अध्यात्म

'दक्षिण के मथुरा' में प्रत्यक्ष नहीं होते बाल गोपाल के दर्शन, नौ छिद्रों वाली खिड़की से निहारते हैं भक्त

Dakshin bharat ka prasidh krishan mandir (दक्षिण का मथुरा कौन सी जगह कहलाती है): जन्माष्टमी का त्योहार 16 अगस्त को है। कृष्ण की जन्म लीला मनाने से पहले जानते हैं दक्षिण भारत के एक प्रसिद्ध मंदिर के बारे में जहां भक्तों को बाल गोपाल के सीधे दर्शन नहीं होते हैं। बल्कि वह नौ छेद वाली खिड़की से झांक कर उनके स्वरूप के दर्शन करते हैं।

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बाल गोपाल (Representative Image by Canva)

Dakshin bharat ka prasidh krishan mandir (दक्षिण का मथुरा कौन सी जगह कहलाती है): श्री कृष्ण जन्माष्टमी (का उत्साह अब कृष्ण भक्तों में नजर आने लगा है। देश भर में नंदलाल के कई मंदिर हैं, जहां तैयारियां जोरों पर हैं। ये मंदिर अपने आप में भक्ति के साथ आश्चर्य को समेटे हुए हैं। ऐसा ही एक मंदिर कर्नाटक के उडुपी शहर में स्थित है, जहां कान्हा आप प्रत्यक्ष नहीं देख सकते बल्कि छोटी-छोटी खिड़कियों से नंदलाल के दर्शन होते हैं।

उडुपी शहर को कहते हैं दक्षिण का मथुरा

दक्षिण भारत के इस मंदिर की वजह से शहर को 'दक्षिण का मथुरा' कहा जाता है, जो भगवान कृष्ण की अनूठी और मनमोहक मूर्ति के लिए प्रसिद्ध है। यहां बालकृष्ण के रूप में स्थापित मूर्ति को सीधे नहीं, बल्कि 'नवग्रह किटिकी' नामक नौ छिद्रों वाली खिड़की से देखा जाता है। यह मंदिर अपनी अनूठी परंपराओं और कनकदास की भक्ति की कथा के लिए भी जाना जाता है। आईएएनएस की एक रिपोर्ट के मुताबिक 13वीं शताब्दी में वैष्णव संत श्री माधवाचार्य द्वारा स्थापित यह मंदिर भक्ति और आध्यात्मिकता का प्रतीक है।

मनमोहक है बालकृष्ण की मूर्ति

कर्नाटक पर्यटन विभाग के अनुसार, यहां बालकृष्ण की मूर्ति को भगवान कृष्ण की सबसे सुंदर मूर्तियों में से एक माना जाता है। मंदिर की सबसे खास बात है 'कनकना किंदी' या 'नवग्रह किटिकी', जो एक छोटी खिड़की है। इसके पीछे एक मार्मिक कथा छिपी है। किंवदंती के अनुसार, भक्त कनकदास, जो नीची जाति के थे, को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं थी। उन्होंने हार नहीं मानी और मंदिर की दीवार में एक छोटी दरार से भगवान से प्रार्थना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण की मूर्ति ने पश्चिम की ओर मुड़कर उन्हें दर्शन दिए। आज भी भक्त इसी खिड़की से नंदलाल के दर्शन करते हैं। पास ही कनकदास मंडप में उनकी मूर्ति स्थापित है, जो उनकी भक्ति की गाथा को जीवंत रखती है।

मंदिर की परंपराएं

मंदिर में कई अनूठी परंपराएं हैं। यहां हर दिन सुबह 4 बजकर 30 मिनट से रात 9 बजकर 30 मिनट तक भक्तों के लिए द्वार खुले रहते हैं। मंदिर में अन्न दान की परंपरा भी खास है, जहां हर भक्त को मुफ्त भोजन दिया जाता है।

इस मंदिर की कई विशेषताएं हैं, जिनमें से एक उडुपी पर्याय उत्सव भी है, जो हर दो साल बाद मनाया जाता है। यह मंदिर के प्रबंधन को आठ मठों (पुट्टीगे, पेजावर, पलिमारु, अदामारु, शिरुर, सोधे, कृष्णपुरा और कनियुरु) के बीच हस्तांतरित करने का प्रतीक है। इस दौरान भगवान कृष्ण की मूर्ति को स्वर्ण रथ और ब्रह्म रथ पर सजाकर झांकी निकाली जाती है।

मंदिर परिसर में गोशाला भी है, जो भक्तों के लिए आकर्षण का केंद्र है। उडुपी संस्कृत शिक्षा का भी प्रमुख केंद्र है, जहां आठ मठों के माध्यम से यह भाषा सिखाई जाती है। पास ही अनंतेश्वर और चंद्रमौलेश्वर मंदिर भी है, जो श्री कृष्ण मंदिर से पुराने हैं। अनंतेश्वर मंदिर वह स्थान है, जहां माधवाचार्य ने आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की थी।

उडुपी पहुंचना आसान है। यह बेंगलुरु से 400 किमी और मंगलुरु हवाई अड्डे से 60 किमी दूर है। रेल और सड़क मार्ग से उडुपी अच्छी तरह जुड़ा है। मंदिर शहर के केंद्र में हैं और पास में मालपे, कापू बीच और सेंट मैरी द्वीप जैसे पर्यटक स्थल भी हैं।

इनपुट : आईएएनएस

Medha Chawla
मेधा चावलाauthor

मेधा चावला टाइम्स नाउ नवभारत डिजिटल में सीनियर एसोसिएट एडिटर हैं और लाइफस्टाइल सेक्शन की लीड हैं। लाइफस्टाइल पत्रकारिता में 20 वर्षों का अनुभव रखने वाली मेधा की विशेषज्ञता हेल्थ, वेलनेस, फिटनेस, मेंटल हेल्थ, डेली लाइफ इम्प्रूवमेंट, ह्यूमन-इंटरेस्ट फीचर्स और रिसर्च-बेस्ड स्टोरीज तक फैली है। उनकी लेखन शैली पाठकों को जटिल स्वास्थ्य और जीवनशैली संबंधी विषयों को आसान, समझने योग्य और व्यवहारिक रूप में प्रस्तुत करती है, जिससे उनका कंटेंट व्यापक पाठक समूह से जुड़ता है। अबतक 30,000 से अधिक कंटेंट पीस लिख चुकी मेधा की कई एक्सक्लूसिव स्टोरीज डिजिटल प्लेटफॉर्म पर ट्रेंड सेट कर चुकी हैं।

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