सीधे शनि लोक तक पहुंच गए और वहां शनि देव की स्तुति की। उन्होंने विनम्रता से प्रार्थना की कि वे अपनी कठोर दृष्टि को रोहिणी नक्षत्र से हटा लें, ताकि पृथ्वी पर कोई बड़ा संकट न आए। राजा दशरथ की भक्ति और साहस से शनि देव प्रसन्न हो गए और उन्होंने उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली। राजा दशरथ ने शनि देव की स्तुति में जो प्रार्थना की, उसे ही दशरथ कृत शनि स्तोत्र कहा जाता है। यह स्तोत्र शनि देव को प्रसन्न करने के सबसे प्रभावी स्तोत्रों में से एक माना जाता है।

दशरथ कृत शनि स्तोत्र के लाभ

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस स्तोत्र का नियमित पाठ करने से शनि से जुड़ी कई प्रकार की परेशानियों में राहत मिल सकती है। खासकर जिन लोगों की कुंडली में शनि कमजोर स्थिति में हो या जो साढ़ेसाती या ढैय्या से गुजर रहे हों, उनके लिए यह स्तोत्र काफी लाभकारी माना जाता है।

कहा जाता है कि इस स्तोत्र के पाठ से जीवन में आ रही रुकावटें धीरे-धीरे कम हो सकती हैं। कामकाज में स्थिरता आने लगती है और मानसिक तनाव में भी कमी महसूस हो सकती है। कई लोग मानते हैं कि इससे आर्थिक परेशानियां कम होती हैं और मेहनत का सही परिणाम मिलने लगता है।

इसके अलावा इस स्तोत्र का पाठ व्यक्ति के मन को भी शांत करता है। शनि देव न्याय और अनुशासन के प्रतीक माने जाते हैं, इसलिए उनकी स्तुति करने से व्यक्ति के जीवन में धैर्य, संयम और सही निर्णय लेने की क्षमता भी बढ़ती है।

कब और कैसे करें पाठ

आम तौर पर इस स्तोत्र का पाठ शनिवार के दिन करना अच्छा माना जाता है। सुबह स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनकर शनि देव का स्मरण करते हुए इस स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है। कई लोग शनि मंदिर में जाकर भी इसका पाठ करते हैं या घर में दीपक जलाकर शनि देव को प्रणाम करके इसे पढ़ते हैं।

ज्योतिष के अनुसार अगर कोई व्यक्ति लगातार कुछ समय तक श्रद्धा से दशरथ कृत शनि स्तोत्र का पाठ करता है, तो शनि देव की कृपा प्राप्त होने की मान्यता है और जीवन में आ रही कई परेशानियों में धीरे-धीरे राहत महसूस होने लगती है।

क्या है दशरथ कृत शनि स्तोत्र?

दशरथ उवाच:

प्रसन्नो यदि मे सौरे ! एकश्चास्तु वरः परः ॥

रोहिणीं भेदयित्वा तु न गन्तव्यं कदाचन् ।

सरितः सागरा यावद्यावच्चन्द्रार्कमेदिनी ॥

याचितं तु महासौरे ! नऽन्यमिच्छाम्यहं ।

एवमस्तुशनिप्रोक्तं वरलब्ध्वा तु शाश्वतम् ॥

प्राप्यैवं तु वरं राजा कृतकृत्योऽभवत्तदा ।

पुनरेवाऽब्रवीत्तुष्टो वरं वरम् सुव्रत ॥

दशरथकृत शनि स्तोत्र:

नम: कृष्णाय नीलाय शितिकण्ठ निभाय च ।

नम: कालाग्निरूपाय कृतान्ताय च वै नम: ॥1॥

नमो निर्मांस देहाय दीर्घश्मश्रुजटाय च ।

नमो विशालनेत्राय शुष्कोदर भयाकृते ॥2॥

नम: पुष्कलगात्राय स्थूलरोम्णेऽथ वै नम: ।

नमो दीर्घाय शुष्काय कालदंष्ट्र नमोऽस्तु ते ॥3॥

नमस्ते कोटराक्षाय दुर्नरीक्ष्याय वै नम: ।

नमो घोराय रौद्राय भीषणाय कपालिने ॥4॥

नमस्ते सर्वभक्षाय बलीमुख नमोऽस्तु ते ।

सूर्यपुत्र नमस्तेऽस्तु भास्करेऽभयदाय च ॥5॥

अधोदृष्टे: नमस्तेऽस्तु संवर्तक नमोऽस्तु ते ।

नमो मन्दगते तुभ्यं निस्त्रिंशाय नमोऽस्तुते ॥6॥

तपसा दग्ध-देहाय नित्यं योगरताय च ।

नमो नित्यं क्षुधार्ताय अतृप्ताय च वै नम: ॥7॥

ज्ञानचक्षुर्नमस्तेऽस्तु कश्यपात्मज-सूनवे ।

तुष्टो ददासि वै राज्यं रुष्टो हरसि तत्क्षणात् ॥8॥

देवासुरमनुष्याश्च सिद्ध-विद्याधरोरगा: ।

त्वया विलोकिता: सर्वे नाशं यान्ति समूलत: ॥9॥

प्रसाद कुरु मे सौरे ! वारदो भव भास्करे ।

एवं स्तुतस्तदा सौरिर्ग्रहराजो महाबल: ॥10॥

दशरथ उवाच:

प्रसन्नो यदि मे सौरे ! वरं देहि ममेप्सितम् ।

अद्य प्रभृति-पिंगाक्ष ! पीडा देया न कस्यचित् ॥

Mohit Tiwari
मोहित तिवारीauthor

मोहित तिवारी को पत्रकारिता के क्षेत्र में 10 साल का अनुभव है। इन्होंने अपने करियर की शुरुआत प्रतिष्ठित न्यूजपेपर में फील्ड रिपोर्टिंग से की थी। मोहित ने प्रिंट, टीवी और डिजिटल तीनों प्लेटफॉर्म पर काम किया है। देश-विदेश, लाइफस्टाइल, धर्म और आध्यात्मिक विषयों में गहरी रुचि रखने वाले मोहित ने ज्योतिष का भी व्यापक अध्ययन किया है। मोहित के आलेख लाइफस्टाइल, हेल्थ, न्यूज, धर्म, ज्योतिष आदि विषयों पर गहरी शोध और प्रामाणिकता पर आधारित होते हैं और इन विषयों पर वह 12,000 से अधिक आर्टिकल लिख चुके हैं।

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