Akhuratha Sankashti Chaturthi Vrat Katha (अखुरथ संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा): हिंदू धर्म में संकष्टी चतुर्थी व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। कहते हैं जो कोई भी इस व्रत को सच्चे मन से रखता है उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं। पौष मास में आने वाली अखुरथ संकष्टी चतुर्थी और भी ज्यादा खास मानी जाती है। जो इस बार 30 दिसंबर को है। नारद पुराण अनुसार संकष्टी चतुर्थी के दिन व्रती को पूरे दिन उपवास रखने के बाद शाम में संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा सुननी चाहिए। यहां जानिए संकष्टी चतुर्थी व्रत कथा।
Akhuratha Sankashti Chaturthi Vrat Katha (अखुरथ संकष्टी चतुर्थी की व्रत कथा)
पौराणिक कथा के अनुसार एक बार रावण ने स्वर्ग के सभी देवताओं को जीत लिया था और संध्या करते हुए उसने बालि को भी पीछे से जाकर पकड़ लिया था। उस समय वानरराज बालि रावण से कहीं गुना अधिक शक्तिशाली थे उन्होंने रावण को अपनी बगल में दबा लिया और उसे किष्किंधा ले आए और अपने पुत्र अंगद को खिलोने की तरह खेलने के लिए दे दिया। अंगद ने रावण को खिलौना समझा और उसे रस्सी से बांधकर इधर-उधर घुमाने लगे। जिसकी वजह से रावण को काफी कष्ट हो रहा था।
दुखी होकर रावण ने अपने पिता ऋषि पुलस्त्य जी को याद किया। रावण की ये दशा देखकर उनके पुत्र को बहुत दुख हुआ और उन्होंने पता लगाया कि आखिर रावण की ये दशा कैसे हुई। उन्होंने मन में सोचा कि घमंड होने पर देव, मनुष्य और असुर सभी की यही गति होती है। लेकिन फिर भी पुत्र मोह में आकर उन्होंने रावण से पूछा कि तुमने मुझे कैसे याद किया? रावण ने कहा हे पितामह, मैं बहुत दुखी हूं, यहां सभी मुझे धिक्कारते हैं, आप मेरी रक्षा कीजिए और इस पीड़ा से मुझे मुक्ति दिलाइए।
रावण के पिता ने कहा कि तुम परेशान मत हो, जल्द ही तुम्हें इस बंधन से मुक्ति मिलेगी। तब उन्होंने रावण को गणेश जी का व्रत करने की सलाह दी और बताया कि पूर्वकाल में वृत्रासुर की हत्या से मुक्ति पाने के लिए इन्द्रदेव ने भी इस व्रत को किया था। यह व्रत बहुत फलदायी है और इसे करने से हर तरह के संकट दूर हो जाते हैं। पिता के कहने पर रावण ने संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जिससे उसे बालि के बंधन से मुक्ति मिल गई।
