गुजरात के रामसन गांव में करीब 200 सालों से होली नहीं मनाई जाती है। मान्यता है कि होलिका दहन के दिन गांव में भीषण आग लग गई थी और कई घर जलकर राख हो गए थे। इस हादसे के बाद गांववालों ने होली मनाना बंद कर दिया और आज तक ये परंपरा जारी है।
झारखंड के दुर्गापुर में भी होली न मनाने की परंपरा है। कहा जाता है कि होली के दिन यहां के राजा दुर्गा प्रसाद की हत्या हो गई थी। इस घटना के बाद गांव में होली बंद कर दी गई। सालों बाद कुछ लोगों ने होली मनाने की कोशिश की, लेकिन उसी दिन दो लोगों की मौत हो गई। तब से लोग इसे अशुभ मानते हैं और होली नहीं खेलते हैं।
पुडुचेरी जिसे आम बोलचाल में पोंडिचेरी भी कहा जाता है में होली उत्तर भारत जितनी धूमधाम से पारंपरिक रूप से नहीं मनाई जाती। इसका मुख्य कारण यहाँ की सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है। पुडुचेरी पर लंबे समय तक फ्रांसीसी शासन रहा, और आज भी यहाँ दक्षिण भारतीय संस्कृति और ईसाई समुदाय का प्रभाव अधिक है।
लेक पुलीकट भारत की दूसरी सबसे बड़ी खारे पानी की झील है, जो आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु की सीमा पर स्थित है। इस क्षेत्र में रहने वाली पुलीकट कम्यूनिटीज मुख्य रूप से मछुआरा समुदायों और पारंपरिक ग्रामीण समाज से जुड़ी हैं। इन क्षेत्रों का जीवन मुख्य रूप से मछली पकड़ने और प्रकृति पर निर्भर होता है, इसलिए उनके त्योहार भी समुद्र, झील और स्थानीय देवी-देवताओं से जुड़े होते हैं। यहां होली नहीं मनाई जाती है।
लक्षद्वीप में होली पारंपरिक रूप से नहीं मनाई जाती, क्योंकि यहाँ की अधिकांश आबादी मुस्लिम समुदाय से संबंधित है और उनकी धार्मिक व सांस्कृतिक परंपराएँ अलग हैं। लक्षद्वीप में ईद, बकरीद और अन्य इस्लामी त्योहार प्रमुख रूप से मनाए जाते हैं।
उत्तराखंड के खुरजान और किवली गांव में भी करीब 150 सालों से होली नहीं मनाई जाती है। यहां के लोगों का विश्वास है कि उनकी कुलदेवी त्रिपुर सुंदरी को शोर और हंगामा पसंद नहीं है। अगर गांव में होली खेली गई तो देवी नाराज हो सकती हैं। इसी आस्था के कारण आज भी इन गांवों में होली का त्योहार नहीं मनाया जाता है।
मध्य प्रदेश के भिंड जिले के कूचीपुरा गांव में भी होली नहीं खेली जाती है। लोगों का कहना है कि सदियों पहले एक संत ने नाराज होकर गांव को श्राप दिया था कि अगर यहां होली मनाई गई तो परिवारों पर संकट आएगा। इसी डर और आस्था के कारण आज भी यहां रंगों का त्योहार नहीं मनाया जाता है।