पुराणों के अनुसार सिंधु नदी स्वर्ग की गंगा मानी जाती थी। सूर्यवंशी राजा भगीरथ की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर स्वर्ग की गंगा इस जगह पर गिरी थी। यहां से गंगा की छह धाराएं बनीं जिनमें से तीन पूर्व की और तीन पश्चिम की ओर बहने लगी। ऐसा कहा जाता है कि इस नदी के किनारे ही वैदिक धर्म और भारतीय संस्कृति का उद्गम और विकास हुआ था। आज सिंधु नदी, पाकिस्तान, भारत, और चीन से होकर बहती है।
झेलम नदी को पहले वितस्ता नदी के नाम से जाना जाता था। प्राचीन काल में यूनानी इसे हाइडेस्पेस (Hydaspes) कहा करते थे। श्रीमद्भागवत के अनुसार झेलम प्राचीन भारत की प्रमुख नदियों में से एक थी जिसका उल्लेख ऋग्वेद और नीलमत पुराण में भी है। झेलम नदी जम्मू-कश्मीर के पीर पंजाल के पर्वतों के वेरीनाग झरने से निकलती है और ये नदी लगभग 725 किलोमीटर तक बहकर पाकिस्तान की चिनाब नदी में मिल जाती है।
चिनाब नदी को वैदिक काल में असिक्नी या इसकमती के नाम से जाना जाता था जिसे महाभारत काल में चंद्रभागा के नाम से जाना जाता था क्योंकि ये चंद्र और भागा नदियों के संगम से बनती है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार पांडवों ने अपने अज्ञातवास के समय इस नदी के किनारे गुफा में रहकर अपना नाम और वेश बदलकर गुप्त रूप से रहना प्रांरभ किया था। ये नदी जम्मू और कश्मीर के जम्मू क्षेत्र से होकर पंजाब और पाकिस्तान के मैदानी इलाकों में बहती है।
सनातन हिंदू धर्म के प्राचनी धर्मग्रंथ वेदों के अनुसार, रावी नदी को इरावती कहा जाता था, जिसका अर्थ है ताजगी देने वाली। यूनानियों ने इसे हाइड्रोटेस कहा था जिसका अर्थ होता है पानी के सांप की नदी। इस नदी को परुष्णी के नाम से भी जाना जाता था, जिसका अर्थ है तेज बहने वाली। ये नदी आज पाकिस्तान में लाहौर और भारत में अमृतसर से 26 किलोमीटर नीचे से होकर बहती है।
ब्यास नदी का नाम महाभारत महाकाव्य के लेखक ऋषि वेद व्यास के नाम पर पड़ा है। ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने इस नदी के स्रोत झील से ब्यास कुंड बनाया था। इस नदी को बहुत पवित्र माना जाता है। रामायण में ब्यास नदी का वर्णन विपाशा नाम से मिलता है। आज के समय में ये नदी हिमाचल प्रदेश के रोहतांग दर्रे के पास स्थित व्यास कुंड से निकलकर पंजाब के हरिके में सतलुज नदी में जाकर मिल जाती है।
सतलज या सतलुज नदी को प्राचीन सिंधु नदी सहायक नदी माना जाता है, जिसका संगम पाकिस्तान पहुंचकर सिंधु में होता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार 'शतद्रु' के नाम से वर्णित सतलज नदी का उल्लेख कई प्राचीन ग्रंथों में मिलता है जिनमें महाभारत, रामायण, विष्णुपुराण आदि धार्मिक ग्रंथ शामिल हैं।
सरस्वती नदी का वर्णन कई हिंदू ग्रंथों में मिलता है। ऋग्वेद में इसे 'नदीतमा' कहा गया है, जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ नदी, सरस्वती नदी के जल को विद्या और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि माना जाता है कि ऋषियों ने वेदों की रचना इसी नदी के किनारे रहकर की थी। ऐसा कहा जाता है कि भगवान विष्णु के अवतार परशुराम ने सरस्वती नदी के पानी में स्नान करके ही अपने पापों से मुक्ति पाई थी। आज ये नदी भारत के उत्तराखण्ड राज्य में गुप्त रूप से बहती है।